Tuesday, November 30, 2010

डा.कलाम से एक मुलाक़ात....मेरी नहीं ...मेरी ममता भाभी की

अपनी ममता भाभी का  जिक्र मैं कई बार अपनी पोस्ट में कर चुकी हूँ...लेखन की दुनिया में वापसी उनके सतत प्रोत्साहन से ही संभव हुआ. अपने पहले ब्लॉग का नाम...उसका परिचय सब ,पहले उन्हें ही दिखाया...उनके आश्वासन पर ही मूर्त रूप दिया उसे . वे लगातार मेरा उत्साह -वर्द्धन करती रहती हैं. पहले तो नियमित टिप्पणियों के माध्यम से भी अपने विचार बताती रहती थीं. पर आजकल वे काफी व्यस्त हैं.फिर भी मेरी सारी पोस्ट और कहानियाँ वे जरूर पढ़ती हैं.

कुछ ही महीने पहले उन्होंने रायपुर के   DPS  स्कूल में अंग्रेजी शिक्षिका के रूप में ज्वाइन किया है. कल ही फेसबुक पर उनकी फोटो डा. कलाम के साथ देखी और उनसे आग्रह कर डाला कि 'प्लीज़ प्लीज़...इस मुलाक़ात का ब्यौरा वे लिख कर मुझे भेजें.' इसे मैं अतिथि पोस्ट के रूप में प्रकाशित करना चाहती हूँ. और घोर आश्चर्य बिना एक ड्रम मक्खन लगाए जरा सी मनुहार से वे मान गयीं. उनके शब्दों में ही पूरा  विवरण.

अतिथि पोस्ट : ममता कुमार

क्रीम साड़ी में भाभी
उस दिन पूरे स्कूल  में गहमा-गहमी थी,आखिर डा. कलाम  आ रहे थे ,सारी टीचर्स  बच्चे सभी उत्साहित  थे ।लेकिन मेरी कुछ वैसी प्रतिक्रिया नहीं थी. इन VIP `s के आने से होता भी क्या है? बहुत सारा हन्गामा,बहुत सारा excitement और finally बहुत सारी problem । दर्शन तो इनके ऐसे होते हैं जैसे तिरुपति मे बालाजी के दर्शन के लिए घंटो लाइन में  खडे रहो और फिर दर्शन के नाम पर एक झलक।

लेकिन डॉक्टर कलाम  ने मेरी पूरी सोच ही बदल दी। एक तो वो काफी समय पर आये,(भारतीय समय को ध्यान मे रखते हुए) और आकर काफी लोगो से व्यक्तिगत रूप से  मिले।हम सारी टीचर्स  red carpet के एक तरफ़ पंक्तिबद्ध  खडी थीं । थोडी थोडी दूर पर रुक कर डा. कलाम  सब से कुछ  न कुछ  बात कर रहे थे। मुझसे  उन्होने पूछा "Are you a great teacher ?"अपनी क्लास  मे  मै बच्चो को कई  बार डपट  लगाती हूँ  कि साधारण प्रश्न का भी वे उत्तर नहीं देते ।लेकिन उस समय मुझे  भी कुछ नही सूझा । जब मेरे बगल से 'संकरी' (सह-शिक्षिका ) ने कहा "trying to be " तब जाकर कुछ समझ  मे आया। डा. कलाम  को शायद उत्तर  मुझसे  ही चाहिए था।वह् मुझे  देखकर फिर बोले "hmmmm ?"
मैने कह दिया "Trying to be with the guidance of our seniors "{after all ,Principal  वही खड़े  थे :)) फिर उन्होने एक ग्रीक टीचर  की कहानी सुनायी ,सॉरी  ,नाम मुझे  याद नही क्योकि तब भी मुझे  समझ   नही आया था।आखिर डा. कलाम  भी तो हमारे अन्य दक्षिण भारतीय वासियों  की तरह  अपने खास accent मे english बोलते हैं। उन्होने कहा "There was a great greek teacher ....................He said once ,"give me a child for seven years ,after that no God no devil can change him ,....that is the confidence that you  have ." इतना कह कर God bless you  कह कर वह आगे बढ़ गए

.जाने के बाद भी एक सुखद एहसास बाकी रहा क्योंकि उनका एक ख़ास अंदाज है ,वो लोगो से इस अंदाज में बात करते है जैसे वह इंसान उनके लिए कितना ख़ास है. इसी तरह हम सब पर अपना जादू बिखेरते हुए वे स्टेज  पर चले गए,वहां पर वैसे तो हर चीज को वे बहुत gracefully लेते रहे पर यह बहुत स्पष्ट था कि वे बच्चों से interact करने में ज्यादा interested हैं.और जब उनकी स्पीच का समय आया तो पूछिये मत.......इतनी energy इतना commitment शायद ही आज तक किसी में देखा हो मैंने. Posh English schools से लेकर economically weaker section के बच्चों तक को involve करके सबको ऐसा एहसास दिलाया जैसे वे ख़ास उसी इंसान से बाते कर रहे हैं. हम सब की  तालियाँ बंद होती उसके पहले ही वे वहां से निकल गए ,अगला कार्यक्रम मेडिकल कॉलेज में होना था जिसका समय हो चला था .
बस मेरी तरफ से इतना ही ,मैं कोई writer  तो हूँ नहीं कि इस incident को खूबसूरत शब्दों के लिफाफे में डालकर आपके सामने रखूँ बस जो हुआ वही लिख दिया.

--- ममता कुमार 

(पिछली पोस्ट पर एक बेकार की बहस ने सारा ज़ायका बिगाड़ दिया और मैं कुछ भी नहीं लिख पायी...ऐसे में भाभी की भेजी ये पोस्ट एक खुशनुमा झोंके की तरह लगी....शुक्रिया भाभी :)
एकाध दिन में अगली पोस्ट लिखती  हूँ.)

Monday, November 29, 2010

स्वघोषित आलसी पर वक्त के पाबन्द : गिरिजेश राव

ये अब्बास या अली नहीं..गिरिजेश जी के सुपुत्र हैं 'अरिन्दम'
रेल का सफ़र हर बार कुछ यादगार लम्हे,दृश्य जरूर दे जता है. इस बार भी हाल  में ही मुंबई से लखनऊ(रिटर्न भी ) की यात्रा में बहुत कुछ संजोने जैसा मिला. साइड बर्थ पर मेहंदी और महावर रचे हाथ-पैर को समेटे सकुचाई सी एक नव-ब्याहता दुल्हन बैठी थी. पति बेख्याल सा खिड़की से बाहर देख रहा था. उनके बीच की अपरिचय की दीवार अभी टूटी नहीं थी (पर इस मोबाइल के जमाने में भी?? ....थोड़ा अचम्भा सा भी हुआ.) पर दोनों ने खिड़की से बाहर देखते हुए , खामोशी से अपना नाश्ता ख़त्म किया . और ताजा-ताज़ा बने दुल्हे ने भारी परदे सरका दिए और उपरी बर्थ पर जाकर सो गया .

दुल्हन परदे  की ओट से हमारी बर्थ की तरफ झांकती रही क्यूंकि यहाँ तो दो वर्षीय 'अली' और पांच वर्षीय 'अब्बास' ने उधम  मचा रखा था . 'अली' की चॉकलेट की फरमाईश अब रूदन का रूप ले रही थी और अम्मी 'अजरा' अपने सलवार-कुरते-दुपट्टे के ऊपर बुरका ओढ़े हैरान-परेशान सी चॉकलेट वाला बैग तलाश रही थी. मैने अपने बैग से निकाल एक 5-स्टार ऑफर किया और 'अली' ने एक प्यारी सी मुस्कान दे चॉकलेट  ले ली. अब मुझे भी ये चॉकलेट किसी ने बच्ची समझ कर दिया था और
'गिरिजेश राव जी' ने मुझे बड़े एहतियात से कैडबरी का वो सेलिब्रेशन पैकेट खोलते देख कह दिया था, "लगता है आप चॉकलेट नहीं खातीं " (जो सच था..मेरे भाई कहते हैं...'इसीलिए मीठा भी नहीं बोलती' :) )

गिरिजेश जी से हाल में ही परिचय हुआ था जबकि  उनकी लेखनी से परिचय तो ब्लॉग जगत में शामिल होते ही हो गया था. चैट पर थोड़ी बहुत बात-चीत होने लगी थी. वैसे वे अति-व्यस्त व्यक्ति हैं..एक ग्रन्थ (प्रेम-ग्रन्थ:)) लिखने में जुटे हुए हैं. एक बार बहुत ही रोचक बात कही उन्होंने, "हम दोनों एक दूसरे का लिखा नहीं पढ़ते हैं पर लिखते शानदार हैं :)


सोचा, अक्सर 'हलो ' तो हो ही जाती है..बता दूँ उनके शहर आ रही हूँ. सुनकर बोले, 'समय मिले तो मिलते हैं " {कर्ट्सी में इतना तो उन्हें कहना ही था :)} मैने भी हाँ कह दिया,पर साथ में बता दिया 'पता नहीं शादी की गहमागहमी में मौका मिलेगा या नहीं' . मौसी की बेटी की शादी में शामिल होने लखनऊ  पहुंची थी.कई रिश्तेदारों से पांच साल  के बाद मिल रही थी. लखनऊ जाते ही उन्हें कॉल कर के अपने लखनऊ पहुँचने की खबर तो दे दी परन्तु मिलने का समय निकालना मुश्किल ही लग रहा था. भाभी जी ने घर बुलाने की भी बात की. पर गिरिजेश राव जी ने मित्र धर्म निभाते मेरी मजबूरी उन्हें बता दी ...शुक्रिया गिरिजेश जी..पर अगली बार भाभी जी से मिलना पक्का रहा.

आखिरकार लौटनेवाले दिन उन्होंने कहा ,"मैं स्टेशन आता हूँ" और वे समय से स्टेशन पहुँच  गए थे . पर मुझे ही सबसे विदा लेते काफी देर हो गयी. अच्छा हुआ ट्रेन १०-१५ मिनट लेट थी और हमें दो बातें करने का मौका मिल गया..वरना सिर्फ 'हाय' और 'बाय' ही होती. ग्यारहवीं में पढने वाला मेरा कजिन 'कान्हा' जो स्टेशन भी आया था. बहुत उत्सुक था, "तुमलोग एक दूसरे को जानते नहीं...कभी मिले नहीं...कैसे पहचानोगे?..क्या बातें करोगे ?...शर्ट का कलर पूछा है, क्या दी?"... हा हा

गिरिजेश जी ने ही उसकी उत्सुकता शांत की, कि 'फोटोग्राफ्स  देखे हैं'. हमने आसानी से एक-दूसरे को पहचान लिया. उस दिन लखनऊ स्टेशन पर एक ही समय  अलग अलग  प्लेट्फौर्म पर मेरे रिश्तेदार ,दिल्ली,बनारस,रांची,पटना जाने वाली  ट्रेन के इंतज़ार में खड़े थे . मम्मी-पापा की पटना जाने वाली  ट्रेन थोड़ी लेट हो गयी और पापा हमारे वाले प्लेट्फौर्म पर आ गए. गिरिजेश जी से परिचय करवाते हुए मन में सोया बरसो पुराना  डर जाग उठा. जब हम तीनो भाई-बहन अपने दोस्तों से परिचय करवाते डर जाते थे कि पापा सवालों की बौछार ना कर दें..."पिछले एग्जाम में कितने परसेंट मिले थे??...अगले में कितने मिलने की आशा है,??....कैसी तैयारी है??....आदि आदि." उसपर से यह सब बताते उए किसी ने कुछ गलत बोल दिया..तो और मुसीबत. एक बार मेरे भाई के एक फ्रेंड ने कहा, "मुझे अपने grand father से मिलने गाँव जाना है ' पापा ने तुरंत पूछा...."maternal या paternal....सिर्फ grand father बोलने से कैसे चलेगा ?"

एकाध सवाल तो गिरिजेश  जी को भी झेलने ही पड़े. पर मैने तुरंत यह कह कर उनका इम्प्रेशन जमा दिया कि "ये सबकी वर्तनी की 'अशुद्धियाँ' सही करते रहते हैं " मुझे पता था, पापा शुद्ध बोलने और शुद्ध लिखने पर बहुत जोर देते हैं. फिर अखबारों में लिखी जाने वाली भाषा के गिरते स्तर पर चर्चा होने लगी. तभी मेरी ट्रेन व्हिसिल देकर सरकने लगी और ज़िन्दगी में पहली बार मैं चलती हुई ट्रेन में चढ़ी (ये अनुभव भी क्यूँ बाकी रहे? )


मुंबई लौटने पर मैने गिरिजेश जी से पूछा, "पापा ने आपकी क्लास तो नहीं ली ?" कहने लगे.."नहीं नहीं..बहुत भले आदमी हैं " (सबके पापा भले आदमी ही होते हैं ) पर आगे जो उन्होंने कहा वो तो आठवां आश्चर्य था. कहा,"आपकी तारीफ़ कर रहें थे ". मेरी तारीफ़??....कोई और तारीफ़ करे तो वो भी कभी ना बताएं. कभी मेरी स्कूल की प्रिंसिपल ने मेरी तारीफ़ की थी और वो बात मुझे पता चली,जब मैं एम.ए. कर रही थी. वह भी किसी से पापा कह रहें थे और मैं बाहर से आती हुई अपना नाम सुन,बरामदे में ही रुक गयी थी. अच्छा हुआ सुन लिया वरना सारी ज़िन्दगी उन्हें 'शुष्क हृदय  वाली  कठोर अनुशासन प्रिय प्रिंसिपल' ही समझती रहती. सौ तो नाम रखे थे, हमने उनके .कभी -कहीं  चुपके से बातें सुन लेना भी फायदेमंद होता है.:)


मैने थोड़ा और लालच दिखाया और गिरिजेश जी से कहा ,"आप भी मेरी थोड़ी तारीफ़ कर देते....पापा जरा खुश हो जाते "

वे बोले, "किया ना..कहा कि आपको काफी लोंग पढ़ते हैं ...और आपसे डरते भी हैं "
ख़ुशी के मारे मेरे पैर जमीन से उठने ही वाले थे कि उन्होंने वापस धरातल पर ला दिया ,यह कह कर कि "डरते हैं.. यह नहीं कहा" :(

कह ही दिया होता जरा इम्प्रेशन जम जाता. ...पर मैं सोच रही थी, जरूर मेरे सब-कॉन्शस माइंड ने यह पूछा होगा..'कितनी भी उम्र हो जाए...माता-पिता की नज़रों में अपनी पहचान की लालसा बनी ही  रहती है '

 

(सबके मन में उठते सवाल का जबाब अगली पोस्ट में..महफूज़ से मुलाकात हुई या नहीं :))

Wednesday, November 17, 2010

आज जानिये,शाहिद मिर्ज़ा, विवेक रस्तोगी, रवि धवन, राजेश उत्साही, इस्मत जैदी,राम त्यागी और मेरे भी :( बचपने के किस्से

शाहिद मिर्ज़ा जी की शरारत  

मेरे एक परिचित नसीम खान (नाम बदला हुआ है) अपनी बेग़म (जो घर से बाहर हमेशा बुर्के में रहती हैं) के साथ ईद की खरीददारी करते हुए बाज़ार में मिल गए. दुआ सलाम के दौरान एकाएक मुझे शरारत सुझी,
और बड़ी संजीदगी के साथ नसीम ख़ान से पूछा- ’भाभी के पास कई बुर्के हैं क्या’
उनका जवाब भी इसी अंदाज़ में मिला ’हां कई हैं....क्यों?”
मैंने कहा- ”बस ऐसे ही पूछ लिया....वो परसो आप बाइक से जा रहे थे तो भाभी को सुरमई रंग के बुर्के में देखा था”
मेरी इस शरारत पर वो बस हलके से मुस्कुरा दिए और खरीददारी में मशगूल हो गए.
तब तो बात आई-गई हो गई, लेकिन रात में नसीम भाई का फोन आया...कहने लगे ये तुमने हमारे घर में क्या हंगामा करा दिया....लो तुम ही समझाओ अपनी भाभी को....परसो मेरे साथ कौन थी और कैसे बुर्के में थी...
अब क्या बताएं..कि भाभी को ये समझाने में कितनी मशक्कत करनी पड़ी कि यूंही मज़ाक किया था.  
चलते चलते अपना एक शेर भी हाज़िर है-
 
सुनाते रहना परियों की कहानी
ये बचपन उम्र भर खोने न देना


 अगले ब्लॉगर्स मीट में सब विवेक जी से अपनी आइसक्रीम दूर ही रखें.

मैं तो बेटे के साथ ही बच्चा बन जाता हूँ, और हम दोनों की सबसे मनपसंद चीज है मीठा, फ़िर वह कुछ भी हो बस मीठा होना चाहिये जैसे कि गुड़, चाकलेट, केक, मिठाई, आईसक्रीम कुछ भी।
 

मैं अपने मीठे में से शेयर करना बिल्कुल पसंद नहीं करता हूँ और न ही मेरा बेटा, परंतु जब भी आईसक्रीम आती है तो मेरा बेटा फ़टाफ़ट अपनी आईसक्रीम खत्म कर लेता है, और फ़िर हमें प्रवचन देता है कि अपनी चीजें शेयर करके खानी चाहिये, हम हर बार अपनी आईसक्रीम शेयर कर लेते हैं।
विवेक जी अपने सुपुत्र हर्ष के साथ

एक दिन फ़िर आईसक्रीम आई तो हमने जल्दी जल्दी अपनी आईसक्रीम खत्म कर ली और फ़िर अपनी चम्मच बेटे के पास लेकर पहुँच गये कि चलो अब हमसे अपनी आईसक्रीम शेयर करो, बेटे हमारा मुँह देख रहा था और फ़िर चुपचाप अपनी आईसक्रीम में से १-१ बाईट खिलाता रहा, फ़िर जब बहुत ही अति हो गई तो हमसे बोला कि नहीं बच्चे शेयर नहीं करते केवल बड़े शेयर करते हैं।

हम भी अपनी चम्मच लेकर उनकी आईसक्रीम के पास डटे रहे कि नहीं हम तो शेयर करके ही खायेंगे। और जब तक आईसक्रीम खत्म नहीं हो गई तब तक अपने बेटे के साथ बच्चा बनकर उसकी आईसक्रीम खाते रहे।
 
रवि धवन के हनुमान  बम और अनार बम
 

ब्लॉग सभा में सबके सामने अपनी ही ठांय करना मजेदार लग रहा है। साथ ही बच्चों वाले काम के बारे में बताते-बताते यह भी महसूस किया अब आगे से कुछ न कुछ बच्चों वाले काम करते ही रहना है। क्या पता, फिर से ठांय करनी पड़ जाए। और कोई कह दे 'तू बच्चा है क्या।'
 
'हाल में तो कुछ नहीं किया। चार माह पूर्व मैं अपने चार साल के भतीजे और ढाई साल की भतीजी को लेकर पार्क में घूमने चला गया। भतीजे को प्यार से हनुमान बम और भतीजी को अनार बम कहकर बुलाते हैं। नाम से पता चल गया होगा कि दोनों कितने खतरनाक होंगे। तो जी, पार्क में पहुंचते ही दोनों ने दौड़ लगाना, दूसरों के पाले में घुसकर सामान उठाकर लाना और हल्ला मचाना शुरू कर दिया। मुझे भी जाने क्या सुझा, मैं भी उनके साथ घुटनों पर रेस लगाने लगा। अपने साथ लाया सारा सामान चॉकलेट, पॉपकॉर्न और फुलवडिय़ां पूरे पार्क में हम तीनों ने बिखेर कर रख दी। कुछ मिनटों बाद मुझे लगा कि कुछ गड़बड़ है यार। इधर-उधर देखा तो आसपास के लोग हमें घूर रहे थे। मैंने सोचा, बेटा गड़बड़ हो गई इन शैतानों के चक्कर में। मैंने चुपके से पार्क में बिखरे सामान को समेटा और दोनों को स्कूटी पर बैठाकर वापस घर लौटने में ही समझदारी दिखाई।  एक ने तो बोल ही दिया था 'पागल' हैं तीनों। पर मेरे नजरिए में वो पागलपन के कुछ पल बड़े मजेदार थे।
 
दीदी आपकी परिचर्चा ने अंतर्मन को झकझोर दिया। हमारे दोनों बम भले ही आज शैतानियां कर रहे हैं। पर दोनों का
 बचपना भी कब तक रहेगा। वो भी एक दिन हमारी तरह {समझदार (?)} हो जाएंगे।

 इस्मत जैदी का अहद ए तिफ़्ली .....


अरे रश्मि जी ! ये तो आप ने मेरा प्रिय विषय  याद दिला दिया ,ये जीवन का  वो दौर है जिसे हम प्रतिदिन ,प्रतिपल याद करना  और जीना चाहते हैं लेकिन ज़िम्मेदारियों और हालात के बोझ तले 
ये सुखद एहसास दबने लगता है ,फिर भी मैं तो अक्सर ही जीवन के इन बहुमूल्य क्षणों को जीने की कोशिश करती रहती हूं ,जब मेरा बच्चा छोटा था तो उस के बहाने से मैं ग़ुब्बारे लाया करती थी जब कि उसे कभी शौक़ नहीं था और मैं उस के बहाने से खेलती थी ,आज भी मैं खिलौनों की दुकानों की ओर आकर्षित हो जाती हूं 
मैं गोवा में हूं और यहां बारिश बहुत होती है ,बरसात के मौसम में हमारे यहां  काग़ज़ों का बहुत इस्तेमाल होता है कश्तियां बनाने  के लिये ,हालांकि यहां बारिश का पानी रुक नहीं पाता लेकिन फिर भी मैं बारिश के तेज़ होते ही जल्दी जल्दी काग़ज़ी कश्तियां ले कर नीचे भागती हूं और अगर थोड़ी दूर भी उसे बहता हुआ देख लूं तो जो  ख़ुशी मिलती है वो बयान नहीं कर सकती ,
मुझे ऐसी कोई ’एक’ बात याद  नहीं  जो मैं यहां लिख सकूं ,क्योंकि जब भी समय मिला मैंने अपना बचपन जीने की कोशिश की  कभी बारिश में नाव चला कर कभी ग़ुब्बारे  और छोटी छोटी कारें खेल कर ,कभी अपने बच्चे के प्रोजेक्ट का नन्हा सा घर बना कर ,कभी उस के साथ उस के खेलों में हिस्सा लेकर ,बस अलग अलग वक़्तों में अलग अलग तरीक़े अपना कर 
मेरा मानना है कि जीवन के अंतिम क्षणों तक हर व्यक्ति में एक बच्चा छिपा होता है जो उसे समय समय पर अपने होने का एहसास दिलाता रहता है  ,अब ये हम पर निर्भर है कि हम उसे जगा कर रखें या थपक थपक कर सुला दें ,अगर जगा कर रखेंगे तो ये हमें रोने नहीं देगा , हमें परेशानियों में भी ख़ुश रहने की शक्ति  देगा ,मेरी कोशिश तो यही होगी कि इस जज़्बे को हमेशा सहेज कर रखूं 

 हैप्पी बर्थडे राजेश उत्साही जी (बिलेटेड ही सही )
बात तबकि है जब हम तीसरी कक्षा में पढ़ते थे। मप्र के मुरैना जिले की सबलगढ़ तहसील के एक छोटे से रेल्‍वे स्‍टेशन इकडोरी पर पिताजी की नियुक्ति थी। गांव कोई दो-तीन किलोमीटर दूर था स्‍टेशन से। गांव का नाम रघुनाथपुर था। रेल्‍वे स्‍टेशन के आसपास बस स्‍टाफ के चार पांच परिवार ही रहते थे।
 यह वह दौर था जब चम्‍बल के बीहडों में माधोसिंह और मोहरसिंह जैसे दस्‍यु सरदारों के नाम से सारा इलाका कांपता था। सो हर गांव में सुरक्षा के लिए पुलिस की एक अतिरिक्‍त टुकड़ी हमेशा रहती थी।
 दिवाली की रात थी। हम रेल्‍वे प्‍लेटफार्म पर फटाके फोड़ने में जुट थे। पिताजी ने ग्‍वालियर से रस्‍सी बम लाकर दिए थे। सुनसान होने के कारण फटाकों की आवाज बहुत तेज गूंज रही थी।  मैंने एक बाद एक करके आठ दस बम फोड़ डाले।
 थोड़ी देर बाद क्‍या देखता हूं कि पांच-छह पुलिस वालों का दल गांव की तरफ से दौड़ता चला आ रहा है। जब दल पास पहुंचा तो मुझे देखकर उन्‍होंने कहा, ‘अरे मुन्‍ना तुम हो।’ मैंने सोचा भला इन्‍हें मेरा नाम कैसे पता चला। बचपन में मुझे घर में मुन्‍ना ही कहा जाता था। ये तो बाद में समझ आया कि छोटे लड़कों को मुन्‍ना और लड़कियों को मुन्‍नी सामान्‍य तौर पर कहा जाता है।
 खैर मुझे कुछ बात समझ में नहीं आई। तभी उनमें से एक बोला,  ‘मुन्‍ना अब फटाके चलाना बंद कर दो।’
 मैंने कहा, ‘क्‍यों।’
 ‘अरे बेटा गांव वाले समझ रहे हैं कि डाकू आ गए हैं। सब डर के मारे अपने अपने घरों में बंद हो गए हैं। तुम्‍हारे फटाकों की आवाज सुनकर वे अपनी पूजा-पाठ भी भूल गए हैं।’ उनकी बात सुनकर मैं फटाके चलाना भूल गया।
 कोई दिवाली याद रहे न रहे पर यह दिवाली भुलाए नहीं भूलती। और मित्रों आप में से कई जान चुके होंगे और जिन्‍होंने न जाना हो वे जान लें कि अपन चाचा जी से एक दिन पहले पैदा हुए थे। यानी 13 नवम्‍बर को। तो अपन को हैप्‍पी बर्थ डे बोलना मांगता
  
बच्चों के साथ बच्चों सी शरारत राम त्यागी जी की 
 
यहाँ निकुंज की soccer क्लास के अंत के दिन (हर सीजन के ) ये लोग पेरेंट और बच्चों के बीच एक गेम रखते हैं, किसी का पिता तो किसी की माँ तो किसी के ग्रांड पेरेंट्स एक पक्ष में रहते हैं तो बच्चे दूसरे पक्ष में ! उस दिन बच्चों के उत्साह देखने का रहता है , और हम लोग भी अपनी पूरी ताकत जीत के लिए झोंक देते हैं पर बच्चों की टीम हमें जीतने ही नहीं देती एक भी बार - इस समय जब निकुंज (और अन्य) बच्चों की टीम जीतती है तो हार में भी खुशी का वो अहसास होता है जिसको शब्दों की सीमा में नहीं बाँध सकता !
 
जब बच्चो के साथ WII गेम खेलता हूँ तो बस दोनों बाप बेटो में जो लड़ाई होती है उसका शोर तो बगल वाले घर तक भी जाता है और तब मेरी पत्नी को कहना ही पडता है की डैडी से मत लड़ो वो तो बच्चों से भी ज्यादा बच्चे हो जाते हैं,  जब निकुंज जीतने वाला होता है तो उसको  चिड़ा चिड़ा कर हराने में जो मजा आता है उसको क्या बयां करूँ, हाँ अंत में स्पोर्ट्स में हार मेरी ही होती है पर ये हार भी निराली होती है - आनंद देने वाली हार 
 
एक बचपन का किस्सा याद आ रहा है,  तब शायद में और मेरी बुआ का लड़का दोनों ही आठवीं कक्षा में थे, दो भाई एक कक्षा में थे तो ज़रा दादागिरी भी चलती थी. एक बार मास्साब को कक्षा के दरवाजे पर खड़े होकर उनके सेवक बनकर बोल दिया कि पधारिये महाराज !!  और पूरी क्लास हंस पड़ी फिर क्या था मास्साब का गुस्सा असमान पर और मुंह लाल , जड़ दिए कई डंडे और तमाचे धडाधड  :(  ऐसे तैसे पीरियड पूरा हुआ  तो जब मास्साब निकल गए तो जैसा होता है कि एक लडके ने चिडाने के कोशिश करी तो तब तो कुछ नहीं बोला, और बाद में मैं और मेरा भाई उसे बाहर दोस्त बनाकर ले गए और उसकी धुनाई कर दी , लड़का गोरे रंग का था तो मुंह लाल हो गया और बाटा के जूतों के निशान साफ उसकी व्यथा परिलक्षित कर रहे थे , बाद में घर तक बात आई तो घर पर फिर हम दोनों की खिंचाई हुई  - अब सोचता हूँ तो बड़ा मजाकिया किस्सा लगता है :-)  
 
तंगम और राजी 
मेरी  नहीं, ये सब 'राजी' और 'तंगम' की कारस्तानी थी

जब भी कोई कह देता है..'बिलकुल बच्चों जैसी हरकतें हैं'....' बच्ची हो बिलकुल ' तो एक पल को ठिठक कर अपना बड़ों वाला लबादा ओढ़ लेती हूँ फिर पता नहीं कब वो लबादा खिसक जाता है और युज़ुअल सेल्फ में लौट  आती हूँ.... अगली बार टोके जाने तक :)

पर ये बचपना खासकर तब अपने शिखर पर होता है जब सिर्फ सहेलियों या  कजिन्स या  बच्चों का साथ हो. पिकनिक जाने पर दौड़कर झूला लूट लेना, बच्चों वाली see-saw पर जबरदस्ती किसी तरह बैठ जाना और एक सहेली को ऊपर ही टंगे रहने देना...चाहे वो कितना भी चिल्लाये. कोरस में गाना गाना तो चलता ही रहता है.
अभी हाल में ही कुछ सहेलियाँ और  बच्चे एक वाटर पार्क में गए. वहाँ हमारी शरारतें  देख, बच्चे दूर छिटक गए. शायद ईश्वर से मना रहें थे कि कोई पूछ ना बैठे, ये आपकी  मॉम्स हैं ??  :) (अब बड़े हो गए हैं तो उन्हें अपनी freedom भी चाहिए होंगी.)

वहाँ हमने wave pool  में गोल घेरा बनाकर घूमते हुए सारे नर्सरी राइम्स गा डाले. ऊँची ऊँची तेजी से घूमती राइड्स पर जोर से चिल्लाने की छूट भी थी. अब उम्र हो गयी है तो क्या , डर तो लगता ही है. पर पति और बच्चों के साथ उस तरह तो नहीं चिल्ला पाते, सहेलियों के साथ तेज आवाज़ में चीखते रहें और डर भी इतना कम हो गया कि २,३, बार एक ही राइड पर गए.{ आपलोग  भी आजमा सकते हैं...जोर से चिल्लाते रहने पर सचमुच डर नहीं लगता :)} पर सबसे मजा हमने लेज़ी रिवर में किया (लेज़ी रिवर एक लम्बा  सा पूल होता है जिसपर आप एक बड़ी सी ट्यूब पर अधलेटे से  होते हैं और वह धीरे धीरे बहती रहती है) वहाँ हम सबने एक दूसरे के हाथ पकड़ एक लम्बी सी चेन बना ली और किसी को भी आगे आने ही नहीं देते थे. दरअसल हमारे ग्रुप को देख, बाकी लोगों के चेहरे पर भी लम्बी सी मुस्कान खींची हुई थी.
पद्मजा,लवीना,शर्मीला,मैं और वैशाली


इस तरह के मौके तो अक्सर आ ही जाया करते हैं पर कभी कभी ये बचपन वाली हरकतें बहुत एम्बैरेसिंग भी हो जाती हैं. हम सहेलियों की एक आदत है. किसी का बर्थडे हो तो बाकी सब एक साथ 'हैपी बर्थडे '  गाकर उसे विश करते हैं. कभी-कभी सड़क के किनारे बच्चों के स्कूल बस का इंतज़ार करते हुए भी. दूर से ही बर्थडे गर्ल को आते देख  ,हम गाना शुरू कर देते हैं . हमारे बच्चे मुहँ फेर कर खड़े हो जाते हैं. एक बार मैं और 'राजी' कार से मॉर्निंग वाक के लिए गए थे (अब, इसमें हंसने जैसा क्या है...जब ज्यादा फल सब्जी  लानी हो तो कार लेकर जाना ही पड़ता है ) अपनी वाक  ख़त्म कर, सारी खरीदारी कर हम घर की तरफ आने लगे तो याद आया, आज 'वैशाली' का बर्थडे है. बस मैने किनारे गाड़ी खड़ी की और ध्यान नहीं दिया कि वो जगह सीनियर सिटिज़न की थी ( यहाँ जगह जगह शेड बने हुए हैं, वहाँ कुछ बेंच और अखबार सीनियर सिटिज़न के लिए रखे  होते हैं )जैसे ही मोबाइल का   स्पीकर ऑन कर हम दोनों ने 'हप्पी बर्थडे' गाना शुरू किया .दो बुजुर्ग गाड़ी के सामने आ कर कुछ - कुछ  बोलने लगे. अंदर जाने का रास्ता कार ने ब्लॉक कर रखा था . शीशे ऊपर होने की वजह से सुनायी तो नहीं दे रहा था. पर आँखों  और हाथों की मुद्राओं से लग रहा था, वे बड़े गुस्से में हैं. अब बीच में गाना कैसे रोकें? खैर जल्दी से गाना ख़त्म कर  विश किया, सुना भी दिया ,'तेरी वजह से डांट पड़ रही है' और गाड़ी लेकर भागी. ऐसे ही महिला ड्राइवर बदनाम होती हैं..दो बातें और जुड़ गयीं.

शर्मीला, वैशाली,मैं,तंगम और अनीता
पर सबसे ज्यादा अंक ले गयी, तंगम के साथ की गयी हरकत ने. उस दिन 'राजी' (हमारी योगा टीचर ) के बिल्डिंग की लिफ्ट बंद थी और योगा क्लास में सिर्फ मैं और तंगम थे. सातवीं मंजिल से हमें सीढियां उतर कर आना था. दो सीढ़ी उतरते ही मैने तंगम को टोका, "क्या बच्चों जैसा  धप धप करके चल रही हो....बहुत आवाज़ कर रही हैं तुम्हारी चप्पलें" उसने शैतानी से थोड़ी और आवाज़ की .मैं  हंसने लगी  तो मेरा हाथ पकड़ कर बोली, "लेट्स, डू इट टुगेदर " और फिर हम दोनों, बच्चों की तरह चप्पल  फटकारते धप धप आवाज़ करते सीढियां उतरने लगे. हर फ्लोर पर  सशंकित हो देखते ,'अभी कोई दरवाजा खुलेगा'. और अपनी स्थिति का ख्याल ना कर हम सामने वाले का सोचने लगते कि वे बच्चों की जगह दो महिलाओं को देखेंगे तो क्या हालत होगी उनकी ?. पर किस्मत अच्छी थी, एक भी दरवाज़ा नहीं खुला और हंसी से दोहरे होते हम बिल्डिंग से बाहर निकल आए. वाचमैन भी हमें हैरानी से देख रहा था.ग्राउंड फ्लोर से एक आंटी भी पर्दा खिसका कर देखने लगी, 'इन पागलों सी हंसी का राज़ क्या है'

पर ये सारा आइडिया तंगम का था, मेरा नहीं ,(तंगम  के बनाए स्वादिष्ट केक और चौकलेट्स की तस्वीरें इस लिंक पर देखी  जा सकती  हैं) हाँ! इस परिचर्चा का आइडिया  मैने चुरा लिया वहाँ से.

{आप सबका बहुत बहुत शुक्रिया, इस 'परिचर्चा' को सफल बनाने के लिए.
आप  लोगों ने समय  निकाल कर अपने संस्मरण हमसे बांटे  और फिर सबने पढ़कर अपनी प्रतिक्रिया भी दी. सबको कोटिशः धन्यवाद .

अब यह परिचर्चा इतनी पसंद आई तो फिर आपलोग तैयार रहें...कभी भी कोई सवाल आपके इनबॉक्स में टपक पड़ेगा :)}

Tuesday, November 16, 2010

आज प्रस्तुत हैं..रश्मि प्रभा, ललित शर्मा, ताऊ रामपुरिया, वाणी गीत, शरद कोकास , रेखा श्रीवास्तव , अविनाश वाचस्पति के बचपने भरे किस्से

रश्मि प्रभा जी के हाथों की बर्फी, अपने रिस्क पर खाएं

बच्चों जैसे काम के लिए अंतिम दिन ? कद से हूँ बड़ी , मन से छोटी तो काम वैसे ही
हर दिन .......
१४ नवम्बर ... जब कद से छोटी थी तो कुछ ख़ास लगता था , स्कूल में टॉफी का मिलना दावत 
जैसा ही लगता था - 'चाचा नेहरु' कहते एक अपनापन का बोध होता, एक परिवार सा ख्याल दिया जाता 
था घर में . 
मन तो आज भी बच्चा है , पर अब तो बच्चे बच्चों की तरह नहीं करते तो स्वाभाविक है कि हमारे बचपने 
को लोग अस्वाभाविक दृष्टि से देखते हैं ... फिर भी कुछ मस्ती चुराने में बहुत मज़ा आता है .
चलिए यादों की सांकलें खोलती हूँ ---
तब मैं दसवीं की छात्रा थी. अप्रैल फूल बनाने की धुन थी पहली अप्रैल को ... हमउम्र के साथ क्या मज़ा !बड़ों को 
बनाने की योजना थी तो मासूम सा चेहरा लेकर शिक्षकों के पास गई ' सर मेरा बर्थडे ऐसे दिन को है कि कोई मानता ही
नहीं ' कुछ शिक्षक मुस्कुराये , कुछ ने सर हिलाया ... एक शिक्षक ने कहा 'मैं आऊंगा' ... मैं मुस्कुराते हुए चल दी .
              
घर में हमने चावल के पानी का (माड़ का ) बर्फी बनाया ... उसे खूब गाढ़ा किया चिन्नी मिलाकर फिर  जमा दिया और बर्फी की शक्ल में काट लिया ... मास्टर साहब के आते बड़ी विनम्रता से उनके आगे उसे रखा और भाग गए , मास्टर साहब ने एक नहीं दो नहीं तीन तीन बर्फी बारी बारी खाए और हम सारे भाई बहन हँसते हँसते लोटपोट हो गए . हमारी बेबाक हँसी से .वे सतर्क हुए ,.......... हमारी माँ को बहुत बुरा लगा और उन्होंने उनको सही ढंग से नाश्ता दिया . 
उनके जाने के बाद हमें डांट भी पड़ी पापा से , पर दांते दांते वे भी हंसने लगे मेरी शैतानी मुस्कुराहट के आगे . 
वैसे आपको बता दूँ , कुछ बातों में मैं आज भी वैसी ही हूँ .... अपने बच्चों के साथ मैं पूरा बचपन जीती हूँ

ललित जी सुना रहें हैं...,आम-इमली और लाठी-डंडे के साथ की दास्तां

जैसे ही गर्मी के दिन आते हैं,आम और इमली के पेड़ों पर फ़ल लगते हैं। इमली की खटाई की मिठास ऐसी होती है,जिसका नाम सुन कर ही मुंह में पानी आ जाता है। यही हाल आम की कैरी के साथ भी है। उसकी भीनी खुश्बु मन को मोह लेती है। हमारे यहाँ पकी हुई इमली के बीज निकाल कर उसे कूटकर नमक मिर्च मिलाके "लाटा" बना के खाया जाता है। बच्चों को बहुत प्रिय होता है। वही कैरी खाने के लिए घर से ही नमक मिर्च पुड़िया में बांध कर जेब में रख लेते थे कि पता नहीं कब किसके आम के पेड़ पर अपना दांव लग जाए।


बचपन की बातें तो कुछ और ही होती है। वह भी गांव का बचपन जीवन भर याद रहता है। हमारे दिल्ली के रिश्तेदारों के बच्चों को यह पता ही नहीं की मुंगफ़ली में फ़ल कहां लगता है? उपर लगता है कि जड़ में लगता है। लेकिन गांव के बच्चों को दिल्ली-बांम्बे तक की जानकारी होती है। टीवी और फ़िल्मों में सब दिखा दिया जाता है। जिससे वे समझ जाते हैं कि शहर कैसा होता है। लेकिन फ़िल्मों में यह नहीं दिखाया जाता कि मुंगफ़ली का पौधा कैसा होता है। आम और इमली पेड़ पर कैसे लगते है।


एक बार की बात है जब हम 7वीं में पढते थे। मेरे दो स्थायी मित्र थे एक कपिल और एक शंकर।हम सारी खुराफ़ातें साथ मिल कर ही करते थे। क्लास में खिड़की के पास बैठते थे और उसके साथ ही अपनी सायकिल रखते थे। अगर किसी टीचर का पीरियड पसंद नही है तो टीचर के ब्लेक बोर्ड की तरफ़ मुंह करते ही सीधा खिड़की से कूद कर सायकिल उठाई और रफ़ूचक्कर हो लेते थे। 

हमारे स्कूल के पीछे आम के बड़े-बड़े कई पेड़ थे। एक दिन कपिल ने बताया कि इन आम के पेड़ों में बहुत सारे आम लगे हैं, कहां हम दो चार कैरियों के लिए चक्कर काटते हैं मरघट तक में, यहीं हाथ आजमाया जाए। मैने भी देखा एक पेड़ तो आम से लदा हुआ था जहां भी हाथ डालते आम ही आम। बस योजना को मुर्त रुप देने की ठान ली। दोपहर के बाद खिड़की से जम्प मारा और चल दिए आम के पेड़ तक। शंकर को सायकिल की चौकिदारी करने के लिए खड़ा किया। उसे चेताया कि अगर कोई चौकिदार या आम का मालिक आ गया तो सायकिल लेकर भाग जाना और चौरस्ते पर मिलना। वहां से हमारे आए बिना कहीं मत जाना तुझे तेरा हिस्सा बराबर मिल जाएगा।

उसे चेता कर हम दोनो चढ गए आम के पेड़ पे। आम भरपूर थे, पहले तो पेड़ के उपर बैठ कर खाए जी भर के, शंकर सायकिल की चौकिदारी करते रहा। एक दो आम उसके पास भी फ़ेंक दिए जिससे वह खाली मत बैठा रहे, आम खाने का आनंद लेता रहे। हमने अपनी जेबें भर ली, लालच और बढ़ा हम आम तोड़ते ही जा रहे थे। आम के पेड़ की लकड़ी बहुत कमजोर होती है अगर टूट जाए तो दुर्घटना होना लाजमी है। इसलिए संभल कर काम में लगे थे।


तभी अचानक जोर का शोर सुनाई दिया। उपर से देखा तो 10-15 लोग हाथों में लाठी लिए जोर जोर से गाली बकते हुए आ रहे थे-"पकड़ो पकड़ो साले मन आमा चोरावत हे,मारो-मारो झन भागे पाए (पकड़ो सालों को आम चोरी कर रहे हैं, मारो मारो भागने ना पाए) मैने शंकर की तरफ़ देखा तो वह सायकिल को वहीं छोड़ कर भागा जा रहा था 100 की रफ़तार में, जैसे किसी ने पैट्रोल लगा दिया हो। सायकिल वहीं खड़ी थी, अगर वो सायकिल ले गए तो चार-आठ आने के आम के चक्कर में घर में धुनाई पक्की थी। वे सब लाठियाँ लेकर पेड़ के तने को पीट रहे थे-"उतरो साले हो नीचे, आज तुम्हारा हाथ पैर तोड़े बिना नहीं छोड़ेगें"। अब क्या किया जाए ? पेड़ पर पत्तियों के बीच छिपे-छिपे सोचने लगे।


कपिल बोला-" देख मै पेड़ की एक डाल को हिलाता हुँ और तु आम तोड़ कर आधा खा के नीचे फ़ेंकना शुरु कर दे। फ़िर जैसे ही ये हमें आम तोड़ने से मना करेंगे तो पहले सायकिल पेड़ के नीचे मंगाएगें और इन्हे पेड़ से दूर हटने बोलेंगे। तु पहले उतर कर सायकिल ले कर भाग जाना, मेरी फ़िक्र मत करना मै तुम्हे चौरास्ते पर ही मिलुंगा।" मैने उसकी बात मान ली। 


कपिल ने पेड़ की डाली हिलाई, पड़-पड़ आम नीचे गिरने लगे। मै भी आधे आम तोड़ कर नीचे फ़ेंकने लगा। कपिल जोर से चिल्लाया-" तुम लोग पेड़ के पास से हट जाओ और सायकिल को पेड़ के नीचे रखो नहीं तो पेड़ के पूरे आम गिरा दुंगा।" उसका कहना था कि उन लोगों को सांप सुंघ गया। क्योंकि आम अभी छोटे ही थे अगर गिरा देता है तो मारने के बाद भी नुकसान पूरा नहीं होगा और वे हमें अभी तक नहीं देख पाए थे कि हम कौन हैं? उन्होने आपस में बात की और एक बोला-"देखो भैया हो आम मत तोड़ो नुकसान हो जाएगा, तुम लोग नी्चे उतर आओ हम लोग कुछ नहीं कहेंगे"। कपिल ने अपनी मांग फ़िर दोहराई। तो उन्होने सायकिल पेड़ के नीचे लाकर रखी। 

मै पेड़ से उतर कर सायकिल के पास कूदा और सायकिल को दौड़ा कर एक ही छलांग में घोड़े की पीठ पर बैठने वाले अंदाज में सीट पर बैठा तो आवाज सुनाई दी- "ये दे तो फ़लांना महाराज के लईका हवे गा"।(ये तो फ़लां महाराज का लड़का है) बस फ़िर तो मैने चौरास्ते पर पहुंचकर दम लिया। थोड़ी देर सड़क पर बैठा और कपिल का इंतजार करने लगा। शंकर को मन ही मन बहुत गालिंयां दे रहा था कि-"साला हमें फ़ंसा कर भाग लि्या।" आधे घंटे बाद शंकर और कपिल कैरियों की जेबें भरे हुए आ रहे थे। शंकर ने कहा कि-"इतने सारे लोगों को लाठी लेकर आते देखकर मै बहुत डर गया। सायकिल की तो मुझे याद ही नहीं आई-मै तो सीधा ही छुट लिया। मु्झे माफ़ करना।" इस तरह आम खाए हम लोगों ने, आज भी बहुत याद आती है बचपन की खुराफ़ातों की और बाल सखाओं की

जब रेखा जी टीचर ना होकर बस एक दोस्त थीं
 
अरे बचपने की बात कर रही हैं, बच्चों के साथ तो बचपन आ ही जाता है. मैंने तो टीचर होकर  भी बच्चों जैसी मस्ती की और वह भी डिग्री कॉलेज के बच्चों के साथ. वाकया १४ नवम्बर  का ही था. मैंने एस डी कॉलेज में राजनीतिशास्त्र  विभाग में प्रवक्ता के पद पर काम कर रही थी. मेरे पास रिसर्च का पेपर था और रिसर्च लेने वाले सभी छात्रों को क्लास के बाद भी मेरे साथ रहना पड़ता था. कुछ अधिक ही खुले हुए थे. सब लोगों ने आपस में विचार करके योजना बनाई कि मैडम बालदिवस पर हमको कहीं पिकनिक पर ले चलिए. ये कोई बच्चों का स्कूल तो था नहीं कि चल दिए. मैंने उनको समझाया कि ये संभव नहीं है. लेकिन बच्चे तो बच्चे उन लोगों ने प्रिंसिपल और हैड से अनुमति ले ली . लड़कियाँ इसलिए  जा सकती थी कि मैडम ले कर जा रही हैं. लेकिन साथ में और कोई टीचर स्टाफ जाने के लिए कोई भी तैयार नहीं था विभाग में मैं अकेली महिला थी . बच्चे भी चाह रहे थे कि मैडम के साथ अधिक मस्ती कर सकते हैं.
                       बाल दिवस आया. मेरा मूड अब भी बिल्कुल नहीं था. सभी ने मिलकर मिनी बस की और मेरे घर पहुँच गए. अब कोई चारा न था और मुझे भी जाना ही पड़ा . सबसे पहले उन लोगों ने कानपुर के पास ही एक जगह है भीतरगांव जहाँ पार गुप्त कालीन मंदिर है. उसको देखने के लिए चल दिए सोचा था कि प्राचीन ऐतिहासिक मंदिर है वहाँ पर  अच्छा सा प्रांगण  होगा वहीं पर पिकनिक होगी और फिर लौट आयेंगे लेकिन वहाँ पहुंचे तो सिर्फ एक मंदिर था और उसके आसपास खुली जगह भी न थी कि बैठ कर खा पी सकते . मंदिर देख कर सोचा अब कहाँ चले? ये तो कुछ ही घंटे में काम ख़त्म होता नजर आता है. लड़कों ने नबावगंज पक्षी विहार चलने के लिए योजना बना ली. पक्षी विहार वाकई ऐसी जगह थी जहाँ की आराम से बच्चे अपने मकसद में कामयाब हो रहे थे.
                        वहाँ रेसोर्ट के तरह से जगह थी और उसके सामने बड़ा सा गार्डेन था और बड़ा सा घास का मैदान. सबने वही बैठ कर खाना खाया और फिर बच्चे तो आ गए  मौज मस्ती के मूड में. मैडम हम लोग खेलेंगे - मैंने कहा कि मैं तो बैठती हूँ तुम लोगों जो करना हो करो और फिर जब चलना हो तो चल देंगे . वास्तव मैं उस समय अपने बच्चों को मिस कर रही थी क्योंकि छुट्टी के दिन ही हम बच्चों के साथ रह पाते हैं , लेकिन बच्चे वहाँ मैडम कहाँ मान रहे थे उनको लग रहा था कि मैं उनकी हमउम्र हूँ और वे अपने गेम में घसीट ले गए. कबड्डी, बैडमिन्टन और अन्ताक्षरी सब कुछ खेल डाला. उतने समय के लिए लगा नहीं कि मैं टीचर हूँ और ये हमारे छात्र है. डांस से लेकर सब कुछ किया गया. वह दिन शायद इतनी मस्ती मैंने अपने स्कूल या कालेज टाइम में नहीं की थी. हमारे समय में एक अनुशासन था और छोटी जगह का माहौल कुछ अलग ही होता है. उस समय  मैं भूल ही गयी थी कि मैं दो बेटियों की माँ बच्चों के साथ बच्चा बन कर नाच भी रही थी और खेल भी रही थी. वह दिन कभी भूल नहीं पाऊँगी.

 
ताऊ रामपुरिया जी का बचपना भला क्यूँ जाए

यह बात पिछली होली यानि मार्च - 2010  की है. आप जानते ही हैं कि होली पर रंग से बचना बडा मुश्किल है. कितनी ही कोशीश करो कोई ना कोई पकड कर काले पीले लाल रंग डाल ही देता है और बस शुरू हो जाती है रंगो की छूआछूत वाला रोग. यानि अब हम भी टोली में शामिल. तो पिछली होली पर तय हुआ कि इस बार होली पर कहीं बाहर जाकर छुट्टियां बिताई जायें. बेटे ने उसके दोस्तों के साथ पहले ही औली (उत्तराखंड) जाने का प्रोग्राम बना रखा था.


हमारे एक पारिवारीक मित्र हैं दिल्ली में, वो भी इन रंगों से तंग आये हुये थे सो उनसे बात हुई, वो बोले आप दिल्ली आ जाईये फ़िर यहां से जिम कार्बेट पार्क चलते हैं. हालांकि समय बहुत कम था सो जैसे तैसे तैयार होकर निकल लिये. मित्र और उनकी पत्नि हमको एयरपोर्ट पर ही मिल गये जहां से सीधे हम जिम कार्बेट पार्क के लिये निकल गये.


शाम तक जिम कार्बेट पार्क पहुंचे, वहां पता चला कि अंदर बाहर कहीं भी कोई होटल उपलब्ध नही है. छुट्टियों की भीड बहुत ज्यादा हो गई थी. बडी निराशा हुई. मित्र भी बेचारे बडे शर्मिंदा हुये कि उन्होने पहले होटल बुकिंग क्यों नही करवाई?


इसी सब पर बात चल ही रही थी कि बेटे का फ़ोन आगया कि हम लोग कहां हैं? हमने सारी बात उसे बताई तो वो बोला कि आप लोग औली आजाईये, बहुत शानदार जगह है और होटल भी खाली है, सारे रास्ते बर्फ़ मिलेगी. हम लोगों ने भी हिम्मत करके रात को ही गाडी औली की तरफ़ बढा दी. सुबह होते होते औली पहुंच गये. नजारे वैसे ही थे जैसे बेटे ने बताये थे. एक दम स्वर्गिक आनंद आगया.


वापसी हमने होली वाले दिन सुबह ही की. बीच पहाडी रास्ते में एक छोटा सा गांव पडा, देखा सामने कुछ बच्चे खडे थे. गाडी रोक कर पूछा तो पता चला होली का चंदा मांग रहे थे. कुच बच्चों के हाथ में रंग और गुलाल भी था.


पता नही मुझे क्या सूझा कि मैं गाडी से उतर गया, बच्चों को कुछ रूपये दिये, उनसे रंग गुलाल लिया और उनको भी लगाया...उन्होनें भी हमको लगाया...यहां तक तो सब ठीक ठाक था. इसके बाद मुझे पता नही क्या हुआ कि मैने अपने मित्र को भी लगा दिया...उनकी पत्नि को भी लगा दिया और ताई (मेरी नही आपकी) को भी लगा दिया. वो नानुकुर करते रह गये और वहां उस पहाडी गांव की सडक पर हमने जम कर होली खेल ली. बाद में कुछ शर्म भी महसूस हुई कि जिस से बचने को घर छोडकर यहां इतनी दूर आये थे वही काम कर बैठे.:)


पत्नि कुनमुनाती सी बोली - इतनी दूर घर से आकर भी रंग नही छूटते तुमसे? जब देखो बचपना करते रहते हो? 

भगवान जानें कब जायेगा तुम्हारा बचपना?

अविनाश वाचस्पति : कबूतर से बिल्ली में 
 तब्दील होता ,बचपन
अब पिछले पत्र में मेरा बचपना ही तो झलक रहा है, बल्कि यूं कहिए कि झांक रहा है सिर उठा उठाकर। जब आप देखती हैं तो आंखें बंद कर लेता है और सोचता है कि मेरे बचपने को कोई नहीं देख रहा है। बचपना कबूतर है। जैसा सीधा कबूतर। कबूतर तो रहो पर मिट्टी का माधो मत बनो। मिट्टी का कबूतर बन सकते हो। वो भी सीधा ही होता है। पर उससे भी सीधा बचपना। कबूतर का बिल्‍ली होना, बचपन का पूरी तरह खोना है, वैसे जब बचपन पूरी तरह खो जाता है तब या तो सौदागर हो जाता है या हो जाता है भेडि़या। यही इंसान से जानवर बनने की प्रक्रिया है। 
जिनका बचपन कबूतर ही रहता है, न तो बिल्‍ली हो पाता है और न हो पाता है भेडि़या, वो शेर तो हो ही नहीं सकता। वो कबूतर मरने के लिए अभिशप्‍त है, उस कबूतर का अंत भी बिल्‍ली के झपट्टे से ही होना है। हर बिल्‍ली चौकस है, उसे मालूम है जो कबूतर है, वो बिल्‍ली नहीं हुआ है और जब तक वो बिल्‍ली हो, तब तक उसे कबूतर भी न रहने दो। इसी होने में बिल्‍ली का जायका है, उसका स्‍वाद है। उसकी वीरता है। इसी वीरता के चलते कबूतर सदा से हतप्रभ है और वो सदा ही हैरान होता रहेगा और उसकी आंखें होती रहेंगी बंद। 
कबूतर बिल्‍ली का किस्‍सा आम होते हुए भी इसलिए खास है क्‍योंकि कबूतर, इस किस्‍से के आम होते हुए भी न तो बिल्‍ली हो पाता है और न भेडि़या। 


बचपन के वे सारे किस्‍से हैं , जब हम अपने लिए जगह कब्‍जाने के लिए लग रहते थे।  बचपन में मां की गोदी कब्‍जाने की होड़ सबसे ज्‍यादा रहती है, येन-केन-प्रकारेण तब चाहे अकारण ही रोना-चिल्‍लाना पड़े ताकि गोदी में हम जा पहुंचे, वैसे गोदी स्‍वयं सदा बच्‍चे तक पहुंचती रही है। फिर थोड़ा बढ़े हुए तो खेलने के लिए जगह कब्‍जाने का सिलसिला चालू हो जाता था। अरे वही जगह, जहां पर गिल्‍ली डंडा खेलना होता था कि कहीं और वहां पर खेलने न आ जायें। फिर खो खो में जगह कब्‍जाने से ज्‍यादा, छोड़ने की बेताबी, कि कोई पीछे से छूकर खो खो कहे और हम दौड़ पड़ें। थोड़ा और बढ़े हुए तो पत्रिकाओं पर कब्‍जा नंदन, पराग, चंदामामा, लोटपोट इत्‍यादि और नवभारत टाइम्‍स की माया दीदी से परिचित हुए, तभी मेरी एक कविता माया दीदी ने नवभारत टाइम्‍स में चाय शीर्षक से प्रकाशित की थी।  कब्‍जा इसलिए करते थे ताकि एकबार में ही पूरा पढ़कर छोड़ें। तब ऐसा भी बहुत शिद्दत से महसूस होता था कि ये पत्रिकाएं रोज क्‍यों नहीं प्रकाशित होती हैं, एक पत्रिका को लगातार पढ़ने में मात्र दो से तीन घंटे ही लगते थे और इसी का नतीजा था कि स्‍कूली पढ़ाई में सदा हाशिए पर ही रहे। 


कविता में बारूद भरने को बिखरे  पटाखे 
 ढूँढते शरद जी



यही कोई आठ नौ साल की उम्र रही होगी । दीवाली का अगला दिन था । सुबह सुबह भी हवाओं में बारूद की गन्ध विद्यमान थी । घर के भीतर स्टॉक में पटाखे खत्म नहीं हुए थे लेकिन एक चाहत थी कि जो पटाखे रात फूट नहीं पाए थे उन्हे बीन लिया जाये , सो बीनते बीनते ढेर सारे पटाखे इकठ्ठा हो गए । गुझिया का आनन्द लेते हुए , उन्हे (पटाखों को ) तोड़कर उनके भीतर का बारूद निकाला गया और एक कागज़ में इकठ्ठा कर लिया गया ।अब बारूद को ' भक्क ' से जलते हुए देखने का आनन्द लेना था । मगर एक गलती हो गई , बारूद के ढेर को एक किनारे से आग लगाने की बजाय मैंने ऊपर से आग दिखाई । नतीज़ा ..दायें हाथ की हथेली पीली पड़ गई । कुछ ही सेकंड में जब तीव्र जलन प्रारम्भ हुई , समझ में आ गया कि हाथ जल गया है । बस रो रो कर आसमान सर पर उठा लिया । भला हो पड़ोस की आँटी का जिन्होने तुरंत अपने देसी नुस्खे के साथ कच्चे आलू पीसकर उनका लेप जली हुई हथेली पर लगाया और उसे पैक कर दिया । आश्चर्य जलन कुछ देर में गायब हो गई और अगले दिन शाम तक हाथ बिलकुल ठीक हो गया ।            

अभी दस दिनों पूर्व ही दिवाली सम्पन्न हुई है । अक्सर यह किस्सा दिवाली के समय मैं बच्चों को सुनाता हूँ । हुआ यह कि इस दिवाली के अगले दिन सुबह सुबह बाहर निकला तो देखा बहुत सारे बिना फूटे हुए पटाखे पड़े हैं । बस उन्हे बीनना शुरू किया ही था कि भीतर से श्रीमती जी बाहर आई और कहा ... " क्यों आपका बचपना गया नहीं अभी तक ? "  हाहाहाहा " मैंने हँसकर कहा " मनुष्य बचपन से कितनी भी दूर निकल आये , उसका बचपना जीवन भर उसके साथ साथ चलता है ।
  
वाणी गीत की सलोनी सूरत के पीछे छुपी चुलबुली  सी नन्ही बच्ची 

जबसे बचपन पर कुछ लिखने को कहा है लगातार सोच रही हूँ कि बचपन बीता  ही कब ...बड़े हुए भी कब थे या कभी -कभी उदास होकर ये भी सोचता है कि बचपन जिया कब था ...भाई बहनों के परिवार में दूसरे नंबर के बच्चे अपना बचपन कितना जी पाते हैं , जल्दी बड़े हो जाते हैं ...शायद बेसमय जुदा  हुए उस बचपन का ही असर है जो बड़े होते -होते वापस लौटने लगता है ...
 
बड़ा सा संयुक्त परिवार रहा है हमारा ...लगभग एक दर्जन भाई-बहनों की सबसे बड़ी दीदी मैं ...तो दादागिरी तो खूब चलती रही ...बात -बात पर प्रसाद चढाने वाली धर्मपरायण अम्मा(दादी ) के बांटे हुए प्रसाद को इन छोटे भाई -बहनों से छीन लेना , कंचे -क्रिकेट-कैरमबोर्ड पर अपना हक़ जताना  आदि जैसे बेईमानी भरे कार्य भी खूब किये ...
सीटी पर गाना गुनगुनाना , या कभी -कभी बाथरूम से गले फाड़ कर चिंघाड़ते हुए गाना , देर रात किसी को भी मिस काल देकर परेशान करना  (अपना फोन नंबर तो देना ), बरसात में अपने बच्चों के साथ उछलकदमी  करना ...अपने ही बच्चों की  आइसक्रीम और चॉकलेट पर नजर गडाना...चंदा मांगने, जनगणना करने  आये बड़ों और बच्चों को अपने सवालों से परेशान करना .... ऑनलाइन फ्रेंड्स को खुद ही हेलो और फिर बाय कहना ...ये सब तो अभी भी बदस्तूर जारी है  ...अब अलग से कौन सा संस्मरण लिखूं ...

याद  करती  हूँ  ...कुछ सालों पहले एक नए विद्यालय के पहले ही सेशन  में कुछ समय पढ़ाने का अवसर प्राप्त हुआ ... पूरा स्टाफ नया ...कुछ लड़कियां थी जो इससे पहले दूसरे विद्यालयों में पढ़ा चुकी थी ...नए सेशन में नर्सरी के बच्चों का हाल बुरा होता है , नए माहौल में एडजस्ट  होने में उन्हें समय लगता है और तब तक उनकी चीख -पुकार , रोना धोना , बैग और खाना बिखेर देना जैसे कार्यक्रम चलते रहते हैं ...ऐसे में उन्हें संभलना बहुत मुश्किल हो जाता है ...उन रोते-ढोते   बच्चों को संभालना, क्लास में बैठाये रखना  बहुत ही मुश्किल काम था ...कोई उस क्लास में जाने को तैयार नहीं ...आखिर जोखम लिया मैंने ...कोई कहीं भाग रहा , कोई रोरोकर आसमान सर पर उठा रहा , कोई क्लास में जाने को तैयार नहीं , किसी ने अपना बैग फैला रखा ...समझ में नहीं आ रहा था कि कैसे संभालूं इन्हें ...फिर मैंने एक दो बच्चों से कहा ," आज पढेंगे लिखेंगे नहीं , सिर्फ खेलेंगे ...सुनते ही एक दो का तो बाजा  बंद हो गया ...दूसरों की सिसकियाँ धीमी ...माहौल को देखते हुए मैंने कहा जिसको मेरे साथ आईस पाईस खेलना हो क्लास में चलो ...बच्चे महाखुश...एक घंटे तक बच्चों के साथ आईस पईस , घोडा मार खाई जैसे गेम खेलते बच्चों के खिलखिलाते चेहरे को देख जैसे अपना बचपन फिर से लौट आया ...


(हमारे कुछ सुपर स्टार्स ब्लॉगर्स की नींद अब खुली :)...उनलोगों ने अब जाकर भेजे हैं संस्मरण तो कल कुछ और ब्लॉगर्स के बचपने  भरे किस्से )

Monday, November 15, 2010

"दिल तो बच्चा है,जी....किसका??..हमारे नामचीन ब्लॉगर..." (2)

(पिछली पोस्ट में आपने पढ़े, ज्ञानदत्तजी, इंदु जी,राज भाटिया जी, समीर जी, अनुराग जी, डा.दराल एवं अली जी के बचपने के किस्से....आज कुछ और ब्लोगर साथियों के कारनामे पढ़िए  )


पतिदेव का हाथों का ओक बना पानी लाना और साधना जी का घरौंदे बनाना


उम्र के इस मुकाम पर आकर बच्चों के साथ जब भी वक्त मिले, बाल-सुलभ क्रिया-कलापों में व्यस्त रहना, दीन-दुनिया की सुध भुलाकर बच्चों के साथ बच्चा बन जाना, उनसे छोटी-छोटी बातों पर स्पर्धा करना शायद सब बाबा-दादियों का सबसे ख़ूबसूरत समय होता है. बच्चों के साथ खेलते हुए इतना उत्साह भर जाता है मन में कि ना तो हाथ-पैर का दर्द याद रहता है ना ही कोई पारिवारिक समस्या ही मन को उद्वेलित करती है. आज आपको अपने उस अनमोल अनुभव के बारे में बता रही हूँ जब मैं ६-७ साल की बच्ची के चरित्र में पूरी तरह रूपांतरित हो गयी थी. और हर्ष उल्लास के समंदर में गोते लगा रही थी
(साधना  जी साड़ी में हैं )
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इसी वर्ष, फ़रवरी माह में, मैं और मेरे पति ,अपने समधी और समधिन  श्री एवं श्रीमति प्रसाद के साथ  मांडवी बीच घूमने गए   आम तौर पर बीच पर जो  मनोरंजन के साधन होते हैं,वहाँ भी थे. सजे हुए हाथी घोड़े और ऊंट .हाथी -घोड़े पर तो क्या बैठते बस साथ खड़े हो फोटो खिंचवा ली. बीच पर लहरों का शीतल स्पर्श महसूस करने के लिए हमने चप्पल उतार हाथों में ले ली. लहरों के लौटने के साथ जब रेत पैरों के नीचे से खिसकती तो बहुत मजा आता. हम चार जन ही थे. तभी देखा, किनारे पर रेत के छोटे-छोटे घरौंदे बने हुए हैं. बस सारा शर्म संकोच त्याग, मैं भी घरौंदे  बनाने बैठ गयी. मेरा बचपना देख सब हैरान थे ,पर संकोचवश किसी ने कुछ नहीं कहा. गीली रेत में गहरे पैर जमा, हाथों से थपकना शुरू किया. जब पैर निकाला तो छोटी सी गुफा बन गयी थी. कुछ उत्साह और बढ़ा. और मैंने  कुछ और आकार बना अपनी वास्तु कला का परिचय देना शुरू किया. अब मिसेज़ प्रसाद को भी मजा आने लगा था. वे भी नीचे बैठ गयीं और मेरे आग्रह पर घरौंदे बनाना शुरू कर दिया. प्रसाद जी और वीरेंद्र पहले तो गप्पें लगाते रहें, पर जब देखा कि हम घरौंदे बनाने में तल्लीन हैं तो उन्होंने भी दिलचस्पी लेनी शुरू कर दी. बड़ी बारीकी से हम दोनों की हस्तशिल्प का जायजा लेने लगे. दिन चढ़ने पर धूप तेज हो रही थी और रेत सूख कर भुरभुरी होती जा रही थी. वीरेंद्र और प्रसाद जी हमारा उत्साह बढाने को चुल्लू में पानी भर-भर कर लाने लगे, रेत को गीला करने को. साथ ही सलाह भी दे रहें थे और उनकी कमेंटरी भी चालू थी.

"देखिए, मिसेज़ वैद्य ने तो बाउंडरी भी बनायी है "

"मिसेज़ प्रसाद के घर का ले-आउट बहुत बढ़िया है "

तारीफ़ के बोल सुन उत्साह से हम फूले नहीं समा रहें थे और दूने उत्साह से अपनी कलाकारी दिखाने में जुटे थे. दोनों, एक दूसरे का घरौंदा भी गौर  से देख  रहें थे कि कौन सी नई चीज़ है जिसे कॉपी करके बनाया जा सके. शिल्प के दृष्टि से कोई भी उन्नीस नहीं था. पर बाल-सुलभ स्पर्धा मन में हिलोरें ले रही थी कि मेरा घरौंदा दूसरे के घरौंदे से ज्यादा अच्छा होना चाहिए. जीतने के लिए कुछ तो नया करना था. तभी थोड़ी दूरी पर मुझे एक सींक पड़ा दिखाई दिया. हमारे खाने में आधा कटा नीबू बचा हुआ था . उसे ही  मैने उस सींक पर लगा कर घरौंदे के बुर्ज़ पर लगा दिया तो सबने जोर से ताली बजाकर मेरा उत्साहवर्द्धन किया. उस समय जिस प्रसन्नता और सुख का अनुभव किया, वह अनिवर्चनीय है. सारी सांसारिक चिंताएं भुला,हम चारो लोंग बिलकुल बच्चे बन गए थे.और अपनी उम्र को सालों पीछे धकेल ,घरौंदे बनाने में इतने मस्त हो गए थे कि अगर हमारे पोते-पोती  हमें देखते तो विश्वास ही नहीं कर पाते कि ये उनके ही बाबा-दादी और नाना-नानी हैं

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  जीवन की आपा-धापी में यह सुख-संतोष, ये खुशियाँ , उत्साह-उमंग कब-कहाँ हमसे हाथ छुड़ा गायब हो जाते हैं, हम जान भी नहीं पाते. साथ रह जाती हैं सिर्फ निर्मम जिम्मेवारियां, कर्त्तव्यों के निर्वहन की चिंताएं और शुष्क सी नीरस ज़िन्दगी. अगर थोड़े से ख़ुशी के पल चुरा लें
तो ज़िन्दगी खुशनुमा हो जाएगी.


ऐसा भी क्या रूठना ,सलिल जी

ये तब की बात है,जब हम शारजाह में थे .मेरी बिटिया उस समय, पांच या छः साल की थी. घर पर मनोरंजन के नाम पर एक टी.वी. था, जिस पर कुछ हिन्दुस्तानी चैनल्स आते थे. बाकी अरबी में ख़बरें आती रहती थीं.

उस रोज जब मैं ऑफिस से लौटा तो किसी ख़ास घटना की खबर आई थी और उसे देखने, बिना कपड़े बदले ही टी.वी. के सामने बैठ गया. अभी समाचार शुरू हुआ ही था कि मेरी बेटी ने रिमोट हाथ में ले लिया. और कोई कार्टून चैनल लगा दिया. मैने कहा, "झूमा, मुझे न्यूज़ देखने दो "मैने रिमोट लेकर दुबारा चैनल बदल दिया.

बेटी ने फिर से कार्टून लगा दिया तो मैने डांट कर कहा, 'मुझे देख लेने दो फिर तुम देख लेना.' तो उसने जिद पकड़ ली और बार-बार चैनल बदलने लगी. मैने गुस्से में रिमोट छुपा दिया तो उसने टी.वी. का स्विच ही ऑफ कर दिया. अब मेरा गुस्सा सातवें आसमान पर था. लेकिन आदत से मजबूर मुझे गुस्सा आने पर हंसी आ जाती है. पत्नी ने किचन से ही हम दोनों को समझाने की कोशिश कि. फिर कोई असर ना होता देख, किचन में व्यस्त हो गयी.

मैने गुस्से पर नियंत्रण रखते हुए बोला, "प्लीज़ मुझे देख लेने दो...फिर तुम देख लेना" पर उसने भी अपनी आँखें लाल कर रखीं  थीं. मुझसे ज्यादा गुस्से में वो थी. उसका यह रूप पहले कभी नहीं देखा था और बाद में भी देखने को नहीं मिला.

मेरे सब्र का बाँध टूट चुका था . हमारे घर में पिटाई का चलन नहीं है . ना ही मेरे माता-पिता ने कभी हमारी पिटाई की ना मैने ही कभी बिटिया को एक थप्पड़ भी मारा हो. मैने आव देखा ना ताव. दरवाज़ा खोल कर बाहर  निकल आया और जोर से दरवाज़ा बंद कर दिया. मेरी पत्नी आवाज़ सुनकर बाहर आयीं और आवाज़ भी दी कि ,"कहाँ जा रहें हो?" पर तब तक लिफ्ट आ चुकी थी और मैं लिफ्ट से नीचे.

घर से निकल कर सीधा समंदर के किनारे  (वहाँ इस जगह को कोर्निश कहते हैं ) चला गया. वहाँ आधी रात को भी रौनक रहती है. मैं सारी रात वहाँ, समंदर की लहरों को देखता रहा.मुझे यह भी चिंता नहीं हुई, घर पर पत्नी परेशान होगी.

सुबह घर लौट तो बिटिया  नींद में थी, पत्नी रोने लगी. पता चला ,सारी रात वो जावेद भाई और शहजादी भाभी के साथ ,मुझे शारजाह की सडकों पर ढूँढती  रही.सिनेमा हॉल,पार्क सब जगह खोज आई. मोबाइल घर पर ही छोड़ आया था .इसलिए फोन भी नहीं कर सकी. कामलि और एजाज़ दुबई तक ढूंढ आए मुझे.

मुझे अपने किए पर शर्मिंदगी महसूस होने लगी. सच है, गुस्सा उस उबलते पानी की तरह है जिसमे आदमी अपनी शक्ल नहीं देख पाता. अलार्म घड़ी ने पांच बजने का ऐलान किया और बिटिया जग गयी,अपने स्कूल के लिए. अपनी दोनों बाहें फैला कर बोली, "गुड़ मॉर्निंग!! डैडी आप कहाँ चले गए थे, सॉरी ". मैने दोनों को अपनी बाहों में समेट लिया.
पत्नी ने कहा, "आप भी बच्चों के साथ बच्चा बन जाते हैं "


"तभी तो कहता हूँ कि बस एक ही ख्वाहिश है, तुम्हीं से जन्मूँ  तो शायद पनाह मिले."

"कपड़े बदलिए, चाय लाती हूँ "

और मैने वो शर्मिंदगी उतार दी और बेटी का माथा चूम लिया

कोई अनजान करे , इज़हार-ए-मुहब्बत   तो समझ लीजिये, सतीश जी की है करामात
   

इसी  अप्रैल की पहली तारीख को मैने और दो कलीग्स ने मिलकर अपने एक साथी के साथ शैतानी की थी।  एक नये नये लिए गए सिम कार्ड से उस साथी को बहुत ही नॉटी अंदाज में एक महिला कलीग से फोन करवाया गया। 

फोन पर महिला कलीग से कहलवाया कि -  आज मैं तुम्हारे घर आ रही हूं
मैं तुमसे प्यार करती हूं.....तुम बहुत हैंडसम हो.....आई लाईक योर स्माइल .... वगैरह..वगैरह। 
  
इतना सुनना था कि वह टेंशन में आ गया। हम लोग अपने अपने क्यूबिकल में बैठ कर मुँह नीचे कर हंस रहे थे और उचक कर बीच बीच में उस मित्र के रिएक्शन्स भी देख रहे थे। 
  
उस बंदे ने थोड़ी देर तो बर्दाश्त किया लेकिन फिर उठ कर बगल के एम्पटी मीटिंग रूम में मोबाइल लेकर चला गया। वहां जो कुछ बात चीत हुई सो तो हुई ही, बाहर आकर उसने सीधे वोडाफोन में फोन लगाकर पूछा कि यह नंबर किसका है ? 

वोडाफोन वालों ने जाहिर है  नहीं बताया....बिना किसी पुलिस कम्पलेंट के इस तरह की वो जानकारी भी नहीं दे सकते। सो बंदा पूरे दिन व्यग्र रहा और उधर उधर टहलता रहा। रह रह कर हम लोगों के फोन नंबर भी मिलान कर लेता कि कोई आसपास का तो नहीं मस्ती कर रहा है। 

खैर, शाम तक उसे बता दिया गया कि ये हम लोगों की ही शैतानी थी :)

वंदना दुबे  पूछ रही हैं, मैं बड़ी हो गई हूँ क्या??
  

क्या कहूं रश्मि?  बच्चों के बीच रहते रहते मुझ पर तो बचपना कुछ ज्यादा ही हाबी रहता है. बच्चों के साथ खेलना तो मेरा सबसे प्यारा  शगल है. सो ये कहना मुश्किल है, कि अंतिम बार कब बच्चा  बनी??? मैं तो लगभग रोज़ ही बच्चों जैसी हरकतें करती हूँ :) 

उधर अपने घर में सभी बहनों में मेरा नंबर तीसरा है,  सो मम्मी और दीदियों को मैं हमेशा छोटी ही लगती हूँ. छोटी बहनों ने मुझे कभी दीदी कहा नहीं, नाम ही लेती रहीं, लिहाजा बड़े होने का  मौका ही नहीं मिला. यहाँ ससुराल में मैं बड़ी हूँ, लेकिन सासू माँ के पास अकेली ही हूँ, बाकी सब बाहर हैं, ज़ाहिर है, उनका पूरा दुलार मुझ पर ही निकलता है :). बच्चा बनने के बहुत मौके हैं मेरे पास. आज ही स्टोर रूम कि सफाई करवा रही थी, तो वहां विधु के पुराने किचेन-सेट, टी-सेट निकले, जो कि एक बड़े से कनस्तर में भर के रखवा दिए गए थे. बस मेरा बचपना मुझे चुनौती देने लगा. मैं भी कहाँ कम थी? सफाई माया के भरोसे छोड़, पूरा सामान  बाहर निकाला, अन्दर बरामदे में जमाया और मैं, विधु, और माया की दोनों बेटियां खेलते  रहे :). लो... तुम्हारे टॉपिक के मुताबिक़ तो मैं आज ही बच्चा बनी थी :) .छुट्टियों में तो मैं बच्चों के साथ क्या नहीं खेलती? छुपा-छुपी, आँख मिचौली, इक्की -दुक्की, लूडो, कैरम , गुड्डे-गुडिया की शादी...... सब.  मेरी बहनों के बच्चे मेरे इंतज़ार में रहते हैं, कि कब मैं आऊं, और उनका खेल जमे  छुट्टियों में हम सब बहने अपने घर यानि माँ-पापा के पास इकट्ठे होते ही हैं, जो बहनें  पहले आ जातीं हैं, उनके बच्चे इंतज़ार करने लगते हैं. 

तो भाई, मैं तो हर दिन बच्चा बनती हूँ, कभी अम्मा से जिद करके कुछ  खरीदवाती हूँ,तो कभी विधु की चॉकलेट चुरा के, तो कभी छुड़ा के खा लेती हूँ :)  अब कितना  लिखूंगी? यहाँ तो किस्से भरे पड़े

अरविन्द  जी को अभी से डर है,अगली होली का.


वाकया पिछली होली का है ..बच्चों से ज़रा मेरी ज्यादा पटती है . जब भी मैं अपने पैतृक गाँव जाता हूँ वे मुझे खुशी से  घेर लेते हैं ..चाहे होली हो या दीवाली मैं बच्चों के साथ हिल मिल कर इन त्योहारों को कैसे और बेहतर तरीके से मनाया जाय यह रणनीति बनाते हैं ....मजाक मस्ती में कभी कभी अनजाने ही ऐसी घटनाएं हुई हैं कि मुझे शर्मिन्दगी उठानी पडी है -बच्चे तो बच्चे हैं वे सहज ही माफ़ कर दिए जाते हैं  ,मुझे माफी नहीं मिलती बल्कि मुझे बड़े लोगों का कोप भाजन होना पड़ता है .

अब पिछली होली का ही वाकया है .बच्चों के साथ मिलकर हमने पिचकारियों से गुब्बारों में रंग भर भर कर रंग भरे गुब्बारे तैयार किये .. इस बार का अजेंडा यह था कि सुबह सात बजे के बाद से बच्चा बड़ा या बूढा जो भी दिखे उस पर गुब्बारे फेंकने हैं .अब मेरी किस्मत ही खराब थी उस दिन हमारे बचपन के गुरु जी ही जिनकी उम्र इस समय ७५ वर्ष है आते दिख गए ...मैं उस समय बच्चों की टोली से थोड़ी देर का टाईम आउट ले रखा था ..खेल का समय पहले से तय था ..बच्चों ने आव न देखा ताव गुब्बारे गुरु जी पर चला ही दिए -वे बिचारे भौचक , रंग से पूरी  तरह सराबोर  -गाँव में ताजिंदगी उनके साथ ऐसी होली नहीं खेली गयी थी ....अब वे गरज पड़े ..बच्चों को डाटा तो उन्होंने भोलेपने से बता दिया कि अरविन्द भैया ने ही तो कहा था आपके ऊपर फेंकने को ...मेरी पेशी हो ही गयी उन तक -पूरे परशुराम बने हुए थे गुरु जी ..मैं उनके पैरों पर साक्षात दंडवत हो गया ...बच्चों को क्या कहता ..उनसे ही गिडगिडा के क्षमा माँगी ...लेकिन उनकी डांट    तो  भुलाए नहीं भूलती ...अरविन्द अब बड़े हो गए हो कब तक बच्चे  बने रहोगे ...

अब पता नहीं मेरी अगली होली कैसी बीतेगी ..

शिखा वार्ष्णेय का दिल तो बच्चा है 24 X 7

बच्चों जैसा काम? ...कब किया था?....ये पूछो कब नहीं किया था ...रोज ही कुछ ना कुछ हो जाता है :( ....आवाज़ इतनी बच्चों जैसी है कि फ़ोन उठती हूँ तो सामने वाला बोलता है "बेटा जरा मम्मी को फ़ोन दो ":(... शकल ऐसी है कि बेटी कहती है स्किर्ट पहन कर मेरे स्कूल मत आना :(......वैसे चाहे कितनी भी थकान हो नींद आ रही हो .पर कहीं घूमने जाना हो तो रात को २ बजे भी सबसे पहले तैयार होकर हम तैयार ...कोई कपडा नया खरीदा तो इतनी बेसब्री कि उसी दिन पहन डाला ,कल हो ना हो ... .इटालियन फ़ूड देख कर उछलने लगती हूँ तो बच्चे हाथ पकड़ कर डपट देते हैं :( और आजू बाजु वाले घूरने लगते हैं .कहीं पार्टी में कोई साथ दे ना दे नॉन स्टॉप नाचती रहती हूँ ,पति देव पकड़ पकड़ कर लाते हैं कि खाना तो खा लो,वर्ना घर जाकर कहोगी भूख  लगी है  . और ये पूछतीं हैं कि कब ? कहाँ?...हुंह :(

वेस्टर्न ड्रेस ने रखा मीनू जी को कमरे में कैद


मै उन बेहद सौभाग्यशाली लोगों में से हूँ जिन्हें गार्जियन जैसे बॉस मिलते हैं.
जो मेरे प्रथम बॉस थे वों एक बहुत सोबर और
उदार व्यक्तित्व वाले थे, अपनेपन और रोबदाब का अनूठा मेल. उम्र और व्यवहार में पिता समान.


रेडियो की नौकरी बड़ी टेक्निकल होती है, ऊपर से प्रोडूसर का पद ! हर क्षेत्र के दिग्गजों से
काम करवाना आसान नही था हम जैसे नए लोगों के लिए पर सर की ट्रेनिंग ने चीज़ें बहुत
आसान कर दी. धीरे २ हमारी काम में पकड़ बढने लगी. हमें सर बहुत मानते थे पर हमे उनसे
डर भी बहुत लगता था.वों डाट भी बड़ी जोर से देते थे वों भी सबके सामने.वों भारतीयता के बड़े पक्षधर थे.

आमतौर पर हम सब लडकियां ऑफिस में साड़ी पहना करते थे पर जब सर छुट्टी पर होते थे तो हम लोग बहुत स्टायलिश वेस्टर्न कपड़े पहनते थे. सर ने कभी  कुछ कहा नही पर हम सब समझते थे कि सर के सामने कभी भी वेस्टर्न ड्रेस नही पहनना है. सर का छुट्टी पर जाना हम सबके लिए पिकनिक जैसा होता था खूब मज़े किये जाते थे.

एक बार सर छुट्टी पर थे सो मैंने टाईट जीन्स और टॉप पहना था. ऑफिस गई तो पता चला सर किसी काम से आये हैं और अपने कमरे में बैठे हैं. मै डर गई मेरा डरा चेहरा देख सबको मज़ा आ रहा था.मै स्टूडियो में थी, मैंने सोचा आज मै अपने कमरे में ही रहूंगी, सर के कमरे में जाऊंगी ही नही तो वों मुझे कैसे देख पायेंगे.

काम खत्म होते ही मै अपने कमरे में घुसी तो दरवाज़ा खोलते ही देखती हूँ सर मेरे कमरे में बैठे मेरा वेट कर रहे हैं...और वहाँ ऑफिस के और लोग भी हैं.वों  आज ऑफिस अपनी बेटी की शादी का कार्ड देने आए थे.उन्हें देखते ही मेरी हालत पतली हो गयी और मै बच्चों की तरह दौडती हुई उलटे पांव यूं भागी कि घर आकर ही सांस ली.लोगों का हंसते २ बुरा हाल था.शाम को सर कार्ड लेकर मेरे घर आए तो उनके चेहरे पर मुस्कान थी.कार्ड देते हुए बोले शादी में वेस्टर्न ड्रेस में भी आ सकती हो . बेटियाँ तो हर ड्रेस में भली लगती हैं.

शायद मै तुम लोगों को सही शिक्षा नही दे पाया तभी तुम लोग मुझसे डरती हो.यह बात आज से १० साल पहले की है पर आज भी हंसी आ जाती है. सर ५-६ साल पहले रिटायर हो चुके है.

(कल आपके चेहरों पर मुस्कान लायेंगी कुछ और गाथाएँ )

Saturday, November 13, 2010

दिल तो बच्चा है,जी....किसका??..हमारे नामचीन ब्लॉगर्स का...खुद देख लें

इस बार बाल-दिवस पर एक ख़याल आया, क्यूँ ना अपने साथी  ब्लॉगर्स  से पूछा जाए , क्या उनका दिल  जिद कर कभी कभी बच्चा बन जाता है?? इसी आशय का एक मेल भेज दिया सबको कि आपलोगों ने बड़े होने के बाद कोई बच्चों जैसा काम किया हो..जिसे कर के ख़ुशी मिली हो , मजा आया हो..और थोड़ा एम्बैरेसिंग भी लगा हो...तो भेज दें अपने संस्मरण.  पर हमारे साथियों के तो नखरे...स्टार से कम थोड़े ही  हैं. और अब पता चला, हम अखबारों- पत्रिकाओं में जो परिचर्चा पढ़ते हैं, उनके पीछे कितनी मशक्कत की जाती है. पहले तो मेल भेजो...फिर रीमाइंडर...उसके बाद बहलाना-फुसलाना...अगर दोस्ती हो तो 'धमकी भी' :) ...पर इसके बाद भी   कुछ लोंग तो सुपर-स्टार निकले....कन्नी काट गए. पर समझ सकती हूँ..हर बार एकदम से कुछ याद भी नहीं आता. जबकि  कुछ ब्लॉगर्स  ने तो बहुत जल्दी ही भेज दिया...शुक्रिया सबका .

अब दूसरी उलझन  थी पोस्ट किस क्रम में की जाए?....इस बच्चे जैसे दिल वाली पोस्ट पर कोई कंट्रोवर्सी नहीं चाहती थी. कौन वरिष्ठ ब्लोगर है कौन कनिष्ठ तय करना मुश्किल.alphabetically भी करूँ तो एक ही अक्षर से कई नेम और सरनेम हैं. वंदना दुबे ने सुझाव दिया, 'जिस क्रम से मेल आते गए हैं...उसी क्रम में पोस्ट करो" यहं सही लगा...तो सबसे पहले ज्ञानदत्त जी के संस्मरण, जिन्होंने मेल करने के कुछ घंटो के भीतर ही भेज दिए थे.

 
 एक फोटो लेने के लिए ज्ञानदत्त जी ने बीच- बाजार दौड़ लगा दी.  
I won't be able to write much, but I will send a photo (attached) of a child vendor. Saw him from a distance. Almost ran like a child to take his photo. Stopped just short so that he was not distracted.
He was a child and I also behaved like a child! 

 


कंचे खेलते कैसे दिखते  होंगे ,राज भाटिया जी,



जिस बर्ष मेरी शादी हुयी यह किस्सा उस वर्ष का हे, शादी से पहले जब मे यहां से घर गया तो सारी दुनिया ही मेरे लिये बदली थी, बहुत से नये घर, सभी मित्र , यार लोग भी बिछुड गये कोई कही तो कोई कही, उन सब का अता पता कुछ भी नही, अब मै निठ्ठाला सारा दिन घर मे बोर होता, तभी मैने देखा कि एक जगह कुछ बच्चे कंच्चे( कांच की गोलियां) खेल रहे हे, मै भी उन के पास चला गया, पहले तो उन बच्चो को देखता रहा, फ़िर मैने बच्चो को बतलाना शुरु किया कि तुम ऎसे मारो तो जीत जाओ गे, बच्चे ठहरे बच्चे थोडी देर तक तो मुझे सहते रहे फ़िर बोले अंकल एक बार खेल कर देखो, बताने ओर खेलने मै फ़र्क हे, ओर उन्होने मुझे चार कंचे उधार दे दिये, मैने उन से कहा कि बेटा सब अपने अपने कंचे अब मुझे दे दो, क्योकि तुम सब हारने वाले हो, ओर उन्हे मैने दस मिंट मे हरा दिया, अब मेरे पास बहुत से कंचे हो गये, तो वो मुझ से ही खरीद कर, फ़िर खेले, फ़िर खरीदे फ़िर खेले, मुझे बहुत अच्छा लगा, ओर समय भी जल्द ही कट जाता, ओर जो पेसे आते वो सब मे बरतन मांजने वाली माई की बच्ची को दे देता.
 एक बच्चा बोला अंकल अंकल कंचे खेलना तो बुरी बात हे, मैने कहा बेटे तुम्हे किस ने कहा? तो बोला पापा ने, मेरे पुछने पर उस ने अपने पापा का नाम बताया तो मैने उसे कहा तेरा पापा भी मेरे से हारता था, अगर घर मे हे तो अपने पापा को बुलाओ..... आप माने ना माने दो दिन के अंदर वहां सब बडे बडे भी कंचने खेलने लग गये, ओर बच्चे एक तरफ़ बेठे हम सब को देखते थे, ओर जब हमारी शादी हो गई तो तीसरे दिन वही बच्चे आये ओर बोले अंकल आओ ना कंचे खेले आप के संग खेल कर अच्छा लगता हे, ओर हमारी बीबी हमे हेरानगी से देखती थी कि आप आज भी कंचे खेलते हे, ओर जब फ़ोटो धुल कर आई तो देखा कि हम ने अपने डा० मित्रो से भी कंचे खिलबा दिये, ओर आज भी यह सब याद आता हे तो बहुत अच्छा लगता हे, कहिये केसे लगे हमारे कंचे:)
 

चीटर कॉक ,इंदु आंटी 


मेरा एक दिन ऐसा नही बिताता जब मैंने  बच्चे के साथ उधम पट्टी ना की हो.कोलोनी के छोटे छोटे बच्चे अक्सर किसी भी प्रोग्राम में मिलने पर मुझे घेर लेते हैं.स्कूल में??? वाओ मजा जाता  है.कल ही मैंने बच्चियों के साथ खूब 'पल्ले' खेले.पल्ले यानी सात या नौ तराशे हुए कंकडों से खेलना .फिर खेला टक्कु  छांटनी.जिसमे ढेर सारे कंकड़ ले के खेलते हैं,सबको जिस हाथ से कंकड़ उठाते है उसी में इकठ्ठा करते जाते है.हाथ से गिर जाये तो आउट माना जाता है,हाथ के सभी कक्दों को अगले खिलाडी को देना होता है.उठाये गये इन कंकडों को छंटते हैं पहले दो दो एक साथ,फिर तीन इसी तरह चार ...पांच..   सुविधि,गरिमा,ध्यान कुंवर मेम भी शामिल हो गई मैंने उन्हें बताया कि देखो बच्चे जोड़ना और गुना करना सीख रहे हैं और इन्हें मालूम ही नही कि मैं इन्हें पढ़ा रही हूँ.ऐसे ही ताश हो या लंगड़ी टांग ...मैंने सारी गणितीय आकृतियाँ इसी तरह सिखाई.
बड़ा मजा आता है मुझे शरारत करने में भी.कंकड़  ऊपर उछलते समय गिर जाता है तो मैं चिल्लाती हूँ 'नीचे नही गिरा देखो गोद में गिरा है.ये तो मामा की गोद है,मामा की गोद में गिरे तो आउट थोड़े ही होते हैं?'कल भी खूब चिल्लाई.मेरी क्लीग्ज़ बोली-'मेम! आप ऩे दूर गिरे कंकड़ को गोदी में डाला उठा कर'
'झूठ.मैंने नही डाला वो तो खुद गिरा,इतना तो खेल में चलता है'
'मेम! हमारा कंकड़ गिर गया तो? तो हमारे भी मामा की गोद मानोगे?' एक लडके ऩे पूछा.
'बिलकुल मानेंगे' और जब उनका दुबारा गिरा मैंने झट कंकड़ झपट लिए.और बोली-'तेरे एक मामा है इसलिए एक बार मौका मिला मेरे छ मामा है इसलिए छ बार गिर जाए तो भी मैं आउट नही.'
मासूम बच्चे कई बार हाँ में हाँ मिलाते है और कई बार चिल्लाते है 'चीटिंग ..चीटिंग'
हा हा हा आप लोग वहां होते तो शायद खुद को नही रोक पाते और हमारे साथ शामिल हो जाते.
 मेरे अब तक जवान रहने का कारण भी शायद ये बच्चे ही हैं जिनके साथ इतना इंजॉय करने के कारण ही मैं दिल और दिमाग से अब तक जवान हूँ.और मेरे भीतर का बच्चा अब तक जीवित है.

 

अनुराग शर्मा जी कैसे लगते हैं , पाईरेट  के वेश में 

 

पिछले कई सालों में स्थानीय भारतीय बच्चों (और वयस्कों) के लिये

छोटे-छोटे नाटक तैयार किये हैं कई बार लिखे भी हैं परंतु निर्देशन लगभग
सदैव ही किया है

हैलोवीन से बेटी के साथ मिलकर उसके मिनी-नगर बनाने में साथ देता हूँ जो

कि नव-वर्ष तक कई आकार प्रकार ले चुकता है

पिछले हैलोवीन पर बच्चों के साथ मैं भी कुछ क्षणों के लिये पाइरेट बनकर

बैठ गया था शायद उसे शामिल किया जा सके - 

 

डा. दराल साब को अपनी सादगी पर किसी के मरने का ,अब तक इंतज़ार है...



बात उस समय की है जब मेडिकल कालिज में दाखिला लेने से पहले हम एक साल का प्री मेडिकल कर रहे थे हमारे बैच में ६० छात्र थे जिनमे १२ लड़कियां थीं वही एक साल था जब हम को-एड में पढ़े थे वर्ना स्कूल और कालिज में हमारी कक्षा में कोई लड़की थी लड़की की जात  
इन १२ लड़कियों में लड़कियां बड़ी हाई फाई परिवारों से थी जबकि बाकि हम जैसे साधारण मिडल क्लास परिवारों की थी अब हम तो गोरमेंट ब्वाइज हायर सेकंडरी स्कूल से निकल कर आये थे भले ही इंग्लिश में टॉपर थे , लेकिन इंग्लिश बोलनी बिल्कुल नहीं आती थी

हमारी क्लास में एक लड़का था --बड़ा खुरापाती इत्तेफाकन , मेरा दोस्त बन गया था अक्सर खुरापात वो करता और फंस जाता मैं
एक दिन वो कहने लगा --यार देख ये जो लड़कियां हैं , ये तो अपने बल बूते से बाहर की हैं लेकिन ये जो लड़कियां हैं , ये अपनी औकात की हैं इनमे से एक तेरी और एक मेरी
बस अपने तो ज़ेहन में ये बात बैठ गई और हमने उनमे से एक को अपना मान लिया दिल से
अब तो हम रोज उसको कनंखियों से देखते और मन ही मन उसका पूरा ख्याल रखते लेकिन बात कभी नहीं हुई
एक दिन इत्तेफाक से हम दोनों लेट हो गए और एक ही बस से सुबह एक ही समय कॉलिज पहुंचे बस स्टॉप से चलकर करीब ३०० मीटर पर हमारा क्लास रूम था सारे रास्ते हम दोनों साथ साथ चलते रहे , चुपचाप वो बोली , मैं मन में गुदगुदी होती रही रास्ते भर आखिर वहां पहुंचे जहाँ से क्लास के लिए दायें मुड़ना था अचानक मैंने पूछा --क्लास में चलना है क्या ? इतना सुनते ही उसने क्लास की तरफ दौड़ लगा दी , बिना कोई ज़वाब दिए और मैं खड़ा खड़ा अपना सा मूंह लिए उसे जाते हुए देखता रहा
आखिर सर झुकाए बायीं ओर मुड़कर, मैं कैंटीन चला गया , चाय के साथ ग़म ग़लत करने
उस दिन आशिकी का भूत सर से उतर गया , जो फिर कभी नहीं चढ़ा
आज भी कभी जब सोचता हूँ तो मनोज कुमार की एक फिल्म का ये गाना याद आता है --
आया ना हमको प्यार जताना
प्यार सभी से हम करते हैं
बस आज तक किसी ने यह नहीं कहा --
भोलापन तेरा भा गया हमको
सादगी पर तेरी मरते हैं
वैसे १८ साल की उम्र से पहले बचपन ही तो था 

   देखिए समीर जी को बारिश में भीग कर गाना गाते हुए

पिछले सप्ताह रोज की भांति टहलने निकला शाम अभी जवान ही थी कुछ धूप से संगत बांटती कि एकाएक बादल छा गये और तेज बारिश होने लगी. सुनसान वाकिंग ट्रेल. न सर ढकने को कोई छप्पर और न घर पास. भीगने से बचने का कोई उपाय नहीं. तब एक शुद्ध भारतीय की तरह सोच कि कुऎँ में तो गिर ही गये हैं, पहले नहा लो फिर बचाने को आवाज देंगे, मैने सोचा कि आज तबीयत से भीग ही लिया जाये. भीगते भीगते घर की ओर रुख किया.

जाने क्यूँ बरसों बाद घनघोर बारिश में भीगते मन मचल उठा और मैं बच्चों की तरह आसमान में दोनों हाथ और चेहरा उठाये आँख बंद किये गोल गोल घूमने लगा मानो नाच रहा हूँ. शायद तीन चार मिनट से ज्यादा समय तक. ऐसा लगा जैसे ध्यान की स्थिति में चला गया हूँ. अपनी ही एक कविता जोर जोर से गाता. मालूम तो था ही कि इस सुनसान में न कोई सुनने वाला है और नही कोई देखने वाला.

जब आँख खोली तो पाया तीन लड़कियाँ और दो लड़के मुझे घेरे खड़े भीगते हुए मुस्करा रहे हैं. मैं उन्हें देख कर झेंप गया और जैसे ही मैने गाना और गोल गोल घूमना बंद किया, उन लोगों ने ताली बजाना शुरु कर दिया.

मैं किसी तरह अपनी झेंप मिटाता, थैन्क्यू थैन्क्यू कहता घर की तरफ बढ़ चला.
हो जाता है ऐसा भी कभी कभी




अली सैयद जी से सीखी जा सकती है लड़कियों को इम्प्रेस करने की तरकीब


अपना कस्बा तालाबों से मालामाल था !  उन दिनों नगरपालिका घर घर पानी की
सप्लाई नहीं करती थी तो पीने का पानी कुंवों से और नहाने के लिए घर के
पास का तालाब , बस यही विकल्प मयस्सर हुआ करते !  अपना स्कूल भी तालाब के
पाट पर घने फलदार दरख्तों के बीचो बीच लगता !  ठीक नीचे नहाने के पक्के
घाट !  कभी लगा ही नहीं कि घर , स्कूल या तालाब में कोई  फर्क भी है !
पास ही खेल का मैदान , तो  फिर अपनी पूरी दुनिया ही वहीं बसती थी !
१२ - १६  साल की उम्र के दोस्त , एक गिरोह जैसे , हरदम साथ रहते !  तालाब
में कूदना तैरना और बहुत कुछ !  हममें से एक , जाहिद सिद्दीकी पानी में
बिना हिले डुले घंटो चित  पड़े रहने का हुनरमंद , हम सब की ईर्ष्या का
पात्र  !  खासकर तब , जबकि कुछ दिनों पहले ही लड़कियों का एक स्कूल भी घाट
से जुडी एक बिल्डिंग में शिफ्ट हुआ था :) सब दोस्तों ने उससे चिरौरी की ,
चुपके से हमें भी सिखा दो , उसे लगा , उसकी बादशाहत पे खतरा है , सो मुकर
गया !  जाहिद से पिछड़ने और असफल नायकत्व के अंदेशे वाली खीज़ में भरकर
मैंने कहा...दोस्तो कल तुम सब ये सब कर पाओगे बशर्ते मुझसे सीखो ! मामला
संगीन था इसलिए सब सहमत हुए ,बस एक जाहिद हिकारत से देखता रहा !

उस्ताद ने अपने शागिर्दों को पहला लेसन ये दिया कि जनाब आप सब के पैर ठोस

होने की वज़ह से पानी में सबसे पहले डूबते हैं और सीना बाद में क्योंकि
वहां पर हवा यानि कि सांसे मौजूद हैं तो अगर आप लोग अपने पैरों का वज़न
सीने की तरफ ट्रांसमिट कर पायें तो काम आसान हो जाएगा !  शागिर्दों ने
कहा ये तो अभ्यास का मामला है कई दिन लगेंगे !  उस्ताद ने कहा मुझ पर
भरोसा रखो , कल ही कामयाबी हमारे कदम चूमेगी...और अगली ही सुबह सारे के
सारे शागिर्द पानी में चित लेटे आराम फर्माते हुए पाए गये !  लड़कियों के
सामने शिकस्त खाया , सल्तनत लुटाया सा , जाहिद सिर झुकाए और मैं यानि कि
उस्ताद विजय गर्व से सीना ताने !   कि अचानक...मेरी उस्तादी का जुलूस
निकल गया !  हुआ ये कि...

काफी देर से पानी में चमत्कार करता एक दोस्त अपनी हंसी ना रोक सका और

उसकी जांघों के नीचे छुपा छोटा सा बैलून पानी में ऊपर आ गया !  उस वक़्त
जाहिद के चेहरे पर तसल्ली और मुझे बेशर्मी के साथ शर्मिन्दा होना ही था ...

ये बात अलग है कि वो दोस्त अब भी जाहिद के मुकाबले मेरी ही सुनते हैं !




(लगता है यह बाल दिवस नहीं ...बाल सप्ताह ही मन जाएगा....कल दूसरे ब्लोगर्स के अनुभव....अपना भी लिखूंगी,वहीँ से तो यह आइडिया आया था परन्तु मेज़बान  तो अंत में ना...इसलिए  इंतज़ार करें...
और आमंत्रण अब भी खुला है....जिन लोगों को मेल नहीं भेज पायी वे उन्हें भी कोई मजेदार किस्सा याद आ रहा हो..तो बस लिख भेजें )



 










हैप्पी बर्थडे 'काँच के शामियाने '

दो वर्ष पहले आज ही के दिन 'काँच के शामियाने ' की प्रतियाँ मेरे हाथों में आई थीं. अपनी पहली कृति के कवर का स्पर्श , उसके पन्नों क...