Thursday, April 28, 2011

गावस्कर के स्ट्रेट ड्राइव का राज़

 (ये आलेख मैंने ब्लॉग बनाने के शुरूआती दिनों में लिखा था...दरअसल तीन आलेखों की एक श्रृंखला सी ही लिखी थी. ये ब्लॉग बनाया तभी से इच्छा थी...उन पोस्ट्स को यहाँ भी पोस्ट करूँ....बहुत सारे नए पाठक जुड़ गए हैं,अब ...उनमे से "सचिन के गीले पौकेट्स...." तो पोस्ट भी कर चुकी हूँ ...ये पोस्ट भी मेरे दिल के बहुत करीब है और आजकल क्रिकेट का मौसम भी है...सो माकूल लगा...अभी पोस्ट करना.)


हमारे देश को सुष्मिता सेन के रूप में पहली विश्व सुंदरी मिलीं. पर विश्व सुंदरी का खिताब एक भारतीय बाला को बहुत पहले ही मिल गया होता अगर उन्होंने अपने दिल की नहीं सुन...पोलिटिकली करेक्ट जबाब दिया होता. मशहूर मॉडल 'मधु सप्रे' फाईनल राउंड में पहुँच गयी थीं. फाईनल राउंड में 3 सुंदरियाँ होती हैं और एक ही प्रश्न तीनो से पूछे जाते हैं. जिसका जबाब सबसे अच्छा होता है,उसे मिस यूनिवर्स घोषित कर दिया जाता है. (विषयांतर है....पर बरसो पहले टी. वी. पर देखा हुआ कुछ याद हो आया ....'मिस इंडिया' प्रतियोगिता  के फाइनल राउंड में भी सुष्मिता सेन और ऐश्वर्या  राय के साथ कुछ और सुंदरियों से भी एक ही सवाल पूछा गया था, " अगर आप इतिहास की एक तारीख बदलना चाहें तो वो कौन सी तारीख होगी...?" सुष्मिता सेन ने जबाब दिया ,"इंदिरा गांधी की हत्या का दिन "और dumb  ऐश (वैसे मुझे वो बहुत पसंद हैं ) का जबाब था, "अपना जन्मदिन" ...जाहिर है...सुष्मिता सेन को ताज मिलता और वो  सही चयन था .) यहाँ मिस यूनिवर्स की प्रतियोगिता में सवाल था 'अगर एक दिन के लिए आपको अपने देश का राजाध्यक्ष बना दिया गया तो आप क्या करेंगी?" बाकी दोनों ने भूख,गरीबी दूर करने की बात कही....हमारी मधु सप्रे ने कहा,"वे पूरे देश में अच्छे खेल के मैदान बनवा देंगी"...जाहिर है उन्हें खिताब नहीं मिला....बहुत पहले की बात है,पर मुझे भी सुनकर बहुत गुस्सा आया था की ये कैसा जबाब है. हमारे देश को एक विश्व सुंदरी मिलने से रह गयी. पर आज जब मैं खुद मुंबई में हूँ तो मुझे उनकी बात का मर्म पता चल रहा है. मधु सप्रे मुंबई की ही हैं और एक अच्छी एथलीट थीं.


इस कंक्रीट जंगल में बच्चे खेलने को तरस कर रह जाते हैं. बिल्डिंग के सामने थोड़ी सी जगह में खेलते हैं पर हमेशा अपराधी से कभी इस अंकल के सामने कभी उस आंटी के सामने हाथ बांधे,सर झुकाए खड़े होते हैं.क्यूंकि यहाँ घर के शीशे नहीं कार का साईड मिरर ज्यादा टूटता है. कई बार दो सोसाईटी के बीच झगडा इतना बढ़ जाता है (तुम्हारी बिल्डिंग के बच्चे ने मेरी बिल्डिंग के कार के शीशे तोड़े) की नौबत पुलिस तक पहुँच जाती है. फूटबौल खेलने जितनी जगह तो होती नहीं,क्रिकेट ही ज्यादातर खेलते हैं. मै खिड़की से अक्सर देखती हूँ....इनके अपने नियम हैं खेल के...अगर बॉल ऊँची गयी...'आउट'...दूर गयी...'आउट'.....पार्किंग स्पेस में गयी ..'आउट' सिर्फ स्ट्रेट ड्राईव की इजाज़त होती है. बच्चे जमीन से लगती हुई सीधी बॉल सामने वाली विकेट की तरफ मारते हैं और रन लेने भागते हैं. एक ख्याल आया, 'सुनील गावसकर' का पसंदीदा शॉट था 'स्ट्रेट ड्राईव' और उन्हें बाकी शॉट्स की तरह इसमें भी महारत हासिल थी. कहीं यही राज़ तो नहीं??. क्यूंकि अपनी आत्म कथा 'Sunny  Days ' में  जिक्र किया था कि वे बिल्डिंग में ही क्रिकेट खेला करते थे...और कोई आउट करे तो अपनी बैट उठा, घर चल देते थे (सिर्फ गावस्कर के पास ही बैट थी ).. इसी से शायद, उन्हें विकेट पर देर तक टिके रहने की आदत पड़ गयी. क्या पता स्ट्रेट ड्राईव में महारत भी यहीं से हासिल हुई हो....अपनी डिफेंसिव  खेल का भी जिक्र किया था कि...उनकी माँ उन्हें बॉलिंग. करती थीं...और एक दिन उनके शॉट से माँ की नाक पर चोट लग गयी...माँ तुरंत दवा लगाकर आयीं और बॉलिंग जारी रखी..उसके बाद से ही गावस्कर संभल कर खेलने लगे.
सचिन और रोहित शर्मा भी मुंबई के हैं और आक्रामक खिलाड़ी हैं पर सचिन शिवाजी पार्क के सामने रहते थे और रोहित MHB ग्राउंड के सामने...उन्हें जोरदार शॉट लगाने में कभी परेशानी नहीं महसूस हुई होगी. विनोद कांबली के बारे में सुना है कि वह चाल में रहते थे। आसपास के घरों में गेंद न लगे इसलिये गेंद को उंचा उठाकर मारते थे और शायद यही राज था कि कांबली ज्यादातर ऐसे ही शॉट खेलते देखे गये। 


 मुंबई में कई सारे खुले मैदान हैं पर उनपर किसी ना किसी क्लब का कब्ज़ा है.मेरे घर के पास ही एक म्युनिस्पलिटी का मैदान था...सारे बच्चे खेला करते थे...कुछ ही दिनों बाद एक क्लब ने खरीद लिया...मिटटी भरवा कर उसे समतल किया.और ऊँची बाउंड्री बना एक मोटा सा ताला जड़ दिया गेट पर. सुबह सुबह कुछ स्थूलकाय लोग,अपनी कार में आते हैं. एक घंटे फूटबाल खेल चले जाते हैं. बच्चे सारा दिन हसरत भरी निगाह से उस ताले को तकते रहते हैं. कई बार सुनती हूँ...'अरे फलां जगह बड़ी अच्छी गार्डेन बनी है'...देखती हूँ,मखमली घास बिछी है,फूलों की क्यारियाँ बनी हुई हैं...सुन्दर झूले लगे हुए हैं....चारो तरफ जॉगिंग ट्रैक बने हुए हैं. पर मुझे कोई ख़ुशी नहीं होती...यही खुला मैदान छोड़ दिया होता तो बच्चे खेल तो सकते थे. एकाध खुले मैदान हैं भी तो पास वाले लोग टहलने के लिए चले आते हैं और बच्चों को खेलने से मना कर देते हैं .एक बार एक महिला ने बड़ी होशियारी से बताया कि 'मैंने तो उनकी बॉल ही लेकर रख ली,हमें चोट लगती है' .मैंने समझाने की कोशिश भी की..'थोड़ी दूर पर जो गार्डेन सिर्फ वाक के लिए बनी है...वहां चल जाइए'...उनका जबाब था..";अरे, ये घर के पास है,हम वहां क्यूँ जाएँ?"..."हाँ,..वे क्यूँ जाएँ?"  इनलोगों के बच्चे बड़े हो गए हैं, अब इन्हें क्या फिकर. जब बच्चे छोटे होंगे तब भी उनकी खेलने की जरूरत को कितना समझा होगा,पता नहीं.


कभी कभी इतवार को बिल्डिंग के बच्चे स्टड्स,स्टॉकिंग पहन पूरी तैयारी से फूटबाल खेलने जाते हैं और थके मांदे लौटते हैं...बताते हैं तीन मैदान पार कर, जाकर उन्हें एक मैदान में खेलने की जगह मिली.कभी कभी ये लोग शैतानी से गेट के ऊपर चढ़कर जबरदस्ती किसी कल्ब के ग्राउंड में खेलकर चले आते हैं.मेरे बच्चे भी शामिल रहते हैं...पर मैं नहीं डांटती....एक तो सामूहिक रूप से ये जाते हैं और फाईन करेंगे तो पैसे तो दे ही दिए जायेंगे...दो बातें सुनाने का मौका भी मिलेगा...कि अपना शौक पूरा करने के लिए वे बच्चों से उनका बचपन छीन रहें हैं.

एक बार राहुल द्रविड़ से जब एक इंटरव्यू में पूछा गया कि" क्या बात है,आजकल छोटे शहरों से ज्यादा खिलाड़ी आ रहें हैं"..इस पर द्रविड़ का भी यही जबाब था कि महानगरों में खेलने की जगह बची ही नहीं है.खेलना हो तो कोई स्पोर्ट्स क्लब ज्वाइन करना होता है. उन्होंने अपने भाई का उदाहरण दिया कि वो 8 बजे रात को घर आते हैं. इसके बाद कहाँ समय बचता है कि बच्चे को लेकर क्लब जाएँ. हर घर की यही कहानी है. माता-पिता अक्सर नौकरी करते हैं...अब बच्चे को लेकर स्पोर्ट्स क्लब कैसे जाएँ ?" मेरे बेटे भी जब स्कूल में थे अक्सर....दो बस बदल कर, दोस्तों के साथ, फुटबौल प्रैक्टिस के लिए जाते थे.आज भी छोटा बेटा, हॉकी प्रैक्टिस  के लिए....सुबह ४ बजे उठ कर ट्रेन से चर्चगेट जाता है.(३० किलोमीटर दूर , खैर वो एस्ट्रो टर्फ पर  खेलने के लिए) ...पर वैसे  भी खेलने की जगह की बहुत कमी है... इतवार को किसी भी बड़े  मैदान का नज़ारा देखने लायक होता है. मैदान में एक साथ क्रिकेट के कई मैच चल रहे होते हैं.  इसकी बाउंड्री उसमें,उसकी बाउंड्री इसमें . और कितने ही लोग इंतज़ार में बैठे होते हैं..


कमोबेश हर शहर की यही कहानी है और फिर हम शिकायत करते हैं कि बच्चे आलसी होते जा रहें हैं.उनमे मोटापा बढ़ रहा है. उन्हें सिर्फ टी.वी.और कंप्यूटर गेम्स में ही दिलचस्पी है.

Sunday, April 24, 2011

साथी ब्लॉगर्स के साथ गुजरे कुछ खुशनुमा पल


शरद कोकास  जी की कविता पर लिखी पुस्तक के विमोचन समारोह के बाद ही ये पोस्ट लिखनी थी...परन्तु वही...बैक लॉग निबटाते अब जाकर इसकी बारी आई.....मैने तो इरादा छोड़ ही दिया था लिखने का....क्यूंकि तस्वीरे फेसबुक पर डाल दी थीं और ज्यादातर लोगो ने देख लिए थे .....परन्तु कई मित्र जो फेसबुक पर नहीं है...उनकी फरमाईश थी कि हमलोग फोटो कैसे देखेंगे ...सो उनका आग्रह सर माथे..

पिछले महीने अपने ब्लोगर मित्रों से काफी जल्दी-जल्दी मिलना हो गया. पहले अभिषेक ओझा...अमेरिका से मुंबई तशरीफ़ लाए...
आभा मिश्रा जी के यहाँ , अभिषेक ओझा ...युनुस खान, ममता सिंह...प्रमोद सिंह...अनिल रघुराज...इकट्ठे हुए थे. अभिषेक, बिलकुल अच्छे बच्चे बन कर अपने घर जा रहे थे....बालों की स्टाइल बिलकुल शरीफ लडको वाली थी. मैने तस्वीरों में उनके बालों के पीछे की टेल देख चुकी थी...और पूछ ही बैठी,"चोटी गायब??" उन्होंने हंस कर सर हिला दिया. सबलोग उनसे पूछ रहे थे.."अमेरिका से वापस आने का इरादा है या नहीं?" उन्होंने ईमानदारी से बता दिया, " इरादा तो है..पर पक्का कुछ नहीं कह सकता....क्यूंकि कई मित्रों को देखता हूँ...वे तय कर लेते हैं...छः महीने बाद वापस लौट आऊंगा..पर वे छः महीने  दो साल में बदल जाते हैं "
 

अभिषेक ने ये भी जिक्र किया...कि 'मुंबई में उन्होंने करीब आठ महीने बाद एक फ्रेंड के टिफिन में घर की बनी चपाती खाई'

वहाँ बोधिसत्व जी और प्रमोद जी में समाज में कवि की भूमिका को लेकर सार्थक बहस छिड़ गयी. अनिल रघुराज जी और आभा बोधिसत्व जी ने भी इस विषय पर खुलकर अपने विचार रखे.
बोधिसत्व जी  ने  निराला...पन्त..महादेवी से सम्बंधित  कई बातों की चर्चा की..कि कैसे निराला जब बीमार हुए तो उनके इलाज के लिए नेहरु जी महादेवी वर्मा के माध्यम से पैसे भिजवाते थे क्यूंकि निराला जैसे स्वाभिमानी कवि को को किसी तरह की मदद लेना गवारा नहीं था.

ऐसी बहस का तो कोई अंत नहीं होता किन्तु अभिषेक को जल्दी निकलना  था क्यूंकि उन्हें कहीं लेक्चर देने जाना था. मैने कह ही दिया ,"आप तो इतने छीटे दिखते हैं...लोग,आपकी बात सुनते भी  है?" अब सुनते ही होंगे ना...वरना इनवाईट क्यूँ करते :)

युनुस जी...ममता जी ने विविध भारती के अपने अनुभव से और बोधिसत्व जी ने फिल्मो से जुड़ी कई  रोचक बातें बताईं ...अफ़सोस भी किया कि अब सागर सरहदी और साहिर लुधियानवी जैसे लोग नहीं हैं जो स्क्रिप्ट का या गाने का एक शब्द भी बदलने को तैयार नहीं होते थे बल्कि कहते थे....आप लेखक/गीतकार बदल लीजिये.
बातों के साथ चाय का दौर चलता रहा....बोधिसत्व जी की बनाई स्पेशल चाय.:)

फोटो आभा जी के ब्लॉग के सौजन्य से मैं उस दिन कैमरा ले जाना ही भूल गयी 

बोधिसत्व जी एवं अभिषेक ओझा 


मैं, आभा जी एवं ममता सिंह जी
आभा जी,मैं,अभिषेक एवं ममता जी

इसके कुछ ही दिनों बाद....विमोचन समारोह था जिसका जिक्र मैं यहाँ कर चुकी हूँ.

उस दिन विमोचन समारोह में सबसे मुलकात तो हुई..पर इत्मीनान से बैठकर बात नहीं हो पायी थी. और दूसरे दिन ही शरद जी को वापस लौट जाना था. बहुत ही जल्दबाजी में कुछ लोगो को ही सूचना दे पायी उसमे भी ममता सिंह जी और अनीता कुमार जी नहीं आ पायीं. घुघूती बासुती जी...शरद जी..युनुस जी...आभा जी...बोधिसत्व  जी और सतीश पंचम जी ही आ पाए.

संयोग से शरद जी के भाई का घर और घुघूती जी का घर एक ही इलाके में है....इसलिए वो लोग साथ ही आ गए. और इस बात की तो प्रशंसा करनी पड़ेगी कि मुंबई में इतनी दूरी होने पर भी...उनलोगों ने इतने अच्छे से कैलकुलेट किया था कि बिलकुल समय पर आ गए. थोड़ी ही देर में आभा जी बोधिसत्व जी और युनुस जी भी आ गए. सतीश जी...पोस्ट तो बड़ी जल्दी जल्दी लिखते हैं...पर यहाँ काफी देर से  पहुंचे.

पता नहीं किस बात पर भगवान राम का जिक्र आया और पुरातन काल में स्त्रियों की स्थिति पर गहरा विमर्श शुरू हो गया. सब लोग अपने अपने विचार रख रहे थे.पर घुघूती जी और बोधिसत्व जी ज्यादा मुखर थे. अब घुघूती जी की तस्वीर तो नहीं दिखा सकती {उन्हें कैमरे को सजा देने की आदत है ..उसे डांट कर दूर भगा देती हैं :)} लेकिन बोधिसत्व जी की तस्वीर से अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि कितने जोश में थे, दोनों वक्ता :)...फेसबुक पर इस सन्दर्भ में हुए कुछ संवाद का आपलोग भी लुत्फ़ उठाएँ   
Rashmi Ravija अनुमान लगाइए बोधिसत्व जी, किसे कुछ समझाने की कोशिश कर रहे हैं??

Bodhi Sattva उधर कौन है जो नहीं समझ रहा...

Praveen Trivedi ‎.........तो इतना गुस्साने की क्या जरुरत है ?    .
 

 Yunus Khan कउन कहता है कि बोधि गुस्‍सा रहे हैं। कोई मत कहिए कि वो खीझ रहे हैं। अरे भई वो तो बतियाए रए हैं।

Praveen Trivedi ओह! युनुस भाई .....माफी देव हमका ........हम समझे कि .................?
गुस्सा रहें हैं |

Praveen Trivedi वैसे इत्त्ने तथाकथित स्नेह से वह किससे बतिया रहे हैं ........अब ज़रा यहु तो बता दीजिए ना ?

Yunus Khan उनसे जिनका नाम एक चिडिया का नाम भी है।

Anil Pusadkar ghughuti basuti jee,   

Bodhi Sattva लोग भावनाओं को नहीं समझते....तो क्या करें....

Ghughuti Basuti भावनाओं को तो समझना सरल है तर्क नहीं. वहीं तो मतभेद हो रहा है, मनभेद नहीं. वैसे कल जब हम बतिया / तर्किया रहे थे 'राम जी' हिचकियों से बहुत परेशान हो रहे थे.

Rashmi Ravija हा हा सही कहा,घुघूती जी..बेचारे राम , द्रौपदी, कृष्ण, अर्जुन,अहिल्या,गौतम , इंद्र को बड़ी हिचकियाँ आ रही होंगी....युनुस जी का सुझाव बढ़िया था...अगली बहस ठीक उसी बिंदु से शुरू होगी...:)..... वैसे मजा आ गया...सबको कॉलेज स्टुडेंट्स जैसे हँसते-बतियाते-बहसियाते देख.

Abha Bodhisatva अभी तो घुघूती जी के साथ हूँ......:)

Ghughuti Basuti प्रवीण, स्नेह तो स्नेह ही था तथाकथित नहीं, हाँ, विषय ही कुछ ऐसा था कि जोश आ ही रहा था, मजा भी.

 Praveen Trivedi हम तो केवल बूझ पाने की कोशिश ही कर पा रहे हैं| .......फिर भी बड़ा मजा आ रहा है|  वैसे चित्र चर्चा से कुछ आगे बढ़कर यह 'हिचकी' प्रकरण आगे बढ़ाया जाए .....तो कैसा ? .........बस क्यूंकि समझने में तनिक नहीं बहुत कठिनाई समझ आ रही है | इस (बोध) कथा को भी अगर समझाया जा सके ....तो बहुत ...........साधुवाद आप सबका |  

Yunus Khan कुछ नहीं जी। बस ज़रा चर्चा श्रीराम के बहाने पौराणिक संदर्भ में स्‍त्री की स्‍वतंत्रता जैसे मुद्दों से शुरू हो गयी थी। और फिर क्‍या था।

Praveen Trivedi ‎...........क्या था .....युनुस भाई ?

Yunus Khan अरे मास्‍साब!!
Bodhi Sattva बता दो भाई..

शरद जी से घुघूती जी ने यूँ ही पूछ लिया कि कितनी महिलाएँ  उनकी कविता से प्रभावित हुई हैं और शरद जी ने तुरंत बता दिया कि उनकी पत्नी भी पहले उनकी कविताओं से ही प्रभावित हुई थीं. एक रोचक घटना भी उन्होंने शेयर की . शादी से पहले उन्होंने, लता जी से पूछा, "आप मार्क्स से परिचित हैं?" { अब कवि हुए तो क्या हुआ...लड़कियों से बात करने में सारे लड़के dumb ही होते हैं...(सॉरी शरद जी :))अब पहली मुलाकात में कोई लड़की से कार्ल मार्क्स के बारे में पूछता है?:)} और लता जी ने कहा..."हाँ बिलकुल परिचित हूँ..वो मार्क्स के पर्सेंटेज ना ?" (वे टीचर हैं...तो नंबर(मार्क्स) से ही उनका वास्ता पड़ता है ).

इस बात पर शरद जी की बहुत खिंचाई  हुई पर सतीश जी और आभा जी की वेशभूषा पर हुई खिंचाई से कम.

संयोग कुछ ऐसा था कि
दोनों लोगो ने बिलकुल मिलते जुलते रंग  के ड्रेस पहने थे. फेसबुक पर इसपर बड़े रोचक संवाद हुए जो फोटो के नीचे कॉपी पेस्ट कर दे रही हूँ...



 Rashmi Ravija किस स्कूल से क्लास बंक कर के आ रहे हैं दोनों...ड्रेस तो एक ही स्कूल की लग रही है...एकदम मैचिंग :)

Abha Bodhisatva कल तो छुट्टी थी..... :)

Rashmi Ravija कोचिंग क्लास का बहाना बनाया होगा...हा हा

Abha Bodhisatva कोचिंग में स्कूल ड्रेस हा हा हा.... :)

Rashmi Ravija यूनिफॉर्म वाला नया कोचिंग क्लास खुलनेवाला है..:)

Ghughuti Basuti जहाँ पढ़ने जाएंगे ब्लॉगर! 

Satish Pancham मेरी टीचर ने तो आज मेरे कान पकड़ कर पिटाई भी कर दी.....ये कहते कि क्लास में तबीयत खराब का बहाना बहाना बनाकर छुट्टी ली और वहां ब्लॉगर बैठकी में जा पहुंचा ......वो क्या है कि मेरी टीचर भी फेसबुक पर ही है, उसे भी यहीं से पता चला :)
Ghughuti Basuti जो टीचर फेसबुक पर हो उससे पढ़ने नहीं जाना चाहिए.

वैसे रोचक बात यह भी थी कि घुघूती जी, बोधिसत्व जी एवं शरद जी ने शायद वसंत के आगमन की ख़ुशी में  पीले रंग के कपड़े पहन रखे थे..(घुघूती जी तो पीली साड़ी और लाल बिंदी में बहुत ही ख़ूबसूरत लग रही थीं.) उनके परिधानों पर वसंत के असर के   जिक्र पर बोधि जी ने कहा .."भायं भायं  करता आया वसंत..." सतीश जी ने इसपर 'इसी पंक्ति से एक कविता रच डालने  का अनुरोध भी कर डाला. देख लीजिये बानगी 
 
atish Pancham वैसे युनुस जी ने या शायद आप ही ने कहा था - 'भांय भांय बसंत'......रोचक शब्द रचना है :)
Bodhi Sattva यह मैंने कहा था भाई..खुद के लिए....

Satish Pancham बोधि जी.....इतने से नहीं चलेगा....पूरा किजिए :) 'भांय भाय करता बसंत' अब रच ही डालिए :)

Yunus Khan भांय भांय करते ब्‍लॉगर/भांय भांय करता बसंत। इस तस्‍वीर में खिले दांतों को देखकर कहा जा सकता है कि ब्‍लॉगरी करके भी खुश रहा जा सकता है।
Bodhi Sattva अरे सतीश जी...मैं अपनी वावाज को कितना प्यार करता हूँ.....निरपेक्ष हो कर नहीं लिख पाऊँगा... :)

Rashmi Ravija वावाज ???

Bodhi Sattva वावाज...के मायने हैं.....ऐसी आवाज जो तारीफ के काबिल हो..... 

शरद जी की उसी शाम की ट्रेन थी और बोधि जी की भी एक मीटिंग थी..इसलिए बातचीत अधूरी छोड़ कर ही सबको उठ जाना पड़ा. युनुस जी ने हँसते हुए  सुझाव रखा कि "अब ये बहस अगली मीटिंग में ठीक उसी बिंदु से शुरू होगी."
 मैने कहा..."हाँ! मैने विषय नोट कर लिया है..".अब तो यहाँ लिख भी दिया  :) 

वैसे एक "कोडक मोमेंट" छूट गया....बोधी जी ने "माफ़ करना माते " कहते झुक कर विधिवत घुघूती जी के पैर छू लिए और घुघूती जी ने भी भरपूर आशीर्वाद दिया. सबके चेहरे पर मुस्कान खिल आयी...बहुत ही हंसी-ख़ुशी के माहौल में वो पल गुजरे... कुछ ऐसे ही  और पलों का इंतज़ार है,अब.
कुछ और चित्र 
शरद जी, युनुस जी एवं बोधिसत्व जी 
सतीश पंचम जी, बोधिसत्व जी,आभा जी,शरद जी एवं युनुस जी 




दो महिलाओं के बीच बैठकर फोटो खिंचवाने के लिए मुस्कराहट की कॉन्फिडेंस जरूरी है.



Monday, April 18, 2011

गुसलखाना और फेक आई डी का रहस्य

तब दोनों ऐसे  मासूम दिखते थे

शीर्षक तो इण्डिया टी.वी. के तर्ज़ पर लग रहा है...पर पोस्ट बड़ी घरेलू सी है.


जैसा कि  पिछली पोस्ट में जिक्र किया था.....पति और बच्चों को बेवकूफ बनाने की अलग से कोई कोशिश नहीं की...पर अनजाने ही वे लोग धोखा खा बैठे...:)

कुछ साल पहले का वाकया है..एक दिन मेरे दोनों बेटे किंजल्क और कनिष्क खेल कर आए और नहाने जाने की तैयारी करने लगे...मैने यूँ ही पूछ लिया ..."कौन जायेगा.....गुसलखाना ?" और दोनों भाग कर मेरे पास आ गए..."हम चलेंगे...हम चलेंगे "...अब मुझे लगा कि इसका मतलब ये लोग नहीं जानते...मैने कह दिया, "अच्छा ..पहले नहा धो लो फिर देखते हैं...दरअसल इन्हें लगा..."केक खजाना "..."खाना खज़ाना " जैसा कोई रेस्टोरेंट है. नहा कर आए तो मैने  कह दिया, "आज तो देर हो गयी....कभी और चलेंगे"


फिर तो ये रोज़ का किस्सा हो गया...ये लोग गुसलखाने जाने की जिद करते और मैं रोज बहाने बना देती..."आज तुमलोगों ने ये शैतानी की....आज ये कहा नहीं माना ...गुसलखाना जाना कैंसिल".


एक दिन किंजल्क ने पूछा..."इतना तो बात दो...कहाँ पर है?..कितनी दूर है?"
मैने कहा,  "हर जगह है.."
"अच्छा!!..हमारे एरिया में भी?...फिर हमने बोर्ड कैसे नहीं देखा?"
"अब पता नहीं कहाँ ध्यान रहता है तुमलोग का...जो नहीं देखा "
मुझे मजा आ रहा था...एक दिन पतिदेव के सामने भी अनाउन्समेंट हो गयी...."मम्मी ने प्रॉमिस किया है, हमलोगों को गुसलखाना लेकर जायेगी ...आप भी चलेंगे ?"


इसके पहले कि पतिदेव राज़ खोलते मैने बात बदल दी...और इशारा कर दिया...उस दिन वे मान भी गए वरना 'सांटा क्लॉज़'  की गिफ्ट का रहस्य खोलने को हमेशा उतारू रहते थे.
अब ऐसे शैतान दिखते हैं

पर एक दिन दोनों ने सुबह से मेरी हर बात मानी ...अच्छे बच्चे बन कर दिखाया तो मुझे राज़ खोलना ही पड़ा....पर ज्यादा मजा  नहीं आया क्यूंकि हंसने वाली अकेली मैं ही थी...दोनों खिसियानी सूरत बनाए मुझे घूर रहे थे और फिर उन्हें मैकडोनाल्ड भी लेकर जाना पड़ा. {आपलोग भी आजमा सकते हैं....मुझे नहीं लगता आजकल के बच्चे इस शब्द का अर्थ जानते होंगे :)}


अब फेक आई डी का किस्सा..... करीब छः साल पहले मैने नया-नया इंटरनेट सर्फ़ करना सीखा था. उनदिनों  हम फ्रेंड्स एक दूसरे को अच्छे -अच्छे ई-मेल फौरवर्ड किया करते थे . पर पता नहीं मेरी आई डी में कुछ प्रॉब्लम आ गयी वो नहीं खुल रहा था. एक फ्रेंड ने सुझाया, तबतक एक अलग नाम से फेक आई डी बना लो...और मैने अलग नाम से एक आई डी  बना ली...और उसे जांचने के लिए कि ठीक बना है या नहीं...पति देव की आई डी पर  सिर्फ Hi ...how r u ? लिख कर एक टेस्ट मेल भेजा . उनके इन्बौक्स में चेक भी कर लिया कि मेल डिलीवर हो गया है.....मतलब मेरी आई डी काम कर रही है.


दूसरे दिन जब मेल चेक किया तो पाया सहेलियों के प्यारे प्यारे इमेल्स के साथ, पतिदेव का दो लाइन का जबाब भी पड़ा है कि "मैं आपको नहीं जानता...लगता है आपका मेल गलत एड्रेस पर आ गया है."
अब मैने सोचा...जरा इसे लम्बा खींचना चाहिए...मैने बड़ी विनम्रता से कुछ लम्बा ही इमेल लिखा, "आपने इतना व्यस्त होते हुए भी समय निकाल कर जबाब दिया....मैं बहुत इम्प्रेस्ड हुई ....आपसे दोस्ती करना चाहती हूँ...वगैरह वगैरह..." अपना सारा अंग्रजी ज्ञान उंडेल दिया कि पतिदेव इम्प्रेस्ड हो जाएँ.
अब, इंतज़ार था...जबाब  का..दूसरे दिन दो पंक्ति का जबाब आया, "मुझे दोस्ती करने में कोई दिलचस्पी नहीं है.....मैं दो बच्चों का  पिता हूँ..कृपया अब मेल ना करें "


थोड़ी निराशा तो हुई.....पर मैने  हिम्मत नहीं हारी....फिर से जबाब लिखा..."कि कोई बात नहीं..मैं भी दो बच्चे की माँ   हूँ...अच्छी दोस्ती चाहती हूँ....बहुत अकेली हूँ...वगैरह..वगैरह"


नवनीत अक्सर ऑफिस जाने से पहले मेल चेक कर लिया करते थे...मैं जान बूझकर आस-पास ही मंडरा रही थी कि जरा चेहरे का एक्सप्रेशन देख सकूँ. थोड़ी भृकुटी चढ़ी देखी तो पूछ लिया.."क्या हुआ "
उन्होंने कहा .."पता नहीं कोई  लेडी है..दोस्ती करना चाहती है ...मना करने के बाद भी रोज मेल भेजती है....अभी इसे स्पैम में डालता हूँ "
मैने थोड़ी सिफारिश की ..."रिप्लाई करने में क्या जाता है....देखें ...आगे क्या कहती है?"
पर उसके बाद उन्होंने कुछ ऐसा कहा  कि मुझे तुरंत ही सच बताना पड़ा......दरअसल कहा कि..."ये लोग कॉल गर्ल्स होती हैं...ऐसे ही मेल भेजा करती  हैं..."


और मेरा फिल्म "मित्र' की तरह इस प्रकरण को लम्बा खींचने का मंसूबा अकाल मृत्यु को प्राप्त हो गया. :(


("मित्र' फिल्म में पति-पत्नी ही चैट फ्रेंड हो जाते हैं....और एक दूसरे के गहरे दोस्त बन जाते हैं...एक दूसरे की समस्याएं हल करते हैं....पति काम के बहाने ड्राइंग रूम में बैठकर और पत्नी...बेडरूम से अपने अपने लैपटॉप से आपस में ही चैट करते हैं....)


पर हकीकत  और फिल्म में यही अंतर होता है.

Wednesday, April 13, 2011

अब प्रस्तुत है मेरे और अरशद अली के कुछ शरारती कारनामे

फर्स्ट अप्रैल  से ही युवाओं की शरारतों के किस्से पोस्ट करने शुरू किए थे...अभी श्रृंखला जारी ही थी कि क्रिकेट में  विश्व कप की जीत और अन्ना हजारे के जन आन्दोलन जैसी महत्वपूर्ण घटनाएं घट गयीं...और सामयिक पोस्ट लिख डाला. पर मूर्ख दिवस भले ही बीत गया...उसके किस्से तो सालो भर लिखे -पढ़े जा सकते हैं . पहले प्रस्तुत है 'अरशद अली' के शरारती कारनामे और अब उनका साथ देने को किसी और का संस्मरण  था नहीं सो खुद के ही लिख डाले :)



स्मार्ट दिखने की कोशिश और फलों के प्यार ने क्या हाल किया अरशद अली का.

 
सपत्नीक अरशद
मुझे याद है जब मै बहुत छोटा था तो तो प्यार से मुझे छोटू बुलाया जाता था ..मुझमे और मेरे बड़े भाई में मात्र एक वर्ष का अंतर था और हम दोनों आस-पड़ोस के सबसे सुन्दर बच्चों में सुमार थे ...पापा जब भी बाज़ार जाते तो हम दोनों के लिए कोई न कोई फल ज़रूर लाते...मगर फलों की पूरी जानकारी उस वक़्त हम दोनों के पास नहीं थी ...मै झोला में कोई फल ढूंढने  में माहिर था..यहाँ तक की इतना उतावला रहता था की पापा के आने का इंतजार करते हुए कई बार मम्मी से पूछ लेता था "पापा कब आयेंगे ".एक बार नाना के घर पर नाना  बाज़ार से सब्जी लेकर जैसे  पहुंचे ...अपनी आदत के अनुसार  मै दौड़ कर उनके झोले में झाँकने लगा....मुझे अच्छे से याद नहीं मगर कोई सब्जी जो मुझे बार बार अपने फल होने का आभास करा रही थी ..क्योंकि वास्तव में नाना जी कोई फल नहीं लाये थे..(उन्हें पता ही  नहीं था कि  उनके नाती फल के दीवाने हैं)..नाना खड़े होकर सारे शैतानियों  को देख रहे थे ..इसी बीच  मै उस  फल जैसी सब्जी को लेकर माँ-माँ चिल्लाते हुए यही पूछा कि  "माँ या खाने का है या पकाने का" ये नाना जी को अचम्भे में डालने के लिए काफी था ...क्योंकि नाना के घर मै, भाई मम्मी पापा के साथ देर रात पहुंचा था और नाना मेरे मुख से पहली चालाकी भरे वाक्य सुन रहे थे ...उसके बाद तो फल खाते खाते मै तंग रहा क्योंकि नाना जी मेरे  फल की दिवानगी को समझ चुके थे.....इसी क्रम में एक बार माँ ओल काट कर किचन में सब्जी बनाने के लिए रखी थी...और मै जैसे किचन में गया तो मुझे वो एपल (कटे हुए सेव ) के जैसा लगा और मै उनसे बिना ये पूछे की "ये खाने का है या पकाने का "दो-तीन टुकड़े  खा लिया .फिर तो पूछिये मत मेरा पूरा चेहरा सूज  गया...मम्मी-पापा आस-पड़ोस सभी परेशान हो गए ...जाने कितने निम्बू के आचार को खिलाया गया..तब  जाकर मुझे आराम मिला ...

दूसरी एक घटना जो मै भुलाए नहीं भूलता ...मेरे पापा बेहद सलीके से रहने के कारण पूरे  आस पड़ोस में सबसे स्मार्ट दीखते थे 
मै और मेरे भाई में हमेशा पापा जितना स्मार्ट दिखने की होड़ लगी रहती थी...मुझे पापा ने इतना प्रभावित कर रखा था की उनके सभी हरकत  पर मै नज़र रखता था जैसे वो कब नहाते है कपडे कैसे पहनते हैं आदि आदि ....पापा रोज़  दिन शेविंग करते थे ..और अभी भी करते हैं ..उन्हें मै दो चार दिनों से नोटिस कर रहा था ..मुझे उनके स्मार्ट दिखने का कारण उनका शेविंग करना लगने लगा ...फिर क्या था एक मौके की तलाश में रहने लगा ...कुछ ही दिनों के बाद मुझे मौका मिल गया ,माँ पड़ोस की आंटियों के साथ बाहर बातें कर रही थी ..मै घर पर अकेले था ...पापा का शेविंग किट उठाया ,रेजर में ब्लेड लोड किया ..शेविंग क्रीम गालों पर लगाया ...और जैसे हीं गाल पर रगडा मुझे वो आवाज़ (किर-किर ) नहीं मिली जो पापा के शेविंग करने पर आती थी...मुझे लगा मुझसे कोई गलती हो गयी है शायद ब्लेड काम नहीं कर रहा ...चेक करने के लिए मैंने रेजर को अपने सर के दाहिने तरफ  के बाल पर रगडा..और रगड़ते हीं कुछ बाल बाहर आ गए ...किसी तरह आईने में अपने चेहरे को देखा और बहुत डर गया...मुझे लगने लगा अब मेरे सर के इस हिस्से पर बाल कभी नहीं आएगा....दौड़ कर पापा के टेबल से गोंद निकाल  कर बाल को सर पर साटने का अथक प्रयास किया मगर विफल   रहा ....धीरे धीरे ये बात मम्मी से पापा ...और बढ़ते बढ़ते पुरे आस पड़ोस में फ़ैल गयी ....पापा बड़े प्यार से समझाते हुए मेरे पुरे बाल को हज़ाम से उतरवा लाये....अब मै पूरा टकला था और कई  महीनों तक पापा जैसा स्मार्ट भी नहीं दिखा ....

जाने ऐसी कितनी और बातें है ...मगर ये दो घटनाएं हमेशा मुझे गुदगुदा जाती हैं ....पापा-मम्मी भी हँसे बिना नहीं रह पाते.
सरिता, मैं, सोना और रेखा


उम्र के हर मोड़ पर की गयी कुछ शरारतें


पिछली बार जब बाल-दिवस पर और इस बार मूर्ख दिवस पर लोगो को परिचर्चा का आमंत्रण  भेजा तो कुछ लोगो का उत्तर आया..."मैं तो बड़ा सीधा- साधा था...पढ़ने-लिखने वाला...अनुशासनबद्ध छात्र...कभी कोई शरारत की ही नहीं." और फिर मैं सोचने लगी...मैं भी पढ़ने में अच्छी ही थी {अब मौके का फायदा उठा कर बता ही दूँ  कि हमेशा क्लास में फर्स्ट आती थी....दो बार स्कॉलरशिप भी मिली :)} कभी अनुशासन  भी नहीं तोडा..पर शरारतें तो खूब कीं....सबने किए होंगे....शायद फर्क ये है कि..मैने याद रखे हैं वे लोग जरूर भूल गए होंगे.

जब पांचवी या छठी कक्षा में थी..तभी मुझे पहली बार फर्स्ट अप्रैल की खासियत पता चली. उन दिनों पापा, लंच टाइम में  ऑफिस से घर खाना खाने आया करते थे. उन्होंने खाना शुरू ही किया था कि पड़ोस वाली आंटी का नौकर साफ़ कपड़ों से बंधी एक  नई मिटटी की हांडी लेकर आया और बोला...कि "उनके गाँव से ताज़ा दही आया है". पापा खुश होकर मम्मी से बोले.."एकदम सही समय पर लाया है जल्दी से कटोरी में डाल, ताज़ा दही ले आओ" पर उस मिटटी की हांडी में था चावल का मांड और सब्जियों के छिलके. मम्मी ने फिर से हांडी के मुहँ पर कपड़ा बाँध 'रामबिहारी' के हाथों दूसरी आंटी के यहाँ भिजवा दिया...और फिर तो वो हांडी शाम तक घर-घर घूमती रही.

बड़ों की ये शरारत देख मुझे भी एक आइडिया आया. उन दिनों क्रीम बिस्किट इतना आम नहीं हुआ था. पापा जब पास के बड़े शहर जाते, तब लेकर आया करते थे. मैने बड़ी सफाई से उन बिस्किट्स का क्रीम निकाल कर उसपर मिटटी का लेप लगा कर रख दिया. शाम को कॉलोनी के सारे बच्चे इकट्ठे होकर खेलते थे और किसी ना किसी के घर पानी पीने के लिए जाया करते. उस शाम मैने उन्हें घर पे क्रीम बिस्किट की बात बतायी और सब बड़े खुश-खुश चले आए...पर एक बाईट लेने के बाद ही उनकी  थू थू करती  हुई  अजीब सी मुखाकृति और अपना पेट पकड़ कर हँसना अब तक याद है...(पता नहीं अब वो रीता,अक्षय, मिथिलेश, सीमा, अनीता, मोहन,प्रतिमा, कहाँ होंगे .)

फिर मैं हॉस्टल में चली आई. हॉस्टल में हमलोगों को  नाश्ते में रोज़ अलग-अलग चीज़ें मिलती थी. उस फर्स्ट अप्रैल को शायद बुधवार था और उस दिन हमें कुरमुरे  और जलेबी मिला करते  थे. मैं किसी काम से बाहर आई तो देखा मेट्रन दी, प्यून को ...जलेबी लाने के लिए पैसे दे रही हैं. प्यून के गेट से बाहर जाते ही मुझे शरारत सूझी और मैने जाकर नाश्ते की घंटी बजा दी . मेस से महाराज और प्रमिला, कामख्या (मेस में काम करने वालीं ) निकल  कर देखने आयीं कि जलेबी तो अभी आई नहीं...घंटी कैसे बज गयी. मैने उन्हें चुप रहने का इशारा करते हुए बताया कि आज पहली तारीख है,..आज के दिन लोगो को बुद्धू  बनाते हैं. सारी लडकियाँ खुश होते हुए बातें करती हुई आ रही थीं कि आज तो जलेबी है नाश्ते में. पर जब इंतज़ार करना पड़ा तो सबने कटोरी चम्मच बजा और मेज़ थपथपा कर इतना शोर मचाया और 'रश्मि जलेबी लाओ...' का इतना नारा  लगाया कि मेट्रन आ गयीं. पर उन्होंने भी sportingly लिया और मुझे डांट नहीं पड़ी.

लेकिन हमारी कॉलेज की लेक्चरर इतनी sporting नहीं थीं. बी.ए. में इंग्लिश के लेक्चर में दो सेक्शन एक साथ क्लास अटेंड करते. पहली मंजिल पर क्लास होती थी. मुझे और मेरी फ्रेंड प्रियदर्शिनी ने एक आइडिया सोचा जिस से लेक्चरर और स्टुडेंट्स दोनों को एक साथ बुद्धू बनाया जाए. हमने  मेज पर चढ़कर  ऐलान कर दिया कि मैडम के पैरों में दर्द है...वो सीढियाँ नहीं चढ़ पाएंगी...इसलिए क्लास नीचे लेंगीं. सारी लडकियाँ गिरती-पड़ती नीचे भागीं. थोड़ी देर बाद हमने पिलर के पीछे से छुपकर देखा, मैडम बड़ा सा रजिस्टर उठाये उपरी मंजिल की तरफ जा रही हैं. पर पूरी क्लास खाली देखते ही उनका पारा चढ़ा गया और लौटती हुई उनकी तेज चाल ने ही उनके मूड का रहस्य  खोल दिया. काफी देर इंतज़ार करने के बाद दो लडकियाँ स्टाफ रूम में देखने  गयीं कि मैडम क्यूँ नहीं आ रहीं? बाद में पता चला,उन्हें बहुत डांट पड़ी...लेकिन हमारी एकता ऐसी थी कि उनलोगों ने हम दोनों का नाम नहीं बताया.

श्रावणी, बबिता, कविता और सुष्मिता
स्कूल-कॉलेज के बाद घर- गृहस्थी में जुट गयी...पर पुरानी  आदत तो आसानी से जाती नहीं. कुछ साल पहले जब टाटा स्काई और डिश टी.वी. का चलन नहीं था..सबके यहाँ केबल टी.वी ही था. यहाँ मुंबई में पाइरेटेड सी..डी. के लिए बहुत ही सख्त नियम हैं. अगर केबल पर नई फिल्म दिखाई गयी तो पुलिस केबल वाले को पकड़ कर ले जाती है. फिर भी हमारा  केबल वाला दर्शकों के डिमांड पर रिस्क लेकर कभी-कभी फ़िल्में दिखा दिया करता था. उन दिनों 'ब्लैक' रिलीज़ ही हुई थी. और हम सब सहेलियों का देखने का मन था.  पास की ही एक बिल्डिंग में मेरी कई  फ्रेंड्स रहती हैं..सोना, रेखा, शशि, सुष्मिता, कविता...मैने ग्यारह बजे के करीब सबको फोन करके कहा कि "टी.वी. ऑन करो....केबल पर  'ब्लैक'  आ रही है " सोना की  बेटी आनंदिता  ने फोन उठाया और ख़ुशी से चीख पड़ी..और अपने भाई को डांटने लगी..."जल्दी चैनल चेंज करो " सुष्मिता ने अफ़सोस से कहा.."मेरा खाना नहीं बना नहीं बना रे अभी तक "...मैने कहा "अरे बाहर से मंगवा लो...ये मौका निकल जाएगा.." हाँ, ऐसा ही  कुछ करुँगी..." कहते फोन रख दिया उसने. शशि की बेटी तो तुरंत फोन पटक कर बगल में अपनी  सहेली को बताने के लिए भाग गयी. कुछ देर बाद सबके  फोन भी आए..."नहीं आ रहा.." मैने कहा.."अभी हटा दिया है ...थोड़ा इंतज़ार करो फिर से लगाएगा"

शाम को वे  सारी सहेलियाँ अपनी बिल्डिंग के गार्डेन में मिलती हैं...जब शाम को मिलीं तो पता चला कि सबके पास ही मेरा फोन  गया था. वे सब मेरे घर पर धावा  बोलने वाली थीं कि अब कहीं से भी सी.डी. मँगा  कर दिखाओ...पर रहम करके मुझे छोड़ दिया.


{ अब बच्चे  और पतिदेव कैसे बाकी  रहते बेवकूफ बनने से....पर उनलोगों को बनाने की जरूरत पड़ती है क्या?? :):) ....लिख तो दिया ये, अब प्रार्थना कर रही हूँ कि ये पंक्तियाँ  वे लोग ना पढ़ें }
अगली पोस्ट में वे अनुभव 

Saturday, April 9, 2011

जन-सपनों का आगाज़

हमारी पीढ़ी ने जिन्होंने गांधी जी को नहीं देखा...स्वतंत्रता आन्दोलन में उमड़ते जन सैलाब की कहानियाँ ही सुनी हैं....या फिर क्रिकेट विश्व कप के जीत के जुनून में युवा लोगो को सड़कों पर अपनी ख़ुशी जाहिर करते हुए देखा है.

पिछले चार दिनों में देश  के  हर  गली -कूचे  में  जन समूह को यूँ उमड़ते  देख उन्हें थोड़ा इलहाम तो हो गया कि आजादी का वो आन्दोलन कैसा रहा होगा?...और एक अकेला व्यक्ति भी अगर अपने ह्रदय की आवाज़ सुन जनहित में कुछ करने की ठान ले तो लोग खुद ब खुद जुड़ते चले जाते हैं. हर तबके के लोग सिर्फ अपने दिल की आवाज़ सुन अपना समर्थन व्यक्त करने आ रहे थे.

कई बुद्धिजीवियों का कहना है इस से क्या हो जायेगा?? बिल अभी पास होना है..उसपर कार्यवाई होनी है, लोगो को सजा दिलवानी है...जनता को न्याय दिलवाना है...यह सब क्या हो पायेगा??


भविष्य तो किसी ने नहीं देखा है, लेकिन क्या इस डर से कि कुछ हो ही नहीं सकता,हाथ पर हाथ धरे बैठे रहना ही उचित  है? जैसा कि अब तक था....सिर्फ भ्रष्टाचारियों के  विरुद्ध विष-वमन कर निरुपाय से मन को शांत कर लेते थे.  यह मंजिल की तरफ एक छोटा सा कदम तो है. शायद कदम भी नहीं ...कदम उठाने की चाह भर ही है..जैसा कि लोग नारे लगा रहे थे... "ये तो एक अंगडाई है...सामने बड़ी लड़ाई है " अंगडाई ही सही,..कुछ करने की तमन्ना तो जागी. ऐसे ही नहीं कहा गया है. something  is  always better  than   nothing  . अगर हम पहले से ही सोच लें...कुछ नहीं हो सकता ,ये सिर्फ खुशफहमी है...सफलता  नहीं मिलने वाली तो दुनिया अब तक आदिम अवस्था में ही रहती....ना तो हम इस आधुनिक युग में होते ना ही कभी कोई जन आन्दोलन, साकार रूप लेता. किसी ने तो पहला कदम बढाया होगा.

लोग सवाल कर रहे हैं...क्या भूख...गरीबी...भ्रष्टाचार...पूंजीपतियों  का वर्चस्व ख़त्म हो जायेगा?? पर क्या हमारे इन सबके विरोध में लम्बे-लम्बे आलेख लिखने से वह सब ख़त्म होनेवाला है??

भ्रष्टाचार कण-कण में इस तरह व्याप्त हो चुका है कि हर आदमी को पहले खुद को इस में  आलिप्त होने से रोकने की जरूरत है. जैसे स्वेच्छा  से सबने विदेशी कपड़ों का त्याग किया था...अंग्रेजों से देश को मुक्त करने के लिए अपने घर से शुरुआत की थी. करप्शन ख़त्म करने के लिए भी पहले खुद को ही सुधारना होगा. अगर भ्रष्टाचार  के  खिलाफ लोग आवाजें उठा रहे हैं तो उम्मीद है,ये आवाज़ उनके अपने कानो तक भी जाएगी.

हमें ये आशा नहीं करनी चाहिए कि यह बिल ,कोई जादू की छड़ी है जो सबकुछ ठीक कर देगा...पर अगर आगे चलकर ,भ्रष्टाचार, काला-बाजारी में थोड़ी भी कमी हो तो यह सुधार की दिशा में एक कदम तो है. बेधड़क बड़े-बड़े घोटाले करनेवाले  शायद एक बार डरेंगे तो कि ऐसा  कानून  है जो उन पर शिकंजा कस सकता है.

जनता को अपनी ताकत का अंदाज़ा  तो हो गया कि वो अगर चाहे तो सरकार को घुटने टेकने पड़ेंगे ,सरकार अपनी मनमानी नहीं कर सकती...जनता ने सपने देखने  तो सीखे , प्रतिनिधियों को चुन कर भेजने के बाद , अपना भविष्य उन्हें सौंप,जनता विवश हो जाती थी. सरकार को ये संदेश तो मिला  उसे देश रुपी गाड़ी चलाने के लिए दी गयी है...वो इस गाड़ी को अपने घर लेकर नहीं जा सकती. सरकार सिर्फ  ड्राइवर की भूमिका में है. उसपर अंकुश  गाड़ी के मालिक,जनता का है.

रवि रतलामी जी
के ब्लॉग पर बहुत ही सहज सरल  शब्दों में बहुत महत्वपूर्ण और बेसिक जानकारी दी गयी है इस निर्देश  के साथ कि " इस संदेश को आगे भेजें. "

छींटें और बौछारें  ब्लॉग से साभार

  
1. अन्ना हजारे कौन हैं?
सेवा-निवृत्त सैनिक जिन्होंने 1965 के युद्ध में हिस्सा लिया था. समाज सुधारक.
2. तो इनमें क्या खास बात है?

इन्होंने महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले के रालेगांव सिद्धि नामक गांव की काया पलट दी.

3. तो क्या हुआ?

यह स्व-पोषित गांव के रूप में एक मॉडल है. यहाँ के सोलर पावर, बायोफ़्यूल तथा विंड मिल में गांव की जरूरत जितनी बिजली पैदा कर ली जाती है.
1975 में यह गांव बेहद गरीब था. आज यह देश के सर्वाधिक समृद्ध गांवों में से एक है. यह स्व-पोषित (सेल्फ सस्टेन्ड), पर्यावरण-प्रेमी तथा भाईचारा युक्त मॉडल गांव बन चुका है.


4. ठीक है?

अन्ना हजारे को उनके सामाजिक कार्यों के लिए पद्म भूषण की उपाधि से नवाजा गया है.


5. अच्छा तो वो किस लिए आंदोलन कर रहे हैं?

भारत में भ्रष्टाचार रोकने हेतु नया प्रभावी कानून पास करवाने के लिए.


6. यह कैसे संभव है?

वे नए लोकपाल बिल की वकालत कर रहे हैं. यह बिल राजनीतिज्ञों (मंत्रियों), अफसरों (आईएएस/आईपीएस) इत्यादि को उनके भ्रष्ट कार्यों की सज़ा दिलाने में सक्षम होगा.


8. क्या ये एकदम नई चीज है?

1972 में तत्कालीन कानून मंत्री शांति भूषण ने यह बिल प्रस्तावित किया था. तब से राजनीतिज्ञ इसे दबाए बैठे हुए हैं और इसमें मनमाना संशोधन कर अपने अनुकूल बनाने में लगे हुए हैं.


7. ओह.. तो वो सिर्फ एक बिल पास करवाने के लिए अनशन पर बैठे हैं. क्या ये इतने कम समय में संभव हो पाएगा?

पहली चीज जो वो चाह रहे हैं वो है कि सरकार घोषणा करे कि यह बिल जल्द पास होगा. उन्होंने महाराष्ट्र में सूचना का कानून ऐसे ही आंदोलन से लागू करवाया जिसे बाद में पूरे भारत में आरटीआई कानून के रूप में लागू किया गया.
दूसरा, बिल के मसौदे के लिए सरकार एक कमेटी बनाए जिसमें जनता के प्रतिनिधि और सरकारी प्रतिनिधि बराबर हों. सरकारी अफसरों और राजनीतिज्ञों द्वारा बनाए गए बिल में अपने बचने के रास्ते और लूप होल्स निकाल ही लिए जाएंगे.


8. बढ़िया. क्या होगा जब यह बिल पास हो जाएगा? 

लोकपाल की नियुक्ति केंद्र सरकार करेगी. वह इलेक्शन कमिश्नर की तरह ऑटोनोमस कार्य करेगा, किसी सरकारी संस्था के अधीन नहीं. हर राज्य में लोकपाल होगा. उसका काम सिर्फ यही होगा कि भ्रष्टाचार की रोकथाम करे और भ्रष्ट लोगों को 1-2 वर्ष के भीतर ट्रायल कर सजाएँ दे.

9. अन्ना हजारे के साथ और कौन हैं?

भारत की पूरी जनता. बाबा रामदेव, किरण बेदी, अरविंद केजरीवाल, आमिर खान...


10. ठीक है, तो मैं क्या कर सकता हूँ?

इस संदेश को आगे भेजें. छापें, वीडियो में दें. अपने शहर में हो रहे इस आंदोलन के समर्थन में सभा, जुलूस में जाएँ. फेसबुक, जीमेल स्टेटस में आंदोलन को अपना समर्थन दर्ज करें.

Tuesday, April 5, 2011

कॉन्फिडेंट कैप्टन का कूल व्यवहार


किसी ने पूछा, "वर्ल्ड कप की जीत पर कोई पोस्ट लिख रही हैं ??" ...और मैने कह दिया...."बचा क्या है लिखने को??..एक एक मिनट की सचित्र खबर तो अखबार..टी.वी...नेट ...ब्लॉग हर जगह छाई हुई है." कोई इरादा भी नहीं था, कुछ लिखने का पर जैसी कि आदत है...कहीं कुछ अच्छा पढ़ती हूँ तो परिवार वालों को वो आर्टिकल पढ़ने को कहती  हूँ...दोस्तों को एस.एम.एस. करती हूँ...फिर  अपने ब्लॉग पर शेयर करना, उस पूरे आर्टिकल को दुबारा  पढ़ने के सामान ही है.

Mumbai Mirror 
में प्रसिद्द मनोचिकित्सक हरीश शेट्टी ने धोनी की फाइनल में खेली पारी का बहुत ही अच्छा मनोवैज्ञानिक विश्लेषण किया है....जो सबके लिए उदाहरणस्वरुप है कि संकट के समय, अपना व्यवहार कैसे संयत रखें.

आलोचना को अपनी प्रेरणा बना लें -----  20-20 वर्ल्ड कप के प्रेजेंटेशन सेरेमनी में धोनी ने रवि शास्त्री  से एक मुस्कराहट के साथ कहा, " I remember u called us underdogs and so we have won the cup for you."  यहाँ एक खिलाड़ी, वरिष्ठ खिलाड़ी के कटाक्ष  के वजन के नीचे धराशायी नहीं  हुआ बल्कि उसे सकारात्मक तरीके से लिया और कुछ कर दिखाने के लिए कमर कस ली. अगर कोई महत्वपूर्ण व्यक्ति, आपकी काबिलियत नहीं समझें और आपकी सफलता पर शक करे. तो अपने अंदर के डर, गुस्सा, दुख और उदासी पर विचार करें(get in touch with your feelings of fear, dread,anger or sadness and convert these into greater resolve)  और उनपर विजय प्राप्त कर सकारात्मक परिणाम की कोशिश करें. बचपन में सचिन तेंडुलकर भी तब तक बेचैन रहते थे..जब तक वे टेबल टेनिस में अपनी हार का बदला  अपने दोस्तों से नहीं ले लेते थे. युवराज के बारे में भी एक कार्यक्रम में उनके एक दोस्त ने बताया कि एक बार गर्मी की  छुट्टियों में आए उनके चचेरे भाई ने उन्हें टेबल-टेनिस में हरा दिया...युवराज ने पूरे साल  मेहनत की और अगली छुट्टियों में जैसे ही उस भाई से मिले...उसे एक मैच का न्योता दे   डाला और उसे हरा कर ही दम लिया.

बीती ताहि बिसार दे..आगे की सुधि ले
  --- जब भी भारत कोई मैच हारता है...धोनी पब्लिक में उस हार की जिम्मेवारी खुद ले लेते हैं पर फिर वे तुरंत ही आगे की सोचने लगते हैं. एक मैच हारने के बाद पत्रकारों को उनका जबाब था, " ये मैच तो ख़त्म हो गया...अब अगले मैच का प्लान करें ?" पहले के कैप्टन....कोई मैच हारने  पर हार के कारणों की मीमांसा करते थे...कहाँ गलती हुई...इन्ही पर सोचते रहते  थे और कई बार पिच और मौसम को दोषी ठहरा देते थे पर  धोनी....अगले  मैच की  सोचते हैं और हार और निराशा को अपनी राह का रोड़ा नहीं बनने  देते .अगली मंजिल पर फ्रेश दिमाग और फ्रेश निगाहों से कदम बढाते हैं. जब चीज़ें सही ना हों तो खुद की या दुसरो की बहुत ज्यादा आलोचना नहीं करनी चाहिए, इस से शिथिलता आती है.

मैं नहीं हम
---- जीत के दिन वर्ल्ड कप सबके हाथों  में था...सिवाय धोनी के . कुछ साल  पहले एक टेस्ट सिरीज़ में जीत के बाद धोनी ने अनिल कुंबले से विजयी  कप ग्रहण करने का आग्रह किया था. विश्व कप में भी शरद पवार के हाथों से कप लेते ही धोनी ने सचिन के हाथों में थमा दिया...और किनारे चले गए. हर  फोटो  में  वे किनारे ही खड़े हैं..केंद्र में नहीं. स्टेडियम  का चक्कर लगाते हुए भी वे पीछे-पीछे ही थे. पर जब टीम  मेट्स की कोई बात अच्छी नहीं लगती तो उसे कहने से भी नहीं हिचकते.... जैसे  कि गौतम का शतक  के इतने पास आकर एक ख़राब शॉट के कारण चूक जाना उन्हें अच्छा नहीं लगा तो कहने में नहीं हिचके.." he was himself to blame for this "
  प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने कहा है .."मिडिल ऑर्डर को परफॉर्म करना चाहिए " या " श्रीसंत  को अपने व्यवहार पर काबू रखना चाहिए " और यह सब वही कह सकता है जो अपने टीम मेट्स को भरपूर प्यार भी दे. तभी उनके साथी  उनकी बातों का बुरा नहीं मानकर ,अपनी गलतियाँ सुधारने की कोशिश करते हैं.

दिमाग शांत रखें
---- सब जानते हैं धोनी कभी गालियाँ नहीं देते...या फील्ड पर अपना आपा नहीं खोते . धोनी को खुद से बातें करते देखना रोचक होगा. शायद वे खुद से मन ही मन कहते हों, 'calm down.' focus now', 'let me try something new ' इस तरह के इमोशंस उनके मन के स्क्रीन पर आते-जाते रहते होंगे.  जब बुरा समय हो तो बस अपनी भावनाओं को observe  करना चाहिए. अगर आप चिल्लाते हैं और गुस्सा दिखाते हैं..इसका अर्थ है आपके इमोशंस ने आपको हाइजैक कर लिया है और अपने दिमाग पर आपका वश नहीं है. आप अपनी लड़ाई और अपना मित्र, शुभचिंतक  सब हार सकते हैं. और अगर अपनी भावनाओं  पर काबू रखते हैं तो परिणाम हमेशा अच्छे ही होते हैं. 
जीत पर सबकी प्रशंसा पाकर भी, उन्हें याद रहता है कि अगर हार गए होते तो उनके प्रशंसक क्या कह रहे होते. अभी हाल की पकिस्तान से मिली जीत पर प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने कहा, "सुना है मेरे घर के सामने लोग आतिशबाजी छोड़ रहे थे....यही लोग कुछ साल  पहले हमारी टीम की  हार पर मेरे गेट पर कालिख पोत गए थे "

खुद पर भरोसा करें
----- धोनी ने रवि शास्त्री को जैसे टीज़ करते हुए कहा...""अभी अगर हम हार गए होते तो सवाल होते, "श्रीसंत  क्यूँ..."युवराज के पहले बैटिंग क्यूँ की ...??"  ख़राब फॉर्म के बावजूद धोनी का युवराज के पहले बैटिंग के लिए आना यह दिखाता  है कि वे चुनौती स्वीकार करते हैं और दूसरों की सलाह की  या लोगो की प्रतिक्रिया क्या होगी...ये सोचने के बजाय अपने फैसले पर ज्यादा भरोसा करते हैं. अनिल कुंबले ने भी कहा था..."जब उनका फॉर्म अच्छा नहीं होता तो उन्हें कई सारी सलाह दी जाती थी पर वे सबको इग्नोर कर अपने फैसले के ऊपर ही मजबूती से डटे रहते थे."   
शायद धोनी का मन्त्र भी है...'रिस्क लो..अपने मन की सुनो और शांत रहो..'.

आभार ---  धोनी खुले दिल से किसी का भी आभार  प्रकट करते हैं. वे चाहते तो सारा क्रेडिट खुद ले सकते थे. कि युवराज से पहले बैटिंग का फैसला सिर्फ उनका था  पर उन्होंने कहा, गैरी क्रिस्टिन  ने मेरे युवराज के पहले बैटिंग करने के निर्णय में हामी भरी ..' और उन्होंने गैरी और पैडी  को दिल से धन्यवाद दिया. आभार प्रगट करने से उनका क्रेडिट तो उनके साथ रहा ही...पर उनकी दरियादिली और विनम्रता ने सबके दिलो में उनकी थोड़ी इज्जत और बढ़ा दी.


यह सब कोई अनोखी बात नहीं है...और ना ही किसी ने पहली बार सुनी है..पर आँखों के सामने किसी को इन सबका  सहारा लेकर सफलता के सर्वोच्च  शिखर पर देखना एक अलग ही अनुभव है.


Garry Paddy  जो टीम के मेंटल  कंडिशनिंग कोच थे...उन्होंने भी गौतम गंभीर...लक्ष्मण और धोनी का नाम लिया कि ये लोग संकट में ज्यादा मजबूत होकर उभरते हैं.

शोभा डे ने हमेशा की तरह चटपटे अंदाज़ में अपने ब्लॉग पर लिखा है..."MSD का नशा LSD के नशे से कही  बेहतर है. धोनी के सुपरस्टार का रुतबा सारे बॉलिवुड के हीरो के रुतबे को मिलाने के बाद भी  उनसे बड़ा है. हमें कोई बॉलिवुड सुपरस्टार क्यूँ चाहिए अगर हमारे पास Red Hot Dhoni  है. Dhoni has everything going for him – good looks, a cool head, sex appeal, and exceptional leadership qualities. धोनी को कप ग्रहण करते हुए सब याद रखेंगे...पर उस से ज्यादा ये याद करेंगे  कि कैसे  उन्होंने  वो कप सचिन तेंडुलकर को सौंप  दिया और खुद जाकर किनारे खड़े हो गए,  जैसे कोई बारहवें खिलाड़ी हों. जबकि शायद दूसरा कोई अभिमानी व्यक्ति होता तो पूरे समय केंद्र में खुद होता और दरियादिली दिखाते हुए , कहता  कि "मैं यह सब अपने टीम के बगैर नहीं पा सकता था..." लेकिन धोनी ने शब्दों की बजाय अपने एक्शन पर ज्यादा ध्यान दिया. और बिना बोले ही जता दिया कि अपनी टीम से कितना प्यार है और कितना भरोसा था. यह क्षण  धोनी के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण क्षण था पर इसका रसास्वादन उन्होंने अकेले नहीं...अपने दोस्तों के साथ करना ज्यादा जरूरी समझा. और उनकी यही दरियादिली सारे क्रिकेट प्रेमी का चहेता बना देती है."

विदेशी अखबारों ने भी धोनी की प्रशंसा की  है...लंदन के
The Telegraph ने लिखा है " Dhoni is Mr. confident. But even more so he is cool. He exudes a kind of Karma under the most intense stress. You see it everywhere ,behind the stumps, in press conference, at the crease"

ऑस्ट्रेलिया के अखबार 
The Age में छपा है , " In the critical  hour, and despite modest returns, Dhoni dared to back himself.That is leading from the front.Even in the toughest time,too he managed to convey composure. Throughout, his players felt that captain remained on the bridges and the situation was under control.

ये सब लिखते वक्त
'अदा' याद आ रही है....जब भी बात होती है जरूर कहती है...."रांची के पानी में ही कोई बात है" (अदा का घर रांची है और मेरा ननिहाल भी रांची ही है...जहाँ मेरा जन्म और प्रारंभिक शिक्षा  हुई है  )

हाँ!! अदा...रांची के पानी में ही कोई बात है :):)

Sunday, April 3, 2011

अभिषेक ओझा,सोनल रस्तोगी, देवांशु एवं विवेक जैन के शरारती कारनामे

सबसे पहले तो आप सबको बधाई और भारतीय टीम को धोनीबाद . अब हमें १९८३ के वीडियो का बार बार पुनर्प्रसारण नहीं देखना पड़ेगा...अब हमारे पास फ्रेश तस्वीरें हैं....:) करोड़ों दिलो की मुराद पूरी हुई और कल लगा जैसे ऐसी  दीवाली  तो देश ने कभी मनाई ही नहीं...तिरंगा तो यूँ लहरा रहा था मानो आज ही स्वतंत्रता  मिली हो हमें. अजनबी एक-दुसरे से गले मिल और हाई-फाइव दे एक दुसरे को बधाईयाँ दे रहे थे...अनुपम दृश्य था.....स्मृतियों में हमेशा ताज़ा रहेगा


अब हमारे शरीफ से दिखते युवा ब्लॉगर्स की शैतानी की कहानी...उन्ही की जुबानी




दुसरे के लिए बुने जाल  में खुद उलझे.... अभिषेक ओझा

बात कुछ ऐसी है जिसमें किसी की टांग खीचते हुए हम खुद ही उलट-पलट गए थे. यूँ भी टांग खिचने में मैं कभी पीछे नहीं रहता और जब ऐसा ही एक अच्छा मौका हाथ लगा वो भी दोस्तों के साथ तो चुकने का तो सवाल ही नहीं था. हमारे एक दोस्त उन दिनों एक लड़की पर थोड़े सेंटी से थे और हम उनकी इस बात पर खूब खिंचाई करते. उन्हीं दिनों के एक वीकेंड हम कई मित्रों के संग एक बीच घूमने गए हुए थे. और हमारे सेंटी दोस्त उस वीकेंड दिल्ली में थे, संयोंगबस वो लड़की भी उस वीकेंड दिल्ली में ही थी. मुझे इस बातकी जानकारी थी क्योंकि मैं दोनों का ही दोस्त ! अच्छा दोस्त. 
 अब समुद्र के किनारे बैठे-बैठे रात के ९ बजे सर्वसमत्ति से ये फैसला हुआ कि अपने दोस्त को ये सन्देश भेजा जाय कि इस वीकेंड वो जरूर कुछ प्लान कर लें. क्योंकि संयोग बस दोनों ही दिल्ली में थे. इस्तेमाल हुआ मेरा मोबाइल और मेसेज भेज दिया गया. थोड़ी देर में जब लड़की के मोबाईल से ये रिप्लाई आया कि 'तुमने ये मेसेज मुझे गलती से भेज दिया है, सही नाम बता दो तो मैं ही फॉरवर्ड कर दूं.' तो माथा ठनका. हुआ यूँ था कि मेसेज गलती से उस लड़की को ही भेज दिया गया था. मेसेज में बस इतना लिखा गया था: 'वीकेंड प्लान कर लेना, XXXX भी इस वीकेंड दिल्ली में ही है :)'. अब मित्रगणों ने तो अपना रास्ता नाप लिया और फँस गया मैं.  बात तो कुछ ज्यादा नहीं थी पर अपनी इमेज तो है ही शरीफों में भी शरीफ की. बस इस मामले ने ऐसा उलझाया कि समझाते-समझाते नानी याद आ गयी :)  किसी तरह दोस्ती बची. लेकिन बची तो ऐसी बची की पहले से भी बहुत अच्छी हो गयी. इसी बीच ये तय हुआ कि ये घटना जिनको पता है बस उन्हीं तक रखी जाय. मैं बहुत अपसेट था तो एक अन्य मित्र ने जब इसका कारण पूछा तो उन्हें बताया गया कि मेरा ब्रेकअप हो गया और कारन ये बताया गया कि मेरी गर्लफ्रेंड ने गलती से एक मेसेज भेज दिया जो वो अपने दूसरे बोयफ़्रेंड को भेज रही थी. उन मित्र को मुझसे आज तक सहानुभूति है :) सोचता हूँ किसी दिन उन्हें सच्चाई बता दी जाय

 

सोनल रस्तोगी के आइडियाज़ जनहित में जारी :)
 

क्या याद दिला दिया आपने ..हर साल १ अप्रैल को जबरदस्त मस्ती करती थी नए नए विचार और ढेर सारी शरारतें .. हर साल लोग मुझसे सावधान रहते और मैं नई नई खुराफातें सोचती ...कुछ आप लोगों के लिए
१) सेण्टरफ्रेश में करेले का injection - इंस्टिट्यूट के खास दोस्तों के लिए मेरा ख़ास तोहफा करेले का जूस निकाल कर injection की सहायता से सेंटर फ्रेश के बीच में लगा दे .. खिलाने वाले पर शक का कोई सवाल ही नहीं उठता .
२) गला खराब -सुबह सुबह स्कूल पहुँच कर फुसफुसाते हुए ऐलान कर दीजिये आपका गल पूरी तरह खराब है और साज सारा दिन आप ऐसे ही बात करेंगी ..अपनी सहेलियों को यकीन दिलाने के लिए टीचर से भी उसी अंदाज़ में फुस्फुसाइए ..सारा दिन फुसफुसी आवाज़ में दोस्तों की नाक में दम कर दे और हर सवाल का जवाब देने के लिए क्लास में हाँथ उठाए ...हाँ टीचर से थोड़ा कम पंगा ले छड़ी पड़ने  के चांस ज्यादा है
३) अज्ञात प्रेमी का प्रेमपत्र -अपने बायें हाँथ से अपनी ही बेस्ट फ्रैंड को लव लैटर लिखिए जिसमें बताइए आप उसके अज्ञात प्रेमी है और कई महीनो से उसका पीछा कर रहे है और प्रेमी की बहन उसी स्कूल में किसी कक्षा में है जो आपकी सहेली को follow  कर रही है ..अगर उसको प्रस्ताव मजूर है तो लंच के बाद टंकी के पास तीन बार अपनी नाक खुजाये ..यकीन मानिए वो डर के मारे अपनी नाक पर बैठी मक्खी भी नहीं  उड़ाएगी .
ऐसी ही कुछ और शरारतें की थी जो बताने लायक नहीं है,और हाँ अपने घर के बड़े सदस्यों पर try मत कीजिएगा जबरदस्त चांटा पड़ने के पूरे आसार है और अप्रैल फूल बनाने में कही आपका चेहरा गोभी के फूल की तरह सूज ना जाए ..जैसा मेरा हुआ था


नमकीन हलवे ने शाना बना दिया   देवांशु  निगम को 

 

ऐसी तो कोई घटना (या दुर्घटना) याद नहीं आती जब मैंने किसी का अप्रैल फूल बनाया हो | जनता काफी चतुर है | ३१ मार्च से ही तैयारी शुरू हो जाती है | पर एक बार बचपन में पड़ोस वाले भैया ने हमे बनाने की कोशिश की थी | चींटी देवियों ने बचाया हमें | भैया ने बोला आज पूजा थी ये प्रसाद ले लो| सब लोग घर से कहीं बहार जा रहे थे तो मैंने प्रसाद टेबल पे ही रख दिया की लौट के खाया जायेगा आराम से | प्रसाद मे मेरा पसंदीदा हलुवा भी था | घर में चीटियों का बड़ा आतंक था | रस्ते में जब मम्मी को बताया की प्रसाद बाहर रख दिया है तो काफी डांट पड़ी | लौट के आने पे देखा हलुवे में तो चीटी लगी ही नहीं | मैंने बोला मम्मी को "लो अपने फालतू में ही डांट दिया " | पर घर को मम्मी से बेहतर कौन जान सकता है| उन्होंने कहा कुछ गड़बड़ है | तभी भैया दिखे | वैसे तो पूंछ ताछ कार्यालय में मेरे पापा कार्यरत थे उस टाइम पर घर में ये काम मम्मी के ही जिम्मे है आजतक | गहन पूंछताछ के बाद भैया ने बताया की आज फर्स्ट अप्रैल है न इसलिए नमकीन हलुवा दिया था| तब से मै भी काफी शाना हो गया हूँ |

 .विवेक जैन का नायाब आइडिया प्रपोज़ल का

मेरी बहुत अच्छी फ्रेंड से मुझे प्यार था, और मैं उससे कह भी नहीं पा रहा था क्यूंकि मुझे लग रहा था कि अगर उसने मना किया तो मुझे बुरा भी लगेगा और कहीं वो फ्रेंडशिप ही ना तोड़ दे.....तो मैंने  और मेरे फ्रेंड्स ने प्लानिंग की कि मैं उसे १ अप्रैल के दिन प्रपोज़  करता हूँ, अगर वो मान गई तो बल्ले-बल्ले और नहीं मानी तो कह देंगे कि अप्रैल फूल बनाया है, तेरी ऐसी  किस्मत ही नहीं है कि विव (मैं) उसे प्यार करे ...........और १ अप्रैल के दिन हमने उसे प्रपोज़ कर दिया.......उसने मुझसे  गुस्से से नज़रें मिलाई और गुस्से में  शुरू हो गई कि मैं तो तुम्हें बहुत अच्छा दोस्त समझती थी, तुम ऐसा  सोचते हो, वगैरह वगैरह...........कम से कम दस मिनट सुनाने के बाद जब वो शांत हुई तो मैं करीब दो मिनट तो वैसे  ही खड़ा रहा फिर हिम्मत करके बोला मैं तो मज़ाक कर रहा था.....अप्रैल फूल बना रहा था.......उसने मुझे घूरा, और फिर बोली.....'एक बात कहूं, मैं भी मज़ाक कर रही थी, मैं तुम्हें सच में पसंद करती हूँ'....और कह के रोने लगी.........फिर तो मुझे और मेरे दोस्तों को करीब ३ दिन लगे उसे सच बताने में कि मैं भी सच में उसे पसंद करता हूँ......
और बस....अब हम इस बार कॉलेज के अन्दर अपना अंतिम  अप्रैल फूल मनाएंगे.

Friday, April 1, 2011

कुछ युवा ब्लॉगर्स की शैतानियों का कच्चा चिट्ठा

जब बाल-दिवस पर एक परिचर्चा आयोजित की  थी "दिल तो बच्चा है जी...." जिसमे हमउम्र  ब्लॉगर्स ने अपनी शरारतों के किस्से शेयर किए थे...उस वक्त कुछ युवा ब्लॉगर्स ने शिकायत की थी कि 'हमें अपने अनुभव बांटने का अवसर क्यूँ नहीं दिया?'....कहने को तो मैने कह दिया..."आप सबका तो दिल भी बच्चा है और खुद भी बच्चे हो...रोज नई शरारतें करने की छूट है..." पर उसी वक्त सोच लिया था , मूर्ख दिवस पर उनसे अनुरोध करुँगी अपनी शैतानियों का बखान करें...

तो उसी के तहत पेश है..आज अभिषेक, रवि धवन और प्रशांत प्रियदर्शी के कारनामे.



अभिषेक,...कहीं फिल्म  वाले ना कॉपी कर लें ये आइडिया 

वैसे तो मैंने ज्यादा शरारतें नहीं की, लेकिन बचपन में बेवकूफी वाली बातें खूब करता था.जैसे की एक दफे जब ये अफवाह उडी की पटना में बाढ़ आने वाली है तो मैं माँ से कहता था की "माँ अगर बाढ़ आया न तो हम गेट ही नहीं खोलेंगे,ग्रिल लगा देंगे और कुर्सी टेबल से दरवाजा ब्लाक कर देंगे. :P बचपन में तो वैसे कई बेवकूफियों के किस्से रहे, लेकिन शरारत के कम ही थे.इंजीनियरिंग में आने के बाद खूब मस्ती की.ऐसे ऐसे नौटंकी वाले दोस्तों से पाला पड़ा की क्या कहूँ.एक बार १ अप्रैल के दिन सबने प्लान बनाया की अपने एक दोस्त सौरभ को थोड़ा अलग अंदाज में उल्लू बनाया जाए.हमारे वो मित्र एक लड़की से प्रेम करते थे, और उस लड़की को भी ये अच्छे से पता था की हमारे मित्र उन्हें देख आंहे भरते हैं.तो हमने प्लान ये बनाया की कैसे भी कर के उस लड़की का टी-शर्ट चोरी किया जाए और उसे अपने मित्र को पहनाया जाए.लेकिन चोरी करना गर्ल्स हॉस्टल में, और वो भी कपड़े...बेहद खतरनाक काम था ये, इसलिए इस जोखिम भरे काम के लिए हमने तैयारी अच्छे से कर रखी थी.दो दिन पहले ही आसपास के जगहों का मुआयना किया गया.जिस गर्ल्स हॉस्टल में हमारे दोस्त की प्रेमिका रहती थी, वो हमलोगों के फ़्लैट के बाजू में था, गर्ल्स हॉस्टल की और हमारे फ़्लैट की बाउन्ड्री कॉमन थी.३१ मार्च की रात एक बजे हमारे दो मित्र आशीष और विपिन कपड़े चोरी करने के मकसद से हॉस्टल की तरफ बढे.हॉस्टल की दीवाल लांघ जैसे ही वो कम्पाउंड में आगे बढे तो उन्हें लगा की कोई उधर से आ रहा है, जल्दबाजी में वो हॉस्टल के पीछे वाले कोने की तरफ भागे.हॉस्टल के पीछे एक छोटा सा गड्ढा, एकदम छोटा तालाब जैसा कुछ था..जिसके बारे में उन दोनों को मालुम नहीं था.वो लोग जल्दबाजी में उसी में जा गिरे, मट्टी, कीचड़ और पानी से लथपथ हो गए, फिर भी उनका हौंसला नहीं टुटा वो आगे बढे...हम अपने छत से ये सब देख रहे थे...हॉस्टल के मेन गेट पे नज़र भी लगाये हुए थे और लगातार उनका हौसला बढ़ा रहे थे.वो दोनों जांबाज हॉस्टल के छत तक पहुँच गए.तय ये था की बस एक ही लड़की के कपड़े लाना है, लेकिन दोनों नालायकों ने सभी के कपड़े ले आयें.उनका तर्क ये था की एक लड़की के कपड़े गायब हुए तो सब हवा को दोष देंगे, लेकिन सबके कपड़े गायब होंगे तो ये तो पक्का हो जाएगा न की किसी ने कपड़ों पे हाथ साफ़ किया है..खैर, इस बात की खबर अभी तक हमारे उस मित्र को नहीं थी.अगले दिन(१ अप्रैल) उस टी-शर्ट(सौरभ बाबु की प्रेमिका की टी-शर्ट) को अच्छे से आयरन कर सौरभ बाबु  को ये कह के पहना दी, की ये टी-शर्ट अकरम ने नया ख़रीदा है.सौरभ बाबु जब संदेह भरी दृष्टि से टी-शर्ट की तरफ देखें  तो हमने कहानी ये बनाई की अकरम को ये टी-शर्ट पसंद आ गयी, और ऐसा ही टी-शर्ट आपकी प्रेमिका पहनती है, इसलिए अकरम आपको ये टी-शर्ट गिफ्ट कर रहा है.सौरभ बाबु अब तक कन्फ्यूज से थे, लेकिन उन्होंने टी-शर्ट पहन लिया.अब बारी थी मिसन को को आखिरी शक्ल देने की.सौरभ को हमने वो टी-शर्ट पहना छत पे ले गए, दूसरी तरफ गर्ल्स हॉस्टल की छत पे सभी लड़कियां पहले से मौजूद थी.लड़कियां सौरभ को शक की निगाह से देखने लगीं और खुसुरफुसुर करने लगीं. .सौरभ बाबु को भी थोड़ा अजीब लगा, वो मेरे से पूछे की भाई, क्या बात है ये सब हमको ऐसे देख के क्या बडबडा रही है? मैंने कहा - अरे महराज उसका टी-शर्ट पहिन के छत पे उसके सामने घूमेंगे आप तो ऐसे देखेगी ही न वो सब. ;) सौरभ बाबु का चेहरा उड़ गया था..वहीँ पे सबको गाली देने लगे - सबके सब कमीने हैं, मेरा धर्म भ्रष्ट करवा दिया सब मिलकर...लड़की का कपडा पहना दिया पागल सब....मेरे इज्जत का बैंड बजा दिया...और भी पता नहीं क्या क्या बुदबुदाते हुए वो नीचे उतर गए..छत पे सभी लड़के ठहाके लगा के हँसने लगे..जब मैं नीचे आया तो सौरभ बाबु कहते हैं - अभिषेक भाई, आपसे ऐसा उम्मीद हम नहीं किये थे..आप भी मिले हुए थे....मैंने भी प्यार से कहा - अरे सौरभ बाबु यही तो ज़माने का दस्तूर है, आज अप्रैल फुल है...पिछली बार आप सबको बनाये थे इस बार आप बन गए..टेक अ चिल पिल :P. (वैसे ये साफ़ कर दूँ, की बदमाशी हमने फिर से की, कुछ लड़कों ने लड़कियों के कपड़े पे एक छोटा सा हर्ट का शेप बना दिया, और फिर से एक अप्रैल की रात वो कपड़े सही सलामत गर्ल्स हॉस्टल की छत पे पहुँच गए, ताकि उन्हें ये यकीन हो जाए की कपड़े वाकई चोरी हुए थे, और चोरी हमने की थी)

 रवि धवन   नू   मामे दी मिठाई, अपरैल फूल दी याद आई!

नानके (नानी का घर) में जो ठाठ होते हैं, वैसा सुख तो शायद ही किसी को कहीं मिलता होगा। मेरे चार मामा जी हैं और चारों एक से एक खतरनाक। यानी की चारों इतना लाड देते हैं कि कई बार तो मन भर आता है। बचपन में तो हर सप्ताह साइकिल उठाकर घर से फुर्र हो जाता था, नानके जाने के लिए। वो पहली अप्रैल मुझे आज भी याद है। 31 मार्च को स्कूल का रिजल्ट आ गया था और अगले पंद्रह दिनों तक छुट्टियां थीं। तो, अगले ही दिन मैंने साइकिल उठाई और भाग निकला अपने नानके। मेरे चेहरे की बत्तीसी बता रही थी कि मैं अच्छे नंबरों से पास हुआ हूं। थोड़ी देर बैठा ही था कि संदेशा मिला कि बाहर मामाजी ने बुलाया है। बाहर जाते ही मुझे मिठाई का डिब्बा दिया और बधाई देते हुए खोलकर खाने के लिए कहा।
उस समय, मुझे पहली अप्रैल की कहां याद थी।
झट से धागा तोड़ा और  शान से डिब्बे का ऊपरी गत्ता हवा में उछाल दिया।
पर जब अंदर देखा तो मिठाई नहीं बजरी और पत्थर ही निकले।
इससे पहले कि मैं कुछ समझता, सभी ताली बजाते हुए चिल्लाने लगे
अपरैल (अप्रैल) फूल बनाया-हमको बड़ा मजा आया
अपरैल फूल बनाया....।

मेरे मामाजी मुझे ही मामाजी कहते हैं।
अब जब कभी मैं जाता हूं अपने नानके, ठहाका मारकर ये जरूर कहते हैं, 'मामाजी नूं मिठयाई ते ख्वाओ।'
हालांकि दिखाने के लिए गुस्सा तो बहुत आता है।
पर जब कभी वो यह डॉयलॉग नहीं मारते, तब लगता है कि कुछ न कुछ उनके प्यार में कमी रह गई है।
जिस मामाजी ने मुझे वो डिब्बा थमाया था, उन्हें भी मैं मिठाईवाले मामा ही कहता हूं।


प्रशांत प्रियदर्शी के हाथों के लड्डू....जो खाए वो भी पछताए और जो ना खाए...:)


बचपन से ही अप्रैल का पहला तारीख बिलकुल अजब समां बांधता था.. अगर उस दिन रविवार होता था तो रंगोली पर, अगर बुधवार अथवा शुक्रवार होता था तो चित्रहार पर वह गीत अवश्य आता था "अप्रैल फूल बनाया, तो उनको गुस्सा आया".. बचपन से लेकर अभी तक इस दिन का यही मतलब समझ में आया कि दिन भर सबसे बच कर रहो, किसी की बात का भरोसा मत करो(जैसे पूरी दुनिया उस दिन आपके ही पीछे पड़ी हो बेवकूफ बनाने के लिए), और जहाँ कहीं मौका देखो, बस सामने वाले को मामू बना डालो.. :)

तो यहाँ यह किस्सा लिखने तो बैठे नहीं हैं की किसने मुझे कब बेवकूफ बनाया था.. पब्लिक प्लेस में यह बताना स्वास्थ के लिए हानिकारक होता है, सो यहाँ यह चर्चा करते हैं की मैंने कभी किसी को जोरदार तरीके से बेवकूफ बनाया था या नहीं? वैसे मेरा तो अब यही मानना है की किसी को भी बेवकूफ बनाना सामने वाले की बेवकूफी का सबूत नहीं होता है, यह सबूत होता है उसके विश्वास के टूटने का, और हमारे विश्वासघात का.. भले ही यह छोटे पैमाने पर ही हो, हंसी-मजाक के लिए ही हो, मगर बात कहीं ना कहीं होती वही है.. अगर हम किसी पर किसी बात के लिए भरोसा ना करें तो क्या मजाल की कोई हमें बेवकूफ बना जाए? मगर भरोसे पर ही दुनिया कायम है, यह बात ऐसे ही नहीं कही गई है..


बहुत साल पहले की बात है.. शायद 1994-95 की.. मेरी उम्र उस समय 13-14 साल रही होगी.. तब हम चक्रधरपुर नामक शहर में रहते थे जो क़स्बे से थोडा ही बड़ा था.. उसे शहर नहीं तो बड़ा क़स्बा भी बुलाया जाए तो कुछ गलत नहीं होगा.. उस समय 40-50 हजार की आबादी रही होगी उस शहर की और वह साढ़े तीन किलोमीटर के दायरे में सिमट जाए बस इतना ही क्षेत्रफल रहा होगा उसका.. अब यह जगह झारखंड के हिस्से जा चुका है.. पड़ोस में एक भैया रहते थे.. वह यूँ तो थे पापा के ही नौकरी में, मगर तुरत ज्वाइन किये थे और पापा से उनके उम्र की दूरी हमारे और उनके उम्र की दूरी से कुछ अधिक ही थी, सो हम सभी बच्चे उन्हें भैया ही बुलाते थे.. उनकी नई-नई शादी भी हुई थी सो हमें भी एक भाभी मिल गई थी.. स्कूल से लौटने के बाद पता नहीं कहाँ से मन में यह विचार सूझा की भाभी को अप्रैल फूल बनाया जाए.. अब करें तो क्या करें? जो भी करना है वह एक ही बार में करना होगा, नहीं तो भाभी सावधान हो जायेंगी और फिर कोई भी प्लान काम नहीं करेगा.. खैर एक आयडिया मन में तो आया, मगर मुझे खुद ही उसकी सफलता पर शक था.. फिर भी कोई और विचार ना आने के कारण से मैंने वही आजमाया.. बगीचे से थोड़ी सी चिकनी मिटटी लिया मैंने, उसे पानी में अच्छे से मिलाया, ठीक वैसे ही जैसे आटा गूथते हैं.. चुपके से रसोई से थोडा सा सूजी ले आया हल्का भून कर.. फिर मिटटी को लड्डू जैसा गोल-गोल आकार देकर उस पर चारों और से सूजी का लेप लगा दिया.. अब वह लड्डू में असली लड्डू जैसा दिखने भी लगा था.. मैंने तस्तरी में अच्छे से सजा कर उनके घर गया और उन्हें देते हुए बोला कि मम्मी भिजवाई है.. वो कुछ बोलती उससे पहले ही मैं सीधे घर के अंदर.. जाकर सोफे पर बैठ गया.. थोड़ी देर इधर उधर कुछ करता रहा फिर बोला कि टेस्ट तो कीजिये, मम्मी अभी अभी बनायी है.. सूजी अभी भी हल्का गरम था सो वे भी झांसे में आ गई.. जैसे ही मिटटी मुंह में गया की बस्स... :) अब जबकि वह मूर्ख बन ही चुकी थी तो भैया को कैसे छोड़ देती? जब भैया दफ़्तर से वापस लौटे तो उन्हें भी वही पेश किया गया..


तो अपनी कहानी फिलहाल यही तक.. :)

 

(अगली पोस्ट में  कुछ और ब्लॉगर्स के शैतानी भरे किस्से )

हैप्पी बर्थडे 'काँच के शामियाने '

दो वर्ष पहले आज ही के दिन 'काँच के शामियाने ' की प्रतियाँ मेरे हाथों में आई थीं. अपनी पहली कृति के कवर का स्पर्श , उसके पन्नों क...