Tuesday, May 31, 2011

संस्मरण रुपी रेल का इंजन (भाग-२)

हॉस्टल से छुट्टियों में घर जाती तो टी.वी.पर भी फिल्म देखने का मौका मिलता पर मैं कभी आराम से बैठकर फिल्म नहीं देख पाती. वज़ह? सबके बैठने की  व्यवस्था करती,मुझे ही जगह नहीं मिलती. बीच की टेबल हटाकर दरी बिछाई जाती,जिसपर पास-पड़ोस के बच्चे बैठते, सोफे पर पापा के मित्र विराजमान रहते, दरवाजे के बाहर  कुछ कुर्सियां लगाईं जातीं जिसपर मम्मी और आस पड़ोस की लड़कियां बैठती, मैं कभी दरवाजे के बाईं तरफ से झांकती कभी दायीं तरफ से.तसल्ली से बैठकर देखना कभी मयस्सर नहीं हुआ. गर्मी की छुट्टियों में ननिहाल में हम सब भाई बहनों का कुनबा जुटता तो किराए पर  वी.सी.आर.मंगवाई जाती. पूरी रात जागकर हम तीन तीन फिल्मे देखा करते और सुबह बड़े लोगों से नज़रे बचाकर आपस में कहते,'किसी भी फिल्म का कुछ भी याद नहीं'  :)लेकिन फिर कुछ ही दिनों बाद फिर से वी.सी.आर.मंगवाने की जिद करते.
समस्तीपुर से पापा का ट्रान्सफर 'गिरिडीह' हो गया. यहाँ बिलकुल पड़ोस में ही एक सहेली मिल गयी 'रूबी'. भगवान शायद पहले से ही इन्तजाम करके रखते थे या अगर स्पिरिचुअल गुरु 'दीपक चोपडा'या आजकल के युवाजनों की गीता 'The secret' के रचयिता 'Rhonda Byrne' के शब्दों में कहें तो शायद ये 'Law of Attraction ' था.उम्र के हर पड़ाव पर मुझे सामान रूचि वाले मित्र हमेशा मिलते रहे. गिरिडीह के सिनेमा हॉल ज्यादा ख़ूबसूरत,ज्यादा बड़े और साफ़ सुथरे थे. वहाँ कई फिल्म प्रोड्यूसर्स के टेनिस कोर्ट, स्विमिंग पुल युक्त बंगले भी हैं. ' थियेटर भी उन्ही लोगों द्वारा निर्मित था. 'नदिया के पार ' की नायिका 'साधना सिंह ' की शादी भी गिरिडीह के ही एक प्रोड्यूसर से हुई है. ( वहाँ अबरख (mica) की खानें हैं ..)

यहाँ के तीनो हॉल में रूबी के साथ नून शो में कई फिल्मे देखीं. ज्यादातर पुरानी हिट  फिल्मे..'संगम, मेरा साया, बीस साल बाद, बंदिनी ,इश्क पर जोर नहीं ,  (धर्मेन्द्र और साधना की जोड़ी क्या ख़ूबसूरत लगी है,इस फिल्म में..आज के नायक-नायिकाएं ,पानी भरेंगे  उनके सामने )
अक्सर हॉल खाली ही हुआ करता और  डी.सी.में सिर्फ हम दो सहेलियां ही होती थीं. एक बार एक मजेदार वाकया हुआ. जूही चावला की कोई फिल्म थीं और वो हाथ में चाकू लिए विलेन से जूझ रही थीं. मैं सीन में एकदम इन्वॉल्व हो गयी थी कि अचानक फ़ूड स्टॉल   के एक छोटे से बच्चे ने आकर पूछा 'कोल्ड ड्रिंक' लेंगी और मैं इतनी जोर से डर गयी कि आजतक सोचती हूँ, मैं चिल्लायी कैसे नहीं?

बिहार में आपराधिक गतिविधियों और लड़कियों की असुरक्षा को लेकर हमेशा बातें की जाती हैं।पर मैंने बिहार के छोटे शहरों में सहेलियों के साथ बिना किसी एस्कॉर्ट के फिल्मे देखी हैं और कभी किसी अशोभनीय घटना का सामना नहीं करना पड़ा. छेड़छाड़ तो दूर ,कभी फब्तियां भी  नहीं कसी गईं. हाँ कभी कभी फिल्म 'हासिल' की तरह...हमारे रिक्शे के पीछे-पीछे साईकिल चला,लड़के चुपचाप हमें घर तक छोड़ जाते.:)   


शादी के बाद थियेटर में फिल्मे देखना तो बंद ही हो गया. यूँ भी उन दिनो  दिल्ली में थियेटर जाने का रिवाज़ नहीं
  था और वी.सी.आर. पर फिल्मे देखने की सुविधा भी थी. हमलोग मयूर विहार के 'नवभारत टाइम्स अपार्टमेन्ट ' में रहते थे. वहाँ सारे
फ्लैट्स...पत्रकार,लेखकों के  थे . दो फ़्लैट के बाद  ही 'विष्णु खरे' रहते थे. उनकी सुपुत्री "प्रीति खरे' ने टी.वी. सीरियल्स में काम करना शुरू कर दिया था. कई टी.वी. कलाकार उनके घर आते-जाते दिख जाते. प्रीति खरे' ने 'अनन्या  खरे' नाम से फिल्म देवदास में देवदास की भाभी की भूमिका निभाई है.
 जाहिर है, साहित्यिक  रूचि वाले लोग हों तो वीडियो लाइब्रेरी में कला फिल्मे भी मिलेंगी. जिन जिन फिल्मो को देखने  की इच्छा थी, सारी फिल्मो के कैसेट उपलब्ध थे. एक इतवार को मैं दीप्ती नवल और सुरेश ओबेराय अभिनीत , 'पंचवटी' देख रही थी,लाइब्रेरी से कोई कैसेट मांगने आ गया...मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ...."इस तरह की फिल्मे कौन देखता है??"..पतिदेव ने कहा , "यहाँ तुमसे भी बड़े बड़े दिग्गज हैं." बात तो सही थी.....पतिदेव ने मज़ाक में ही सही, लेकिन कला फ़िल्मों के महत्व को मेरी नज़रों में और बढ़ा दिया.
उन दिनों 'इजाज़त " और शेखर कपूर एवं डिम्पल कपाडिया अभिनीत "दृष्टि' कई कई  बार देखी गयी थी (दृष्टि तो फिर से एक बार देखने की इच्छा है..अगर DVD मिल गयी  तो यहाँ कहानी जरूर सुनाउंगी  :)}
पर जल्दी ही वहाँ से घर बदल कर हम एक बिलकुल व्यावसायिक इलाके में आ गए, वहाँ..'कला फिल्मो ' का नाम लेती तो वीडियो लाइब्रेरी वाला अबूझ सा देखता रह जाता. उसने कभी नाम ही नहीं सुने थे,उन फिल्मो के. कई फिल्मे देखने से रह गयीं...जिनका अफ़सोस आज तक है. उनमे एक राखी अभिनीत "परोमा ' भी है. (उन दिनों के हिसाब से बहुत ही बोल्ड विषय था, एक मध्यमवर्गीय गृहणी और एक नवयुवक के बीच पनपती कुछ कोमल भावनाएं...और  नवयुवक उसे खुद को सफल गृहणी से अलग एक नारी के रूप में देखने को विवश करता है)
 
(जारी...)

Friday, May 27, 2011

संस्मरण रुपी रेल का इंजन

संस्मरणों की रेल में डब्बे तो जुड़ते जा रहे हैं...पर इंजन अब तक दूसरे ब्लॉग पर ही मौजूद है. हाँ ! उस पोस्ट को इंजन कह सकते हैं, जिसने मेरे लेखन को ब्लॉग जगत की तरफ मोड़ा.
हिंदी ब्लॉग जगत के विषय में पता नहीं था पर चवन्नी चैप का लिंक मिला था...जिसे मैं  अक्सर पढ़ लिया करती थी. एक बार वहाँ हिंदी फिल्मो से सम्बंधित किसी के संस्मरण पढ़े और मेरा भी मन हो आया कि अपने अनुभवों को भी कलमबद्ध करूँ. मैने भी अपने  संस्मरण लिख कर अजय(ब्रहमात्मज) भैया को भेज दिए  (.हाँ, वे मेरे भैया भी हैं.) उन्हें पसंद आई और उन्होंने पोस्ट कर दी. उस पोस्ट पर काफी  कमेंट्स आए पर उस से ज्यादा लोगों ने भैया को फोन करके उस पोस्ट की चर्चा   की.(आज भी,वो पोपुलर पोस्ट के रूप में दिखती है)

रंगनाथ सिंह जी का एक लाइन का कमेन्ट याद है,
"मैं तो मैडम की सरस और प्रवाहमय हिन्दी पर ही मुग्ध हुआ। संस्मरण भी बेहतरीन है।
 

मैं उसे बार-बार देखती,मुझे तो भरोसा ही नहीं था ,इतने वर्षों बाद ठीक से हिंदी भी लिख पाउंगी.किन्ही आलोक महाशय ने भी लिखा था....good write up here , loved some brilliant Hindi  words used  by  you  since we dont find them around much  these  days..... log  to  matlab bhi  nahi samajh paate....... jaanane ki baat  to  door ki  kaudi  hai  इन टिप्पणियों ने मेरे आत्मविश्वास को बहुत बल दिया. उसके बाद अजय भैया के बार-बार कहने पर मैंने "मन का पाखी'  ब्लॉग बना लिया.

 वहाँ एकाध  संस्मरण लिखे जिसे पढ़कर चंडीदत्त शुक्ल जी ने और भी संस्मरण लिखने को प्रेरित किया. इसके साथ ही आप सब भी लगातार उत्साहवर्द्धन करते रहे  और मैं इन संस्मरण में डब्बे जोडती जा रही हूँ :)  
(इन सबका जिक्र मैं कई बार कर चुकी हूँ..शायद आप सब... सुन कर बोर हो गए होंगे ,पर मेरे पास , उनका आभार व्यक्त करने को शब्द कम हैं.... जिन्होंने नई राह दिखाई और उस पर चलकर ही आज आपलोगों के समक्ष अपना लिखा रख पा रही हूँ )
  

तो ये रहा मेरे संस्मरण  रुपी रेल का इंजन :)

                            फिल्मे आज भी मैं काफी देखती हूँ पर हमेशा लोगो को और शायद खुद को भी यही कैफियत देती हूँ --टाइम पास का अच्छा जरिया है.....आखिर रोज रोज कहाँ जाया जा सकता है...एक अच्छी आउटिंग हो जाती है .वगैरह... वगैरह.  पर हिंदी टाकिज में लोगो के संस्मरण पढ़ते पढ़ते मैंने भी अपनी यादों के गलियारे में झांक कर देखा तो पाया कि अरे! अपने मन में फ़िल्मी प्रेम के बीज तो मैं होश सँभालने से पहले ही बो चुकी थी और वक़्त के साथ उसकी शाखाएं ,प्रत्याशाखायें बस फैलती ही चली गयीं. यह सिर्फ टाइम पास नहीं फिल्मो के प्रति मेरी गहन आसक्ति ही है जो उम्र के हर दौर में, मेरे कदम थियेटर की तरफ मोड़ देती है .

यह फिल्म प्रेम शायद विरासत में मिला है क्यूंकि मेरे जन्म से पहले ही, मेरे घर में 'धर्मयुग' 'Illustrated Weekely ' और 'Blitz ' के साथ एक फ़िल्मी पत्रिका 'माधुरी ' भी आती थी। जिसे हमने देखा भर है पढ़ा नहीं क्यूंकि जब हम भाई बहन पढने लायक हुए तो 'नंदन' 'पराग' 'चंदा मामा' तो आने शुरू हो गए पर माधुरी बंद कर दी गयी. पापा ने पत्रिका तो बंद कर दी पर फिल्मे दिखाना नहीं बंद किया. पापा की पोस्टिंग पटना के पास एक छोटी सी जगह 'हरनौत' में थी. शायद वहां कोई पिक्चर हॉल नहीं था क्यूंकि पापा हमें फिल्मे दिखने 'बिहार शरीफ' ले जाते थे. वहां हमने 'कई फिल्मे देखीं...नाम खुद तो याद नहीं,पर पापा-
मम्मी की बातचीत से पता चला था ...अनमोल मोती' ' नन्हा फ़रिश्ता' 'जिगरी दोस्त' जैसी फिल्मे देखी  गयीं थीं. कुछ दृश्य जरूर याद हैं. औक्टोपस से लड़ते जितेन्द्र, एक प्यारी सी रोती नन्ही बच्ची और कई सारे खिलौनों से उसे बहलाने की कोशिश करते तीन डरावने लोग और पूरे कपड़ो में (शायद) नहाती एक लड़की . 'हरनौत' में हमारा घर पहली मंजिल पर था और गलीनुमा सड़क के पार ठीक हमारे घर के सामने एक अंकल रहते थे.पापा और वे अंकल अक्सर अपनी अपनी बालकनी में खड़े होकर बाते किया करते थे. उन अंकल के पास एक प्रोजेक्टर था. कभी कभी वे अपनी बालकनी में सफ़ेद चादर लगाते और प्रोजेक्टर से फिल्मे दिखाते थे.आस पड़ोस के लोग हमारी बालकनी में बैठकर उस फिल्म का आनंद लेते.पर कौन सी फिल्म होती थी क्या नाम थे ,मुझे कुछ याद नहीं ,बस परदे पर हिलती डुलती कुछ सफ़ेद काली मानव आकृतियाँ ही याद हैं .

फिर पापा का ट्रांसफ़र 'मोतीपुर' हो गया जो मुजफ्फरपुर के पास एक छोटा सा क़स्बा था।वहीँ पर मेरे 'फिल्म प्रेम' का बीज अनुकूल हवा,पानी,खाद,पाकर पल्लवित पुष्पित होने लगा. घर से दस कदम की दूरी पर एक छोटा सा थिएटर था. उस थिएटर में मम्मी,पापा तो नहीं जाते थे पर मुझे और मेरे दो छोटे भाइयों को कभी नौकर .कभी चपरासी तो कभी महल्ले के बाकी बच्चो के साथ फिल्म देखने की इजाजत थी .छोटा सा हॉल था जिसमे लेडीज़ क्लास अलग था और सारे बच्चे भी वहीँ बैठते थे. जैसा अमूमन उन दिनों छोटे शहरों में होता था, इस थिएटर में भी 'जेनरेटर' की व्यवस्था नहीं थी.यानी बिजली गयी तो फिल्म बंद. बिजली चले जाने पर हमारी पलटन शोर मचाती,दौड़कर घर आ जाया करती थी. पर हम घर के अन्दर नहीं आते ,बाहर ही उधम मचाया करते और जैसे ही बिजली आती,दौड़कर फिर हॉल की तरफ सरपट भागते. एक बार काफी देर तक बिजली नहीं आयी तो मम्मी ने घर के अन्दर आकर खाना खाने का आदेश दिया. अभी हमने खाना शुरू किया ही था कि बिजली आ गयी और हम थाली छोड़कर भागे. छोटे भाई ने तो जूठे हाथ तक नहीं धोये थे ,मम्मी ने जबरदस्ती पकड़कर धुलवाये . उसका एक हाथ से सरकती पैंट संभाले पीछे-पीछे रोते हुए आना,अब तक आँखों के सामने है

मेरे लाल,बैजू बावरा,धर्मपुत्र जैसी कई ब्लैक एन व्हाइट फिल्म देखी वहां . एक बार उस थिएटर में 'राजेश खन्ना' और वहीदा रहमान' अभिनीत 'खामोशी' फिल्म लगी. मम्मी को ये फिल्म देखनी थी सो उन्होंने पड़ोस में रहने वाली वीणा दी के साथ नाईट शो जाने का प्लान बनाया. मैंने और मेरे सबसे छोटे भाई, 'पुष्कर'  ने भी बहुत जिद की. मम्मी ने 'पुष्कर'  को तो मना कर दिया पर मुझे ले जाने को मान गयीं. भाई जोर जोर से रोने लगा तो फूलदेव उसे छत पर बहलाने ले गया. मैं जैसे ही उनलोगों के साथ जाने को निकली कि पापा ने कहा "ये क्यूँ जा रही हैं?  इन्हें क्या समझ आएगा?" और मैं नहीं गयी. वो गर्मियों के दिन थे और हम छत पे सोया करते थे.आज भी याद है,कैसे हम दोनों भाई बहन एक दूसरे के गले में बाहें डाले,सुबकते सुबकते सो गए थे.

पहली पूरी फिल्म जो मुझे याद है वो थी 'उपहार' जो हमने अपने पुरे परिवार के साथ मुजफ्फरपुर के 'शेखर टाकीज 'में देखी थी।फिल्म बहुत ही अच्छी लगी थी और आज भी हमारी पसंदीदा फिल्मो में से एक है. अभी भी मुझे याद है जया भादुड़ी को स्लेट पर 'क ख ''लिखते देख मेरे छोटे भाई ने कैसे चिल्ला कर कहा था 'अरे!! इतनी बड़ी हो गयी है और इसे लिखना भी नहीं आता?' सब लोग मुड कर देखने लगे थे और मैं शर्म से पानी पानी हो गयी थी. मुजफ्फरपुर ले जाकर हमें चुनिन्दा बच्चों वाली फिल्मे ही दिखाई जाती.वहां के 'शेखर' 'दीपक' 'अमर' 'प्रभात' टाकिज में कई फिल्मे देखीं जैसे परिचय,बावर्ची, कोशिश  अनुराग,सीता गीता...आदि

इन फिल्मो के  देखने के बाद तो मैं जया भादुड़ी  की जबरदस्त फैन हो गयी. किसी भी पत्रिका में उनकी छपी फोटो या आर्टिकल देखती तो तुंरत काटकर जमा कर लेती. हाल में ही मैंने 'सुकेतु मेहता' की लिखी किताब 'Maximum City 'पढ़ी ..उसमे उन्होंने अमिताभ बच्चन के ड्राईंग रूम में लगी एक पेंटिंग का जिक्र किया है जिसमे कुछ बच्चे बायस्कोप देख रहे हैं. (शायद सुकेतु मेहता को भी ये नहीं पता (वरना अपनी किताब में इसका जिक्र वो जरूर करते) कि दरअसल वो पेंटिंग नहीं है बल्कि सत्यजित राय की फिल्म महानगर के एक दृश्य की तस्वीर है जिसमे उन बच्चों में फ्रॉक पहने जया भादुरी भी हैं. ये फोटो भी मैंने किसी पत्रिका से काटकर अपने संकलन में शामिल कर ली थी और काफी दिनों तक मेरे पास थी. जया, भादुड़ी  से बच्चन बन गईं, फिल्मो में काम करना छोड़ दिया पर मेरी loyalty वैसी ही बनी रही. जब एक फिल्म फेयर अवार्ड में उन्होंने मंच पर से कड़क आवाज में सारे नए  अभिनेता,अभिनेत्रियों को उनकी अनभिज्ञता पर जोरदार शब्दों में डांट पिलाई (क्यूंकि किसी अभिनेत्री ने सुरैया के निधन की खबर सुनकर बड़ी अदा से यह पूछा था "वाज सुरैया मेल औ फिमेल?")तो उनके प्रति आदर और बढ़ गया .ऐसे ही एक बार सिमी गरेवाल के टॉक शो में जया कुछ बता रही थीं और अमिताभ ने बार बार 'अ..अ' कहते हुए उन्हें टोकने की कोशिश तो की पर पूरी तरह टोकने की हिम्मत नहीं जुटा पाए तो बड़ा सुखद आश्चर्य हुआ,इतना बड़ा सुपरस्टार जिसे हिंदुस्तान में तो क्या विश्व में भी कोई नजरअंदाज नहीं कर सकता पर हमारी आइडल ने कोई भाव ही नहीं दिया .खैर ये लिबर्टी जया ने शायद उनकी पत्नी होने के नाते ली थी.लेकिन उनका प्रखर व्यक्तित्व समय के साथ कभी धूमिल नहीं हुआ.

देख ली न आपलोगों ने बानगी, जया की बात निकली तो फिर दूर तलक गयी।लौटते हैं अपने हिंदी टाकिज की ओर.फिर मैं हॉस्टल में रहने चली गयी. फिल्म देखना करीब,करीब बंद. पर हॉस्टल में मेरे फ़िल्मी ज्ञान का सिक्का जम गया क्यूंकि मैं जब छुट्टियों में घर जाती तो 'धर्मयुग' में नयी नयी फिल्मों की समीक्षाएं पढ़कर अपनी उर्वर कल्पनाशक्ति से ऐसा खाका खींचती कि सब समझते ,मैं वह फिल्म देखकर आयी हूँ जबकि मैंने कोई ब्लैक एन व्हाइट या कोई सुपर फ्लॉप रंगीन फिल्म देखी होती,एक हमारी सिनियर थीं ,चंद्रा दी, वो भी फिल्मो की शौकीन थीं और सचमुच में फिल्मे देखा करती थीं.एक बार उन्होंने किसी फिल्म के एक दृश्य की चर्चा की और मैं इधर उधर देखते हुए बात बदलने की कोशिश करने लगी.वो समझ गईं ,मैंने वो फिल्म नहीं देखी है ,पर शुक्रगुजार हूँ उनकी,उन्होंने मेरी पोल नहीं खोली.:)

कुछ सालों बाद,पापा का ट्रान्सफर समस्तीपुर हो गया।यहाँ पापा अपने काम में काफी व्यस्त हो गए और फिल्मों में उनकी दिलचस्पी ख़त्म सी हो गयी. हालाँकि समस्तीपुर में तीन अच्छे सिनेमा हॉल थे. सपरिवार फिल्म देखना तो बंद हो गया पर मम्मी कभी कभी फिल्म दिखाने ले जातीं. एक बार अचानक हमलोगों ने 'नूरी' फिल्म देखने का प्लान किया. झटपट रिक्शा लेकर भोला टाकिज पहुंचे और टिकट लेकर अन्दर चले गए. परदे पर 'पूनम ढिल्लों' के ताजे खिले मासूम चेहरे की जगह जब रेखा की तीखे नैन नक्श वाली सांवली सलोनी सूरत नज़र आयी तो तसल्ली हुई,चलो हमने फिल्म मिस नहीं की,ये तो ट्रेलर चल रहा है.पर जब काफी देर तक ट्रेलर ख़त्म नहीं हुआ तो हमें शक हुआ कि 'नूरी' फिल्म बदल चुकी है.हमने जल्दबाजी में सामने लगे पोस्टर पर नज़र ही नहीं डाली और अन्दर चले आये. अब बगलवाले से पूछें कैसे? कितना बेवकूफ समझेंगे हमें.तभी अमिताभ बच्चन ने 'खून पसीने की जो मिलेगी तो खायेंगे.....' गाना शुरू किया और हम समझ गए ये फिल्म है 'खून पसीना' समस्तीपुर में एक सहेली बनी 'सीमा प्रधान'  जो ठीक भोला टाकिज के सामने रहती थी. {पिछले कुछ
साल से हम बिछड़ गए हैं....हर समस्तीपुर वाले से दोस्ती का हाथ बढ़ाती हूँ कि शायद उसका पता मिल जाए...पर अब तक निराशा ही हाथ लगी है..:(}

उसके साथ मैंने बहुत सारी फिल्मे देखीं. भोला टाकिज में रविवार को मार्निंग शो सिर्फ लड़कियों के लिए रिजर्व रहता था. उस शो में फिल्मे देखने का अपना ही मजा था. शोर मचाना, कमेंट्स करना, जोर जोर से गाने गाना, कई लड़कियां तो सिटी भी बजाती थीं,यानी 'पूरा अपना राज़' एक बार पड़ोस में रहने वाली सुधा और बिंदिया को मार्निंग शो में एक फिल्म देखनी थी,वो लोग मुझसे भी जिद करने लगीं,चलने को. पर मैं सीमा को इत्तला नहीं कर पायी थी. मुझे याद है,सुबह सुबह मैं उसके घर जा धमकी. सीमा सो रही थी,उसे बिस्तर से उठाया,किसी तरह ५ मिनट में तैयार होकर,वह हमारे साथ फिल्म देखने आ गयी. ऐसा था उन दिनों फिल्मो का बुखार. पर हमलोग गिनी चुनी अच्छी फिल्मे ही देखते थे और परीक्षा के आस पास फिल्मों का नाम भी नहीं लेते थे,शायद इसीलिए हमारे अभिभावकों ने कभी मना भी नहीं किया.हाँ!अगर कभी पापा, घर में फिल्मो की चर्चा करते सुन लेते तो जरूर कहते "तीन घंटे हॉल में और बाकी तीन  घंटे घर में,ये गलत बात है" और हम सब चुप हो जाते.

मैं स्कूल हॉस्टल से  कॉलेज हॉस्टल में आ गयी.पर वह हॉस्टल था या जेल? आज भी नहीं सोच पाती, कैसे हम महीनो उस चारदीवारी में कैद रहते थे? जहाँ कालेज गेट तक जाने की  इजाज़त नहीं थी,उन दिनों वार्डेन से छुट्टी लेकर बाहर जाने की भी अनुमति नहीं थी.पर हम उसी दुनिया में खुश रहते थे.कभी कभी मेरी लोकल गार्जियन बुआ अपने घर ले जाती और अपनी बेटी के साथ ले जाकर सिनेमा भी दिखा लातीं.

एक बार मुझे कालेज से भी फिल्म देखने जाने का मौका मिला था।जब मैं फाईनल इयर में थी.कालेज फेस्टिवल को सफल बनाने में हमने बहुत मेहनत की थी. रात दिन एक करके पोस्टर बनाए थे. स्टाल लगवाए थे. एक लेक्चरार राधिका दी कि देखरेख में सारा इन्तजाम हम छह लड़कियों ने किया था.प्रिंसिपल बहुत खुश हुईं और हमें इनामस्वरूप राधिका दी के संरक्षण में एक फिल्म देखने कि अनुमति दी.राधिका दी को शायद ज्यादा रूचि नहीं थी. उन्होंने प्रिंसिपल से तो कुछ नहीं कहा पर हमलोगों से बोलीं 'तुमलोग चली जाना ,मुझे कुछ काम है ' बाकी सारी लड़कियां ख़ुशी से उछल पड़ीं और कल नून शो में कौन सी फिल्म देखी जाए,इसका प्लान करने लगीं. पर मैं डर गयी क्यूंकि बाकी सब लड़कियां dayscholar थीं अकेली मैं ही हॉस्टल से थी. डर लगा अगर किसी जान पहचान वाले ने देख लिया तो सोचेंगे, मैं हॉस्टल से भागकर फिल्मे देखती हूँ.सहेलियों ने समझाया भी 'अगर पूछे तो सच बता देना, प्रिसिपल ने खुद परमिशन दी है'पर मुझे पता था,सामने से कोई नहीं पूछेगा,सब एक दुसरे को बताएँगे और सारे रिश्तेदारों में बात फ़ैल जायेगी और अगर मम्मी ,पापा तक बात पहुँच गयी तो समझो, शामत.

सहेलियों ने इसका भी हल ढूंढ निकाला।किसी लड़की से चार घंटे के लिए बुरका उधार लेने की बात भी कर डाली.शायद फिल्म देखने से भी ज्यादा थ्रिल, बुरका पहनने का था ,मैं भी सहर्ष तैयार हो गयी.सब बहुत उत्साहित थे और तय किया, एक बार हॉस्टल चलकर बुर्के का ट्रायल कर लिया जाए ताकि सड़क पर चलने में कोई परेशानी न हो.सब सहेलिया भी एक एक बार पहन कर देखना चाहती थीं.हमारे कालेज के कॉमन रूम में एक रैक पर लड़कियां अपना बुरका रखती थीं.हमने उस लड़की से इजाज़त लेकर बुरका लिया और हॉस्टल कि तरफ प्रस्थान किया.पर जैसे ही मैंने बुरका पहनने का उपक्रम किया,पसीने और परफ्यूम की मिलीजुली गंध का ऐसा झोंका आया कि मेरी सांस रूकती सी लगी.फिर तो किसी ने भी बुरका पहन कर देखने का साहस नहीं किया. हम एक दूसरे पर उसे गोल करके फेंकते रहे और पेट पकड़ कर हँसते रहे मैंने जीवन में बुरका पहनने और कॉलेज से जाकर सिनेमा देखने का एकमात्र सुनहरा मौका खो दिया.
(जारी...)

Monday, May 23, 2011

रश्मि से रविजा तक

संस्मरण की श्रृंखला लिखने की कोई योजना नहीं थी...पर टिप्पणियों में कई  लोगो ने लिखा, संस्मरण- श्रृंखला अच्छी चल रही है...आपके संस्मरण के रेल में सवार हैं....तो हमने सोचा अब रेल में कुछ डब्बे और जोड़ ही दें. यूँ भी जब यादों की पोटली खुलती है तो कोने-कतरे में दबी यादें झाँक- झाँक  कर अपने अस्तित्व का अहसास कराने लगती हैं. ऐसा ही एक भूला  हुआ वाकया याद आ गया जो यदा-कदा दिल दुखा जाता है.
 

पत्रिकाओं में  प्रकाशित आलेखों को पढ़कर जो पत्र आते थे, उनमे से अधिकांशतः लड़कों के ही पत्र होते थे. कभी -कभार भूले-भटके एकाध ख़त लड़कियों के होते. ऐसा ही एक पत्र , औरंगाबाद से आया था. एक लड़की का था और उसने पत्र-मित्रता की इच्छा ज़ाहिर की थी. यूँ तो सहेलियों की कमी नहीं थी...पर पत्र मित्रता मैने नहीं आजमाई थी, अब तक.

एक अलग सा रोमांच हो आया...हमलोगों ने  एक दूसरे को देखा नहीं...जानते नहीं...सिर्फ पत्रों के सहारे जानेंगे .और मैने उसके पत्र का उत्तर दे दिया. नियमित पत्र व्यवहार होने लगा. एक दूसरे को अपनी -अपनी तस्वीर भी भेजी गयी. घर में  भी सबको मालूम था. निशा,( नाम  बदला  हुआ है ) बी.एड . कर चुकी थी और एक स्कूल में टीचर थी. हम किताबों..फिल्मों..अपने परिवार और दोस्तों के बारे में एक-दूसरे को लिखते.  वो  अक्सर जिक्र करती...उसे बिहार आने की बहुत इच्छा है. मैं भी रस्मी तौर पर उसे आमंत्रित कर देती. मुझे भी वो औरंगाबाद आने के लिए कहती, पर मुझे लगता ,ये सब रस्म अदायगी है...ना मैं अकेले औरंगाबाद जा सकती हूँ,ना वो कभी बिहार आएगी.


पर एक दिन मैं उसका पत्र पाकर चौंक गयी. उसने गर्मी की छुट्टियों में मेरे घर पर आने की इच्छा जताई थी. पत्र व्यवहार तक तो ठीक था पर पता नहीं...एक अकेली लड़की का इतनी दूर से अकेले आना , मम्मी-पापा को अच्छा लगेगा या नहीं...ये भी डर था.


फिर अगले पत्र में उसने अपने आने का करण बताया...जिसने  मुझे घोर असमंजस  में डाल दिया. निशा बी.एड. कर रही थी...उसका एक सहपाठी बिहार का था. जिस से दोस्ती  हुई और फिर दोस्ती प्यार में बदली. खूब कसमे वादे किए गए .  ट्रेनिंग पूरी होने के बाद, सात जन्मो तक  साथ निभाने की कसमे खा कर और वापस लौटने का वादा कर  वो लड़का...बिहार, वापस आ गया.


उसके बाद, उस लड़के ने , निशा के एकाध पत्र का जबाब दिया, फिर चुप्पी साध ली. अब निशा बिहार आकर उसे ढूंढ निकालना चाहती थी. मेरी उस समय इतनी परिपक्व सोच नहीं थी...फिर भी इतना तो मुझे भी लग रहा था...कि जब लड़का बेरुखी दिखा रहा है...तो इसे क्या  पड़ी है, उसकी खोज-खबर लेने की. आज का दिन होता तो मैं उसे समझा कर उसे उस लड़के को हमेशा के लिए भूल जाने पर बाध्य कर देती { मानो , कितनी बार समझाया हो किसी को....और प्यार में पड़े लोग...समझ जायेंगे जैसे :)}


उसके आने की योजना सुन मैं बहुत परेशान हो गयी. ममी-पापा के सामने 'प्यार' जैसे शब्द की चर्चा भी नहीं करते थे हमलोग...और यहाँ उस लड़की के बॉयफ्रेंड को ढूंढ निकालने की बात थी. इसका तो मैं जिक्र भी नहीं कर सकती थी,अपने पैरेंट्स से. और मैने भी  चुप्पी साध ली. बुरा तो बहुत लगा...एकाध पत्र आए उसके पर मैने जबाब नहीं दिया..मेरे पास और कोई चारा ही  नहीं था.


आज तक वो अपराध बोध मन को सालता है...क्या छवि होगी, उसके मन में बिहार वासियों की..एक ने प्यार में धोखा दिया...दूसरे ने दोस्ती में....


अब थोड़ा अपने नाम का कन्फ्यूज़न दूर कर दूँ. मेरे उपनाम 'रविजा' से कोई मुझे मुस्लिम समझते हैं...तो कोई पंजाबी....कोई सिन्धी तो कोई गुजराती .   ज्यादातर लोग सोचते हैं ,'रविजा' मेरा सरनेम है. जब शोभना चौरे जी ने टिप्पणी में मेरे पतिदेव को 'मिस्टर रविजा' कहकर संबोधित किया तो बहुत ही मजा आया.सिर्फ महिलाएँ ही मिसेज..फलां...फलां क्यूँ कहलाती रहें :)


ये 'रविजा' उपनाम मैने स्कूल के दिनों में ही रखा था. लिखना शुरू करने से भी पहले. शायद पत्रिकाओं में लेखकों/ कवियों के नाम देख शौक चढ़ा हो. पर रविजा के पहले रखा था, '
रश्मि विधु'. मालती जोशी की कहानी में एक लड़की का नाम 'विधु' था जो बहुत पसंद आया था. और सिर्फ मुझे ही नहीं...वंदना अवस्थी दुबे ने भी वो कहानी पढ़ी थी और इतनी प्रभावित हुई थी कि ज़ेहन  में वो नाम छुपा कर रखा और अपनी बिटिया का नाम 'विधु' रखा है.

पर कुछ दिनों बाद मुझे कहीं
'रविजा' शब्द दिखाई दिया और ये मुझे ज्यादा उपयुक्त लगा. रवि + जा = रविजा. यानि सूर्य से निकली हुई . रश्मि का अर्थ तो किरण है ही. यानि सूर्य से निकली हुई किरण.
तो मेरा नाम  'चन्द्र किरण' से 'सूर्य किरण' में बदल गया. जो शायद ज्यादा उपयुक्त है.:)


अब शायद रश्मि को रविजा के साथ ने अपना पक्ष रखने की हिम्मत दे दी है.  अगर आज इस तरह का कोई वाकया सामने आता और किसी निशा ने मदद या सलाह मांगी होती तो मैं चुप्पी नहीं साध लेती. उसे चीज़ों को सही रूप में दिखाने का प्रयत्न जरूर करती. और अगर तब भी वो नहीं समझती तो जरूर किनारा कर लेती

Thursday, May 19, 2011

जब आसमान कुछ ज्यादा करीब लगता था !!

पिछली पोस्ट में की गयी पत्रिकाओं में छपे आलेखों और पत्रों के जिक्र ने जैसे मुझे यादों की वादियों में धकेल दिया और अभी तक मैं उनमे ही भटक रही हूँ. कई लोगों ने उन  आलेखों और पत्रों के बारे में भी पूछा, वाणी गीत  ने जानना भी चाहा कि "उत्सुकता भी है कि तुमने बाद में इतने सालों लिखना क्यों छोड़ दिया "
सोचा आपलोगों को भी उन वादियों की थोड़ी सैर करा दूँ.


दसवीं उत्तीर्ण कर कॉलेज में कदम रखा ही था. स्कूल हॉस्टल के जेलनुमा माहौल के बाद, कॉलेज में आसमान कुछ ज्यादा करीब लगता. धूप नहलाती हुई सी....हवा सहलाती हुई सी और फिजां गुनगुनाती हुई सी प्रतीत होती.  मौलिश्री के पेड़ के नीचे बैठ गप्पें मारना, किताबें पढना, कमेंट्री सुनना हम सहेलियों का प्रिय शगल था. उसी दौरान एक पत्रिका 'क्रिकेट सम्राट' के सम्पादकीय पर नज़र पड़ी. पूरे सम्पादकीय में अलग अलग तरह से सिर्फ यही लिखा था कि 'लड़कियों को खेल के बारे में कुछ नहीं मालूम, उन्हें सिर्फ खिलाड़ियों से मतलब होता है'. मुझे बहुत गुस्सा आया क्यूंकि मेरी  खेल में बहुत रूचि थी. क्रिकेट,हॉकी,टेनिस कभी खेलने का मौका तो नहीं मिलता पर इन खेलों से सम्बंधित ख़बरों पर मेरी पूरी नज़र रहती. मुझे सब चलती फिरती 'रेकॉर्ड बुक' ही कहा करते थे.


यूँ तो दोनों छोटे भाइयों को क्रिकेट खेलते देख,मन तो मेरा भी होता खेलने को. पर मैं बड़ी थी. छोटी बहन होती तो शायद जिद भी कर लेती,"भैया मुझे भी खिलाओ" पर मैं बड़ी बहन की गरिमा ओढ़े चुप रहती. एक बार, मेरे भाई की शाम में कोई मैच थी और उसे बॉलिंग की प्रैक्टिस करनी थी. उसने मुझसे बैटिंग करने का अनुरोध किया. मैंने अहसान जताते हुए,बल्ला थामा. भाई ने बॉल फेंकी,मैंने बल्ला घुमाया और बॉल बगल वाले घर को पार करती हुई जाने कहाँ गुम हो गयी. भाई बहुत नाराज़ हुआ,मुझे भी बुरा लगा,ये लोग कंट्रीब्यूट करके बॉल खरीदते थे. ममी पैसे देने को तैयार थीं पर भाई ने जिद की कि बॉल मैंने गुम की है,मुझे अपनी गुल्लक से पैसे निकाल कर देने पड़ेंगे. शायद बॉल गुम हो जाने से ज्यादा खुन्नस उसे अपनी बॉल पर सिक्सर लग जाने का था. वो मेरी ज़िन्दगी का पहला और आखिरी क्रिकेट शॉट था

अखबार भी मैं हमेशा पीछे से पढना शुरू करती थी. क्यूंकि अंतिम पेज पर ही खेल की ख़बरें छपती थीं. इस चक्कर में एक बार अपने चाचा जी से डांट भी पड़ गयी. उन्होंने किसी खबर के बारे में पूछा और मेरे ये कहने पर कि अभी नहीं पढ़ा है. डांटने लगे,"लास्ट पेज पढ़ रही हो और अभी तक पढ़ा ही नहीं है?"
इस पर जब मैंने 'क्रिकेट सम्राट' में लड़कियों पर ये आरोप देखा तो मेरा खून जलना स्वाभाविक ही था. मैंने एक कड़ा विरोध पत्र लिखा और उसमे संपादक की भी खूब खिल्ली उडाई क्यूंकि हमेशा अंतिम पेज पर किसी खिलाडी के साथ, उनकी खुद की तस्वीर छपी होती  थी.सहेलियों ने जब कहा ,'ये पत्र तो नहीं छापेगा ' तो मैंने दो और पत्र, एक नम्र स्वर में और एक मजाकिया लहजे में लिखा और 'रेशु' और अपने निक नेम 'रीना' के नाम से भेज दिया. एड्रेस भी एक रांची, मुजफ्फरपुर और समस्तीपुर का दे दिया. सारी 'डे स्कॉलर' सहेलियों को नए अंक चेक करते रहने के लिए कह रखा था. हमारी केमिस्ट्री की क्लास चल रही थी और शर्मीला कुछ देर से आई. उसने 'में आई कम इन' जरा जोर से कहा तो हम सब दरवाजे की तरफ देखने लगे. शर्मीला ने मुझे 'क्रिकेट सम्राट' का नया अंक दिखाया और इशारे से बताया 'छप गयी है'. अब मैं कैसे देखूं?..मैं सबसे आगे बैठी थी और शर्मीला सबसे पीछे और 45 मिनट का पीरियड बीच में . नीचे नीचे ही पास होती पत्रिका मुझ तक पहुंची. देखा,एक अलग पेज पर मेरे तीनो पत्र छपे हैं,और एक कोने में संपादक की क्षमा याचना भी छपी है .फिर तो डेस्क के नीचे नीचे ही पूरा क्लास वो पेज पढता रहा और मैडम chemical equations सिखाती रहीं
दो महीने बाद छुट्टियों में घर जा रही थी. ट्रेन में सामने बैठे एक लड़के को 'क्रिकेट सम्राट' पढ़ते हुए देखा. जैसे ही उसने पढ़ कर रखी,मैंने अपने हाथ की मैगज़ीन उसे थमा,उसकी पत्रिका ले ली. {आज भी मुझे किताबें या पत्रिका मांगने में कोई संकोच नहीं होता.फ्रेंड्स के घर में कोई किताब देख निस्संकोच कह देती हूँ,पढ़ कर मुझे देना,इतना ही नहीं,रौब भी जमाती हूँ,इतना स्लो क्यूँ पढ़ती हो, जल्दी खत्म करो :)}.मिडल पेज पर देखा संपादक ने बाकायदा एक परिचर्चा आयोजित कर रखी थी."क्या लड़कियों का क्रिकेट से कोई वास्ता है??" पक्ष और विपक्ष के कई लोगों ने मेरे लिखे पत्र का उल्लेख किया था. अब मैं किसे बताऊँ? पापा,बगल में बैठे एक अंकल से बात करने में मशगूल थे, बीच में टोकना अच्छा नहीं लगा. यूँ भी छपने पर पापा ने ज्यादा ख़ुशी नहीं दिखाई थी. गंभीर स्वर में बस इतना कहा था 'ये सब ठीक है,पर अपनी पढाई पर ध्यान दो" उन्हें डर था कहीं मैं साइंस छोड़कर हिंदी ना पढने लगूँ. मैंने चुपचाप उसे पत्रिका वापस कर दी,ये भी नहीं बताया कि इसमें जिस 'रश्मि रविजा' ('रविजा'  तखल्लुस तब से है ) की चर्चा है,वो मैं ही हूँ. जान पहचान वाले लड़कों से ही हमलोग ज्यादा बांते नहीं करते थे,अनजान लड़के से तो नामुमकिन था.(ये बात, मुंबई की मेरी सहेलियाँ  बिलकुल नहीं समझ पातीं.)


वह पत्रिका फिर मुझे नहीं मिली पर इससे मेरे आत्मविश्वास को बड़ा बल मिला. मेरा लिखा सिर्फ  छपता ही नहीं, लोग पढ़ते भी हैं और याद भी रखते हैं. फिर तो मैं काफी लिखने लगी.खासकर 'धर्मयुग','साप्ताहिक हिन्दुस्तान' के युवा जगत में मेरी रचनाएं अक्सर छपती थीं.जब पहली बार 100 रुपये का चेक आया तो मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ. छप जाना ही इतनी बड़ी बात लगती.....इसके पैसे भी मिलेंगे, ये तो सोचा ही नहीं था. पर मुझे ख़ास ख़ुशी नहीं होती. चेक तो बैंक में जमा हो जाते.कैश होता तो कोई बात भी थी.


लोगों के पत्र आने भी शुरू हो गए. एक बार जयपुर से एक पोस्टकार्ड मिला. लिखा था,"मैं 45 वर्षीय पुरुष हूँ,मेरे दो पुत्र और तीन पुत्रियाँ हैं,आपका साप्ताहिक हिदुस्तान में छपा लेख पढ़ा,अच्छा लगा,वगैरह वगैरह. हमलोग,नियमित रूप से सिर्फ 'धर्मयुग', 'सारिका' और 'इंडिया टुडे ' लेते थे. अबतक तो वह अंक बुकस्टॉल  पर भी नहीं मिलता. मैंने एक बार, पड़ोस के एक लड़के को..धूप सेंकते हुए...'साप्ताहिक हिन्दुस्तान'  पढ़ते देखा था. (कॉलेज में मेरी सहेलियां कहा करती थीं,'रश्मि को किताबों की खुशबू आती है...किसी ने कितनी भी छुपा कर कोई किताब रखी हो,मेरी नज़र पड़ ही जाती.) वे लोग नए आये थे,हमारी जान पहचान भी नहीं थी. मैंने नौकर को कई बार रिहर्सल कराया कि कैसे क्या कहना है और उनके यहाँ भेजा. आज तक नहीं पता उसने क्या कहा,पर उस लड़के ने 'साप्ताहिक हिन्दुस्तान' के 3 , 4 अंक भेज दिए. कई दिन तक सब मुझे चिढाते रहें,'और तुम्हारा वो 45 वर्षीय मित्र कैसा है?"


पूरे भारत से ही पत्र आते थे पर अल्मोड़ा, इंदौर और नागपुर के पत्र कुछ ख़ास लगते क्यूंकि मेरी प्रिय लेखिका,शिवानी,मालती जोशी और सूर्यबाला के शहर से होते.(अब क्या बताऊँ...शरद कोकास जी की कविता पर लिखी पुस्तक के विमोचन समारोह में लेखिका 'सूर्यबाला' जी भी आनेवाली थीं...किन्ही कारणवश नहीं आ पायीं...उनसे मिलकर ,मेरा तो जीवन सफल हो जाता.)


 जबाब तो खैर मैने कभी किसी भी पत्र का नहीं दिया. सुदूर नाइजीरिया से जब किसी ने लिखा था,'पापी पेट के वास्ते यहाँ पड़ा हूँ' तो उसपर बड़ी दया आई थी. इनमे से कुछ पत्र जेनुइन भी होते. एक बार 'धर्मयुग' में मेरा एक संस्मरण छपा था जिसमे मैंने लिखा था,'घर में बहुत सारे मेहमान होने की वजह से मैं एक छोटे से कमरे में सो रही थी जो पुरानी किताबों, पत्रिकाओं से भरा हुआ था. एक टेबल फैन लगाया था. आधी रात को अचानक नींद खुली तो देखा टेबल फैन के पीछे से छोटी छोटी आग की लपटें उठ रही थीं. भगवान ने वक़्त पर नींद खोल दी वरना कमरे में आग लग जाती " इस पर चंडीगढ़ से एक लड़के ने अपने पत्र में बाकायदा उस कमरे का स्केच बनाया था और लिखा था कि कमरा छोटा होने की वजह से प्रॉपर वेंटिलेशन नहीं होगा.और आग की लपटों के साथ धुआं भी निकला होगा. जिससे आपका गला चोक हो गया होगा और नींद खुल गयी. इसमें भगवान का कोई चमत्कार नहीं है.'धर्मयुग' वालों ने भी यह नहीं सोचा था और मेरे संस्मरण का शीर्षक दे दिया था "जाको राखे  साईंयां  "


पर इन फैनमेल्स ने मेर अहित भी कम नहीं किया. पता नहीं मेरी कहानियाँ छपती या नहीं. पर मैंने डर के मारे कभी भेजी ही नहीं. (और अब आलस के मारे नहीं भेजती..) सोचा,इतने रूखे-सूखे सब्जेक्ट पर लिखती हूँ तब तो इतने पत्र आते हैं.पता नहीं कहानी छपने पर लोग क्या सोचें और क्या-क्या  लिख डालें.


हमलोग गिरिडीह में थे, वहां जन्माष्टमी में हर घर में बड़ी सुन्दर झांकी सजाई जाती. मेरे पड़ोस में छोटे छोटे बच्चों ने एक शहर का दृश्य बनाया था. सड़कों का जाल सा बिछाया था. पर हर सडक पर छोटे छोटे खिलौनों की सहायता से कहीं जीप और ट्रक का एक्सीडेंट, कहीं पलटी हुई बस तो कहीं गोला बारी का दृश्य भी दर्शाया था. यह सब देख मैंने एक लेख लिखा,'बच्चों में बढती हिंसा प्रवृति' और मनोरमा में भेज दिया.काफी दिनों बाद एक आंटी घर आई थीं,जन्माष्टमी की चर्चा चलने पर मैं उन्हें ये सब बताने लगी. उन्होंने कहा, 'अरे! ऐसा ही एक लेख मैंने मनोरमा में पढ़ा है' और मैं ख़ुशी से चीख पड़ी, 'अरे वो छप भी गया'.आस पास सब मुझे 'रीना' नाम से जानते थे.'रश्मि' नाम किसी को पता ही नही था. आंटी  ने दरियादिली दिखाई और वो पत्रिका मुझे हमेशा के लिए दे दी...(जिसे मैने बाद में खो दी )


दहेज़ मेरा प्रिय विषय था और कहीं भी मौका मिले मैं उसपर जरूर लिखती थी. एक बार शायद 'रविवार' में एक लेख लिखा था.'लडकियां आखिर किस चीज़ में कम हैं कि उसकी कीमत चुकाएं'. लेख का स्वर भी बहुत रोष भरा था. पापा व्यस्त रहते थे,उन्हें पत्रिका पढने की फुर्सत कम ही मिलती थी. हाँ, अखबार का वे एक एक अक्षर पढ़ जाते थे (आज भी). एक बार वे बीमार थे और समय काटने के लिए सारी पत्रिकाएं पढ़ रहे थे. उनकी नज़र इस लेख पर पड़ी और उन्होंने ममी को आवाज़ दी, 'देखो तो जरा, आजकल लड़कियां क्या क्या लिखती हैं' ममी ने बताया ,'ये तो रीना ने लिखा है'  मैं जल्दी से छत पर भाग गयी,कहीं बुला कर जबाब तलब ना शुरू कर दें.पर पापा ने कोई जिक्र नहीं किया.एक बार उन्होंने मेरा लेखन acknowledge किया था जब किसी स्थानीय पत्रकार ने उन्हें धमकी दी थी कि वो पत्रकार है...उनके खिलाफ लिखेगा "  पापा ने  जबाब में कहा था ,'मुझे क्या धमकी दोगे,मेरी बेटी नेशनल मैगजींस में लिखती है' (ये बात भी पापा ने नहीं, उनके प्यून ने बतायी थी)


फिर धीरे-धीरे एक एक कर सारिका ,धर्मयुग,साप्ताहिक हिन्दुस्तान, सब बंद होने लगे. मैं भी घर गृहस्थी में उलझ गयी. मुंबई में यूँ भी हिंदी के अखबार-पत्रिकाएं बड़ी मुश्किल से मिलते हैं....मिलते हैं...ये भी अब जाकर पता चला...वरना ब्लॉग्गिंग से जुड़ने के पहले मुझे पता ही नहीं था .... हिंदी से रिश्ता ख़तम सा हो गया था. अब ब्लॉग जगत की वजह से वर्षों बाद हिंदी पढने ,लिखने का अवसर मिल रहा है. and I am loving it .


(ये पोस्ट भी पिछली पोस्ट के बाद २००९ में ही लिखी थी...वैसे भी...अलग-अलग ब्लोग्स पर पोस्ट किये गए अपने पसंदीदा पोस्ट्स को इसी ब्लॉग पर ,एक जगह इकठ्ठा करने की इच्छा है...उन दिनों काफी कम लोगो को ही मेरे ब्लॉग की खबर थी...अधिकाँश लोगो के लिए यह नयी पोस्ट सी ही है )

Friday, May 13, 2011

खाली नहीं रहा कभी, यादों का ये मकान

(सोचा था....इस ब्लॉग से एक ब्रेक लेकर...दूसरे ब्लॉग पर कहानी लिखना शुरू करुँगी...अब मेहमानों के आवागमन ने ब्रेक तो दिला दिया...पर नया कुछ लिखने का वक्त नहीं मिल रहा (ना ही पढ़ने का...साथी ब्लॉगर्स माफ़ करेंगे/करेंगी ,...काफी कुछ जमा हो गया है,पढ़ने को...वक्त मिलते ही देखती  हूँ) ....ये मेरी एक पसंदीदा पोस्ट है....'मन का पाखी पर ' 2009 में   पोस्ट की  थी.}

मेरे पिताजी, अगर अपने कार्यकाल के दौरान हुए अपने अनुभवों को लिखें तो शायद एक ग्रन्थ तैयार हो जाए. किस्से तो मैंने भी कई सुने कि कैसे दंगों के दौरान पापा ने एक अलग सम्प्रदाय के लोगों को दो दिन तक घर में पनाह दी थी. वे लोग दो दिन तक पलंग के नीचे छुपे रहें. पलंग पर जमीन छूती चादर बिछी रहती...घर में आने जाने वाले लोगों को पता भी नहीं चलता कि कोई छुपा हुआ है. पापा घर में ताला बंद कर ऑफिस जाते. उनमे से एक को सिगरेट पीने की  आदत थी,उन्होंने रिस्क लेकर एक सिगरेट सुलगाई और बंद खिड़की की दरार से निकलती धुँए की लकीर देख, दंगाइयों ने पूरा घर घेर लिया था. शक तो उन्हें पहले से था ही...संयोग से पुलिस ने वक़्त पर आकर स्थिति संभाल ली. ऐसे ही एक बार दंगे में पापा की पूरी शर्ट खून से रंग लाल हो गयी थी. भीड़ में से किसी ने घर पर खबर कर दी और घर पर रोना,धोना मच गया. बाद में पापा की खैरियत देख सबको तसल्ली हुई.

हॉस्टल में रहने के कारण ,मैंने किस्से ही ज्यादा सुने पर एकाध बार मुझे भी ऐसी स्थितियों का सामना करना पड़ा. इस बार पापा की पोस्टिंग एक नक्सल बहुल क्षेत्र में थी. मेरे कॉलेज की छुट्टियाँ कुछ जल्दी हो गयी थीं,लिहाज़ा दोनों छोटे भाइयों के घर आने से पहले ही मैं घर आ गयी थी. फिर भी मैं बहुत खुश थी क्यूंकि इस बार,छुट्टियाँ बिताने,मेरे मामा की लड़की 'बबली' भी आई हुई थी. वी.सी.आर.पर कौन कौन सी फिल्मे देखनी हैं,किचेन में क्या क्या एक्सपेरिमेंट करने हैं...हमने सब प्लान कर लिया था.उसपर से हमारा मनोरंजन करने को एक नया नौकर ,जोगिन्दर भी था.जो फिल्मो और रामायण सीरियल का बहुत शौकीन था.जब भी हम बोर होते,कहते,"जोगिन्दर एक डायलॉग सुना." और वह पूरे रामलीला वाले स्टाईल में कहता--"और तब हनुमान ने रावण से कहा..."या फिर शोले के डायलॉग सुनाता.हम हंसते हंसते लोट पोट हो जाते पर वह अपने डायलॉग पूरा करके ही दम लेता.


दिन आशानुकूल बीत रहे थे,बस कभी कभी शाम को घर में कुछ बहस हो जाती. पास के शहर  के एक अधिकारी का मर्डर हो गया था.और पापा को उनका कार्यभार भी संभालने का निर्देश दिया गया था. घर वाले और सारे शुभेच्छु पापा को मना कर रहे थे पर पापा का कहना था, "ऐसे डर कर कैसे काम चलेगा...मुझे यहाँ के काम से फुरसत नहीं मिल रही वरना वहां का चार्ज तो लेना ही है."


एक दिन शाम को हमलोग 'चांदनी' फिल्म देख कर उठे. बबली किचेन में जोगिन्दर को 'स्पेशल चाय' बनाना सिखाने चली गयी. मम्मी  भगवान को दीपक दिखा रही थीं.प्यून उस दिन की डाक दे गया था ,मैं वही देख रही थी (कभी हमारे भी ऐसे ठाठ थे :)). उन दिनों मेरी डाक ही ज्यादा आया करती थी. मैंने पत्र पत्रिकाओं में लिखना शुरू कर दिया था.'धर्मयुग','साप्ताहिक हिन्दुस्तान",'मनोरमा' 'रविवार' वगैरह में मेरी रचनाएं छपने लगी थी. लिहाजा ढेर सारे ख़त आते थे. मेरे ५ साल के लेखन काल में करीब ७५० ख़त मुझे मिले ,जबकि मैं नियमित नहीं लिखा करती थी...कभी कभी तो इन पत्रों से ही पता चलता कि मेरी कोई रचना छपी है. फिर पड़ोसियों के यहाँ ,पेपर वाले के यहाँ पत्रिका ढूंढनी शुरू होती. हालांकि ये इल्हाम मुझे था कि ये पत्र मेरे अच्छे लेखन की वजह से नहीं आ रहे. उन दिनों इंटरनेट की सुविधा तो थी नहीं. इसलिए लड़कियों से interact करने का सिर्फ एक तरीका था. किसी पत्रिका में तस्वीर और पता देख, ख़त लिख डालो. सारे पत्र शालीन हुआ करते थे,पर कुछ ख़त बड़े मजेदार होते थे. दो तीन ख़त तो सुदूर नाईजीरिया से भी आये थे. मैं किसी पत्र का जबाब नहीं देती थी पर हम सब मजे लेकर सारे पत्र  पढ़ते थे. पत्र आने से थोडा अपराधबोध भी रहता था क्यूंकि मम्मी- पापा को लगता था मेरी पढाई पर असर पड़ेगा इसलिए वे मेरे लेखन को ज्यादा बढावा नहीं देते थे.

उन पत्रों में से एक पत्र था तो पापा के नाम पर मुझे लिखावट मेरे दादाजी की लगी,लिहाज़ा मैंने पत्र खोल लिया. पढ़कर तो मेरी चीख निकल गयी.मम्मी , बबली,जोगिन्दर सब भागते हुए आ गए. उस पूरे पत्र में पापा को अलग अलग तरह से धमकी दी गयी थी कि अगर उन्होंने 'अमुक' जगह का चार्ज लिया तो सर कलम कर दिया जायेगा..एक मर्डर वहां पहले ही हो चुका था.हमारे तो प्राण कंठ में आ गए. पापा मीटिंग के लिए पटना गए हुए थे. जल्दी से जोगिन्दर को भेज 'प्यून' को बुलवाया गया. शायद वह कुछ बता सके. वो प्यून यूँ तो इतना तेज़ दिमाग था कि हमारे साथ यू.एस.ओपन देख देख कर 'लॉन टेनिस' के सारे नियम जान गया था. बिलकुल सही जगह पर 'ओह' और 'वाह' कहता. पर अभी उस मूढ़मति ने बिना स्थिति की गंभीरता समझे कह डाला,"साहब तो कह रहे थे कि मीटिंग जल्दी ख़तम हो गयी तो वहां का चार्ज ले कर ही लौटेंगे." हम सबकी तो जैसे सांस रुक गयी. पर पापा का इंतज़ार करने के सिवा कोई और चारा नहीं था.
 चिंता से भरे हम सब सड़क पर टकटकी लगाए,बरामदे में ही बैठ गए. तभी जैसे सीन को कम्प्लीट  करते हुए बारिश शुरू हो गयी.बारिश हमेशा से मुझे बहुत पसंद है पर आज तो लगा जैसे पट पट पड़ती बारिश की  बूँदें हमारी हालत देख ताली बजा रही हैं.बिजली की चमक भी मुहँ चिढाती हुई सी प्रतीत हुई. बारिश शुरू होते ही बिजली विभाग द्वारा बिजली काट दी जाती थी ताकि कहीं कोई तार टूटने से कोई दुर्घटना ना हो जाए. बिलकुल किसी हॉरर फिल्म से लिया गया दृश्य लग रहा था.....कमरे में हवा के थपेडों से लड़ता धीमा धीमा जलता लैंप, अँधेरे में बैठे डरे सहमे लोग और बाहर होती घनघोर बारिश. तभी दूर से एक तेज़ रौशनी दिखाई दी.पास आने पर देखा कोई ५ सेल की टॉर्च लिए सायकल पे सवार हमारे घर की तरफ ही आ रहा है. हमारी जान सूख गयी.पर जब वह हमारा गेट पारकर चला गया तो हमारी रुकी सांस लौटी.

दूर से पापा की जीप की हेडलाईट दिखी और हमारी जान में जान आई. मम्मी ने कहा,"तुंरत कुछ मत कहना, फ्रेश होकर  खाना खा लें,तब बताएँगे" पर पापा ने जीप से उतरते ही ड्राइवर को हिदायत दी,"कल सुबह जरा जल्दी आना.पहले मैं वहां का चार्ज लेकर आऊंगा तभी अपने ऑफिस का काम शुरू करूँगा."ममी जैसे चिल्ला ही पड़ीं,"नहीं, वहां बिलकुल नहीं जाना है" फिर पापा को पत्र दिया गया. सबसे पहले हम लड़कियों पर नज़र पड़ी. इन्हें यहाँ से हटाना होगा. पटना में मेरे छोटे मामा का घर खाली पड़ा था.मामा छः महीने के लिए बाहर गए हुए थे और मामी अपने मायके में थीं. हमें आदेश मिला,"अपना अपना सामान संभाल लो,सुबह ड्राइवर मामा के घर छोड़ आएगा"
 

खाना वाना खाते, बातचीत करते रात के बारह बज गए,तब जाकर मैंने और बबली ने अपनी चीज़ें इकट्ठी करनी शुरू कीं. बिस्तर पर दोनों अटैचियाँ खोले हम अपना अपना सामान जमा रहे  थे कि हमारी नज़र नेलपॉलिश  पर पड़ी और हमने नेलपॉलिश लगाने की सोच ली. रात के दो बज रहे  थे तब. ममी  हमारी खुसुर-पुसुर  सुन कमरे में हमें देखने आयीं.(ये ममी लोगों की एंट्री हमेशा गलत वक़्त पर ही क्यूँ होती है??) हमें नेलपॉलिश  लगाते देख जम कर डांट पड़ी. और हम बेचारे अपनी अपनी दसों उंगलियाँ फैलाए डांट सुनते रहें. क्यूंकि झट से किसी काम में उलझने का बहाना भी नहीं कर सकते थे.नेलपॉलिश  खराब हो जाती.

सुबह सुबह मैं और बबली,पटना के लिए रवाना हो गए.पता नहीं,स्थिति की गंभीरता हम पर तारी थी या अकेले सफ़र करने का हमारा ये पहला अनुभव था. ढाई घंटे के सफ़र में हम दोनों, ना तो एक शब्द बोले,ना ही हँसे. जबकि आज भी हम फ़ोन पर बात करते हैं तो दोनों के घरवालों को पूछने की जरूरत नहीं होती कि दूसरी तरफ कौन है? ना तो हमारी हंसी ख़तम होती है,ना बातें.

ड्राईवर हमें घर के बाहर छोड़ कर ही चला गया,दोपहर तक मम्मी  को भी आना था.पड़ोस से चाभी लेकर जब हमने घर खोला,तो हमारे आंसू आ गए. घर इतना गन्दा था कि हम अपनी अटैची भी कहाँ रखें,समझ नहीं पा रहे थे. मामी के मायके जाने के बाद कुछ दिनों तक मामा अकेले थे और लगता था अपनी चंद दिनों की आज़ादी को उन्होंने भरपूर जिया था. सारी चीज़ें बिखरी पड़ी थीं. बिस्तर पर आधी खुली मसहरी,टेबल पर पड़े सिगरेट के टुकड़े,किचेन प्लेटफार्म पर टूटे हुए अंडे,जाने कब से अपने उठाये जाने की बाट जोह रहें थे.'जीवाश्म' क्या होता है,पहली बार प्रैक्टिकली जाना. डब्बे में एक रोटी पड़ी थी.जैसे ही फेंकने को उठाया,पाया वह राख हो चुकी थी.

मैंने और बबली ने एक दूसरे को देखा और आँखों आँखों में ही समझ
गए,सारी सफाई हमें ही करनी पड़ेगी. कपड़े बदल हम सफाई में जुट गए.बस बीच बीच में एक 'लाफ्टर ब्रेक' ले लेते. कभी बबली मुझे धूल धूसरित,सर पर कपडा बांधे, लम्बा सा झाडू लिए जाले साफ़ करते देख,हंसी से लोट पोट हो जाती तो कभी मैं उसे पसीने से लथपथ,टोकरी में ढेर सारा बर्तन जमा कर , मांजते देख हंस पड़ती. कभी हम,डांट सुनते हुए लगाई गयी अपनी लैक्मे की नेलपॉलिश  की दुर्गति देख समझ नहीं पाते,हँसे या रोएँ.

दो तीन घंटे में हमने घर को शीशे सा चमका दिया और नहा धोकर मम्मी  की राह देखने लगे.अब हमें जबरदस्त भूख लग आई थी.किचेन में डब्बे टटोलने शुरू किये तो एक फ्रूट जूस का टिन मिला. टिनक़टर तो था नहीं,किसी तरह कील और हथौडी के सहारे उसे खोलने की कोशिश में लगे.मेरा हाथ भी कट गया पर डब्बा खोलने में कामयाबी मिल गयी. बबली ताजे धुले कांच के ग्लास ले आई. हमने इश्टाईल से चीयर्स कहा और एक एक घूँट लिया.फिर एक दूसरे की तरफ देखा और वॉश बेसिन की तरफ भागे. जूस खराब हो चुका था.वापस किचेन में एक एक डब्बे खोल कर देखने शुरू किये. एक डब्बे में मिल्क पाउडर मिला. डरते डरते एक चुटकी जुबान पर रखा,पर नहीं मिल्क पाउडर खराब नहीं हुआ था.फिर तो हम चम्मच भर भर कर मिल्क पाउडर खाते रहें,और बातों का खजाना तो हमारे पास था ही.सो वक़्त कटता रहा..

वहां का काम समेटते ममी को आने में शाम हो गयी.हमने उन्हें घर के अन्दर नहीं आने दिया.फरमाईश की,पहले हमारे लिए,समोसे,रसगुल्ले,कचौरियां लेकर आओ,फिर एंट्री मिलेगी.


(पापा ने उस जगह का चार्ज नहीं लिया...और अगले छः महीने के अंदर ही निहित स्वार्थ वालों  ने, वहाँ से उनका  ट्रांसफर करवा दिया. )

Saturday, May 7, 2011

सज़ा-ए-मौत भी नाकाफ़ी!

बाल यौन शोषण एक ऐसा विषय है....जो सबको बहुत चुभता है..पर  उस पर चर्चा करने से सब बचते हैं...अगर कहीं इस तरह की घटना देखने को मिलती  है तो...बहुत ही extreme  reaction होता है, लोगो का... 'ऐसे व्यक्ति को फांसी चढ़ा देना  चाहिए....कोड़े लगाने चाहिए.'.वगैरह वगैरह...और कर्त्तव्य की इतिश्री  हो गयी. पर इस पर संयत रूप से विचार-विमर्श बहुत कम होता है.

फिल्म I am में इस समस्या पर दृष्टिपात किया गया है...और बहुत ही संयमित तरीके से...कहीं कोई अवांछनीय दृश्य नहीं हैं...सबकुछ संकेतों में ही बताया गया है. अभिमन्यु (संजय सूरी )
एक हंसमुख लड़का है...डोक्यूमेंट्री फिल्म्स बनाता है....गिटार बजाता है...लड़कियों से फ्लर्ट करता है...पब-डिस्को जाता है...आज के जमाने का एक cool dude . पर जब वह अकेला होता है...तो उदासी में सिगरेट के धुएं उडाता रहता है और उस धुएं में उसका अतीत चलचित्र की तरह उसने सामने से गुजरने लगता है. जब वह सात-आठ साल का था तो उसके सौतेले पिता ने उसके साथ दुर्व्यवहार किया...और यह सिलसिला सालो तक चलता रहा. अक्सर ऐसे निकृष्ट लोग...बच्चो को यही धमकी देते हैं कि "माँ को बताया तो तुम्हारी माँ को जान से मार दूंगा " और नन्ही सी जान मुहँ नहीं खोलते.
 
अभिमन्यु को  ये ग्लानि भी होती है कि बाद में उसने अपने पिता की इस कमजोरी का इस्तेमाल भी करना शुरू किया और गियर वाली साइकिल...महंगे खिलौनों की मांग करता रहा...यहाँ  तक कि 'फिल्म्स डिविज़न' में पढ़ने की महंगी फीस भी उसके पिता को देनी पड़ी...और यही अभिमन्यु के लिए उसके चंगुल से निकलने का जरिया भी बना. (पर अभिमन्यु को आज ग्लानि हो रही है,जब वह पच्चीस-छब्बीस साल का है...तेरह वर्ष के बच्चे की सोचने की क्षमता क्या होगी?)

अभिमन्यु की एक फ्रेंड है...उसे बहुत चाहती है..उसका ख्याल रखती है...पर अभिमन्यु अपने अतीत की वजह से उस से कोई भावात्मक सम्बन्ध नहीं बना पाता. बचपन की उस घटना ने उसका पूरा व्यक्तित्व छिन्न-भिन्न कर दिया है....वह ऊपर से सामान्य दिखता है..पर भीतर से है नहीं. उसके पिता अब मृत्यु शैय्या पर हैं....और माँ बार-बार फोन कर रही है.."एक बार आ कर मिल जा...तुम्हारे लिए इतना किया है उन्होंने" वो खुद को तैयार नहीं कर पाता,जाने के लिए और जब जाता है..तब उनकी मृत्यु हो चुकी  होती है. माँ के शिकायत करने पर वह माँ को उनकी असलियत  बताता है...हर माँ की तरह जब वो विश्वास नहीं करती...तब पूछता है,
"माँ ...तुम्हे दस सालों में कुछ भी नहीं पता चला...???"
ऐसा लगता है..ये सवाल दुनिया की हर माँ से किया गया है...माँ भी एक सामान्य प्राणी ही है..सौ उलझने हैं जिंदगी की...पर एक बच्चे को दुनिया में लाए तो फिर अपने जिस्म पर सौ आँखे उगा ले कि अपने बच्चे के साथ किसी ऐसे दुर्व्यवहार  का तुरंत ही पता चल जाए उसे.

पर माँ भी किस किस पर अविश्वास करे , मामा-चाचा सब तो अपने ही होते हैं और कई जगह तो पिता ही ऐसे निकृष्ट कर्म में लिप्त होते हैं...एक फ्रेंड की परिचित है....वो विदेश की अपनी बढ़िया नौकरी....ऐशो आराम सब छोड़ कर अपनी बेटी को ले स्वदेश वापस लौट आई .जब उसे पता चला कि उसका पति ही....
आज उसका भविष्य बिलकुल अनिश्चित है....लेकिन अपनी बेटी को उस नरक से निकाल लाई. पर उस दोषी पिता का क्या??...वो तो निर्द्वंद्व घूम रहा है...उक्त महिला के पास ना इतना धन है ना साधन कि वो केस लड़ सके...फिर वो अपनी बेटी को भी वकीलों के प्रश्नोत्तर से बचाना चाहती है...उसे अपने लिए नौकरी भी ढूंढनी है....बस इसे एक दुस्वप्न  समझ कर छोड़ दिया है....

दो महिलाए बेस्ट फ्रेंड्स थी...पारिवारिक समबन्ध थे....एक फ्रेंड के पति ने दूसरे फ्रेंड की बेटी के साथ दुर्व्यवहार की कोशिश की.बेटी ने विरोध किया और माँ को बता दिया...लेकिन जब बेटी की माँ ने अपनी सहेली  से उसके पति की शिकायत की तो सहेली ने अपने पति का विश्वास किया और सहेली से नाता तोड़ लिया. यही होता है हमेशा और ऐसी विकृत मनोवृत्ति वालों को खुली छूट मिल जाती है.


संयोग से ये फिल्म देखी और दूसरे ही दिन...अखबार में एक खबर पर नज़र पड़ी...

A Delhi court has recommended to the central government to explore the possibility of castrating rape and molestation convicts. Sentencing a man to 10-year imprisonment for raping his stepdaughter for four years, additional sessions judge Kamini Lau called for a “public debate” on the possibility of surgical and chemical castration as punishment for rape.
Lau said countries like the US, UK and Germany have imposed chemical and surgical castration as an alternate to contain the growing menace of rape and molestation. Indian legislatures should with seriously explore this possibility too, particularly in cases involving the rape of minors, serial offenders and child molesters, the court said.

ये तो अभी एक सुझाव मात्र था पर विरोध अभी से शुरू हो गए,


Advocate Mukul Rohatgi., said “It would lead to Talibanisation of the Indian criminal justice system,”



Law Commission vice-chairman KTS Tulsi said: “It takes us back to the stone age. I wholly disagree with it.”

तो फिर आखिर क्या सजा दी जाए दोषियों को...जो किसी का पूरा जीवन बर्बाद कर देते हैं...मनोवैज्ञानिको को ही ये रिसर्च करना चाहिए कि इस तरह की विकृतियाँ उत्पन्न ही क्यूँ होती है...आधे केस में तो ऐसे दुराचार करनेवाले खुद भी बचपन में शिकार हुए होते हैं.

यह एक बहुत ही गंभीर समस्या है...जिसके अधिकाँश केस, आवरण के भीतर ही दबे रह जाते हैं
..(वैसे फिल्म में बताया गया है कि...ये अभिमन्यु का किरदार
सत्य घटना पर आधारित है )

पिंकी  वीरानी ने "कोमा में पड़ी अरुणा शानबाग' की कहानी दुनिया के सामने लाई...उन्होंने बाल यौन  शोषण पर एक किताब भी लिखी है,"Bitter   Chocolate " इस किताब में भी कोई  sleazy details नहीं हैं...बल्कि बहुत गंभीरता से इस समस्या पर विचार किया गया है. करीब १०० केस का जिक्र है..जहाँ पिंकी खुद पीड़ित बच्चों से मिली हैं. वे प्रकरण...आपके रोंगटे खड़े कर देंगे.....और किसी अपने जैसे मानव द्वारा ऐसे कर्म के लिए शर्मसार कर के नज़रें झुकाने को बाध्य कर देंगे.

एक बारह वर्षीया पीड़िता द्वारा लिखी ये कविता भी उस किताब में दी गयी है

I asked you for help, and you told me you would

If I told you the things he did to me.

You asked me to trust you, and you made me

Repeat them to fourteen different strangers


I asked you for protection

And you gave me a social worker.

Do you know what it is like

I have more social workers than friends?


I asked you for help

And you forced my mother to choose between us.

She chose him, of course.

She was scared, she had a lot to lose.


I had a lot to lose too.

The difference is, you never told me how much.

I asked you to put an end to the abuse

You put an end to my whole family.

You took away my nights of hell

And gave me days of hell instead.

You have changed my private nightmare

Into a very public one.

Wednesday, May 4, 2011

फिल्म I am : मेघा और रुबीना का साझा दर्द

"कश्मीर' शब्द का जिक्र सुनते ही मस्तिष्क की नसें, सजग हो जाती हैं और टेंस भी. तुरंत ही एक बने बनाए विचार प्रकोष्ठ में हमारी सोच कैद हो जाती है...या तो पक्ष में या विपक्ष में. खुल कर इस समस्या पर सोचने की कोई कोशिश ही नहीं करता...या तो हमारी हमदर्दी विस्थापित कश्मीरी पंडितों के साथ होती है या फिर कश्मीर में रहनेवाले सामान्य जीवन  गुजारने से वंचित लोगो के साथ.  

पर फिल्म " I am " में बिना किसी का पक्ष लिए दोनों पक्षों की पीड़ा को तटस्थ रूप में देखने की कोशिश की गयी है.

मेघा (जूही चावला ) के माता-पिता का कश्मीर में घर है..पर वे इस आस में कि कभी अपनी जमीं पर लौटेंगे...उसे बेचना नहीं चाहते. पिता की मृत्यु के बाद किसी तरह...मेघा, माँ को घर बेचने के लिए तैयार करती है...और पेपर पर साइन करने...कश्मीर जाती है.

श्रीनगर में प्लेन उतरने को है...मेघा बीस साल बाद लौट रही है....पर उसके हाथ आगे बंधे हुए हैं...और सख्ती से होंठ भिंचा हुआ है...उसे कोई ख़ुशी नहीं हो रही...बल्कि एक गुस्सा सा उबल रहा है...कि उसका अपना शहर है..पर वो वहाँ नहीं रह सकती. उसकी बचपन की सहेली, रुबीना (मनीषा कोइराला ) उसे लेने आती है...बहुत खुश होती है...कार में, उस से कश्मीरी में उन स्थलों का जिक्र करती है...जहाँ दोनों साथ जाया करते थे. पर मेघा रुक्षता से कह देती है.."उसे कुछ भी नहीं याद....और अब उस से कश्मीरी में बात ना किया करे...हिंदी या अंग्रेजी ही बोले" और कुछ रोष से नज़रें कार से बाहर टिका देती है. रुबीना के माता-पिता, मेघा से  बहुत ही प्यार से मिलते हैं... हाल-चाल पूछते हैं...यहाँ भी मेघा...अपनापन से जबाब नहीं देती.


हाल के दिनों में मेरे कुछ फ्रेंड्स कश्मीर से होकर आए हैं...एक एडवेंचरस फ्रेंड ने तो अपनी पत्नी, दोस्त और उसकी पत्नी के साथ मुंबई से कश्मीर तक की यात्रा कार से की थी. सबने एक जुबान से वहाँ की मेहमानवाजी  की बहुत तारीफ़ की. एक घुमक्कड़ दंपत्ति, ट्रेन में मिले  थे  और भारत का चप्पा-चप्पा देखने की योजना थी,उनकी..उनलोगों ने भी कहा कि,"इतनी जगह घुमे पर कश्मीर वाले जैसे दिल निकाल कर रख देते हैं' .इसके पीछे कहीं कोई ग्लानि तो नहीं....या वे खुद को कुछ अलग -थलग महसूस करते हैं....और इस तरह ज्यादा खिदमत कर अपना प्यार जताना चाहते हैं??

मेघा, छत पर अपने घर के ढेर सारे सामान  जो ट्रंक में बंद थे...के बीच उदास सी खड़ी रहती है...जब वो अपने चाचा के घर के खंडहर बनी दीवारों को देखती हैं...जिसपर एक पुरानी तस्वीर, एक फटे पोस्टर का कोना,वैसे ही चिपके होते हैं..तब अपने को रोक नहीं पाती...और उसे वो सारे मंज़र याद आने  लगते  हैं...जिन हालातों में उसे आधी रात को अपना घर छोड़ भागना पड़ा था.


मेघा का ये दर्द मैने किसी की आँखों में रु ब रु देखा है. दिल्ली में एक मेरी कश्मीरी सहेली थी...उसने पूरा ब्यौरा बताया था कि पूरी रात लाउड स्पीकर से मुल्लाओं  के भाषण और पकिस्तान जिंदाबाद के नारे लग रहे थे. सारे कश्मीरी पंडित अपने-अपने घरो में काँप रहे थे. पौ फटते ही...उसे उसके  भतीजे के साथ जम्मू भेज दिया गया..तब उसकी शादी नहीं हुई थी. उसके भाई -भाभी बैंक में कार्यरत थे...उनका भी ट्रांसफर हो गया...और पूरा परिवार श्रीनगर छोड़...दिल्ली में बस गया...जब उसकी शादी तय हुई..तो उसकी माँ और भाभी, एक पड़ोसी की सहायता से ... अपने ही घर में चोरो की तरह बस कुछ घंटों के लिए गयीं...उन्हें शादी में देने को कुछ सामान और केसर लेना था . उसके घर में कुछ बेगाने लोगो ने कब्ज़ा कर लिया था.....अकसर वो अपने घर की...बागों...की बात किया करती थी. मुझे फिल्म में मेघा का और अपनी सहेली का दर्द..एकाकार होता दिख रहा था...शायद उसकी भी ऐसी ही प्रतिक्रिया होती.


रुबीना...देर तक मेघा की तरफ देखती है..और दोनों सहेलियों को वे बातचीत याद आ जाती हैं...जब रुबीना जिद करती थी कि 'मेरे भाई से शादी कर के मेरे घर में रहने आ जा'. आंसुओं में सारे गिले -शिकवे बह जाते हैं....बातचीत शुरू हो जाती है...मेघा, रुबीना से उसके प्रेमी अज़ान  के बारे में पूछती है..कि दोनों ने शादी क्यूँ नही की??


रुबीना बताती है कि वो अमेरिका चला गया....मेघा के ये कहने पर कि "तुम क्यूँ नहीं साथ चली गयी?...रुबीना कहती है .."सब तुम्हारी तरह लकी नहीं हैं."


और मेघा गुस्से में बोल उठती है, "मैं लकी हूँ??....आधी रात को अपने ही घर से चोरों  की तरह भाग निकलना ....रिफ्यूजी कैम्प में दिन बिताना...दिन रात-अपने माता-पिता को अपने घर की याद में घुलते देखना...ये सब क्या खुशकिस्मती है??"


रुबीना पलट कर कहती है,"अगर तेरी  जगह मैं यहाँ से निकल जाती...और तुझे यहाँ रहना पड़ता तो तुम्हे कैसा लगता??...सड़कें सुनसान हैं...जगह - जगह कंटीले तार..और बन्दूक लिए  सुरक्षाकर्मी खड़े हैं...जहाँ जाओ...हर तरफ से दो निगाहें...नज़र रखती हैं... पूछताछ की जाती है...सारे सनेमा हॉल बंद हो चुके हैं...शाम होते ही लोग अपने घरो में दुबक, बस टी.वी. देखते हैं.....जब-तब गोलियों की आवाजें आती रहती हैं...मेरे भाई ने छः साल  पहले...सरेंडर कर दिया, बीमार है...ठीक से चल नहीं पाता...फिर भी रोज पुलिस किसी ना किसी का फोटो लिए शिनाख्त करवाने आ जाती है...इस सरेंडर करने से तो अच्छा होता वो शहीद हो जाता...और लोग कहते हैं..'कश्मीर' जन्नत है..नहीं चाहिए मुझे ये जन्नत."


अब, मेघा उसका दर्द  समझती है...


वहाँ  रहनेवालों की स्थिति भी कोई बेहतर नहीं है...उनलोगों ने गलतियाँ की..लेकिन आखिर कब तक उसकी सजा भुगतेंगे और हर एक कश्मीरी तो आतंकवाद में शामिल नहीं था/ है . फिर कुछ सिरफिरों के करतूत की सज़ा पूरे कश्मीर को क्यूँ मिल रही है??...जब वे लोग टी.वी. पर दूसरे शहरों में लोगो को आज़ादी से घूमते...देर रात तक एन्जॉय करते देखते होंगे...तो क्या बीतती  होगी,उन पर...


जूही चावला ने बहुत  ही कम संवादों का सहारा ले..सिर्फ चेहरे के भाव से सब कुछ जीवंत कर दिया है..मनीषा कोइराला भी छोटे से रोल में बहुत ही भली लगीं.

 

( अगली पोस्ट में कश्मीर पर एक वृत्तचित्र  बनाने के दौरान मेघा  के विचार जानने की कोशिश करने वाले....अभिमन्यु (संजय सूरी) की कहानी जो बचपन में यौन शोषण का शिकार होता रहा था.)

Monday, May 2, 2011

I am : एक विचारोत्तेजक फिल्म

फिल्म "I am " एक प्रयोगवादी फिल्म है. इसमें कोई कहानी नहीं है...पर चार अलग-अलग प्रकरणों को फिल्म में इस तरह गुंथा गया है कि मन मस्तिष्क झंकृत हो जाता है. इस तरह के वाकये समाज में हैं पर कोई उनकी चर्चा नहीं करना चाहता ना ही उनका अस्तित्व ही स्वीकार करने  की कोशिश करता है. निर्देशक ने उन प्रकरणों को नेपथ्य से लाकर...सेल्युलाइड पर उतार दिया है. और दर्शक अपलक....सांस रोके देखते रहते हैं. २ घंटे की फिल्म है...पर गज़ब की कसावट  है कि आप एक पल को सर भी नहीं घुमाना चाहते.

'ओनीर' द्वारा निर्देशित यह फिल्म कभी भी इतना गहरा  प्रभाव छोड़ने में सफल नहीं होती,अगर इसके कलाकारों के चयन में सजगता नहीं दिखाई गयी होती. जूही चावला, नंदिता दास, राहुल बोस, संजय सूरी, मनीषा कोइराला, पूरब कोहली, मानव कौल  जैसे कलाकारों ने हर पात्र को सजीव कर दिया है.



पहले तो हमेशा की तरह फिल्म के बारे में ही लिखने की इच्छा थी...परन्तु फिर ख्याल आया....फिल्म में उठाये गए मुद्दों को अलग अलग ही संबोधित किया जाए.फिल्म में चार अलग- अलग समस्याओं को उठाया गया है....स्त्री और पुरुष के बदलते समीकरण...कश्मीर के विस्थापितों और कश्मीर में रह रहे लोगो की आतंरिक पीड़ा.... child abuse  और  gay  .


सबसे पहले एक आधुनिक ,आत्मनिर्भर लड़की की कहानी है. आफिया  (नंदिता दास) एक वेब डिज़ाईनर है..शादी -शुदा है  और माँ बनने को आतुर. ये देख,ब्लॉगजगत के कई पोस्ट याद आ गए...जहाँ आधुनिक लड़कियों पर यह आरोप लगाया जाता है कि वे माँ नहीं बनना चाहतीं...साथ ही याद आए एक दंपत्ति. पति-पत्नी दोनों ही मेरे फ्रेंड हैं. दोनों उच्च  पदों पर आसीन . पांच साल शादी को हो गए थे. पत्नी माँ बनने को परेशान पर पति की जिद कि पहले फ़्लैट लेना है..कार की किश्तें चुकानी हैं...फौरेन ट्रिप पर जाना है. उसके बाद बच्चे के आगमन की तैयारी.

पति की जिद से उनके रिश्तों में दरार आती जा रही थी...पर पति के अपने तर्क थे...मुंबई जैसी जगह में  हर ग्यारह महीने में घर बदलना होता है...बच्चे का स्कूल होगा...उसे एक स्थायी पता तो चाहिए. अगर पत्नी नौकरी छोड़ देगी या लम्बी छुट्टी लेगी तो पैसों की दिक्कत.

लड़की अलग परेशान थी क्यूंकि परिवार के ताने तो लड़की को ही सुनने पड़ते थे. दोनों ही अपनी उलझने मुझसे शेयर करते थे...पर इतनी व्यक्तिगत समस्या को सुन कर ही रह जाना पड़ता है...सलाह कोई क्या देगा? खैर अब फ़्लैट भी ले लिया...स्विट्ज़रलैंड पेरिस भी हो आए और एक चार  महीने के प्यारे से बेटे के माता-पिता भी हैं.


पर यहाँ आफिया  के पति, बच्चा इसलिए नहीं चाहते क्यूंकि उसका दूसरी लड़की से अफेयर है. दोनों का डिवोर्स हो जाता है और एक दिन आफिया, एक दुकान से देखती है....उसका भूतपूर्व पति,अपनी आसन्न प्रसवा बीवी को कार में बैठने में मदद कर रहा है. पति का रोल मानव कौल ने किया है जो एक हिंदी ब्लॉगर  हैं...कम लिखते हैं...पर अच्छी कहानियाँ हैं उनकी.

 
आफिय को  जिद हो जाती है कि उसे भी माँ बनना है , पर artificial  insemination की मदद से. सारे दोस्त, शुभचिंतक उसके इस निर्णय को पागलपन करार देते हैं..और शादी की सलाह देते हैं. पर उसका कहना है कि क्या गारंटी है कि वो पुरुष उसके पति जैसा नहीं  होगा.??..इसलिए उसे किसी पुरुष की जरूरत ही नहीं है.  एक फर्टिलिटी  क्लिनिक से सारी बातें भी कर लेती है..पर उसका एक आग्रह, फर्टिलिटी क्लिनिक वाले भी नहीं मानते...वो डोनर से मिलना चाहती है जबकि  डोनर की जानकारी हमेशा गुप्त रखी जाती है. पर उसकी जिद है कि एक बार वो डोनर को रूबरू देखना चाहती है...आखिरकार डॉक्टर उसकी बात मान कर डोनर, पूरब कोहली जो कि एक सुदर्शन मेडिकल स्टुडेंट है....से एक मीटिंग तय कर देते हैं. वह लड़का बिलकुल घबराया हुआ है..किसी तरह उसके एकाध सवालों का जबाब देता है...और फिर बहाने से चला जाता है. पूरब कोहली ने एक कन्फ्यूज्ड से घबराए लड़के का बहुत ही अच्छा अभिनय किया है..

क्लिनिक में दोनों फिर से मिलते हैं... आफिया, पूरब से कहती है..अगर वो चाहे तो बच्चे से मिल सकता है..पर पूरब मना कर देता है....फिर थोड़ी देर बाद, आफिया  अपने  इतने बड़े निर्णय से घबरा कर बहुत ही अस्वस्थ हो जाती है. तब पूरब उसे आश्वासन देता है कि सब ठीक होगा...और अपना फोन नंबर देता है.

लेकिन insemination  के बाद घर लौटती आफिया  उस कागज़ पर लिखे नंबर के पुर्जे-पुर्जे  कर के उड़ा देती है...और एक खिली सी बंधनमुक्त मुस्कान उसके चेहरे पर छा जाती है. अब मुझे ये दिखा तो इसका श्रेय निर्देशक को जाता है कि वो आफिया  के हाव-भाव से ये भाव संप्रेषित करने में सफल हुआ है.
 नंदिता दास ने अच्छा अभिनय किया है...पर शायद...उन्हें अपने अंदर की कशमकश दिखाने का उतना मौका नहीं मिला...वे  लोगो को अपने निर्णय के लिए कन्विंस करने में ज्यादा लगी होती हैं. मानव कौल और  पूरब कोहली ने अपने रोल के साथ न्याय किया है..एडिटिंग और फोटोग्राफी बहुत अच्छे हैं...बैकग्राउंड में बजता गीत फिल्म को कॉम्प्लीमेंट करता है.

निर्देशक का एक ये भी संदेश है कि अगर पुरुष, नारी को ऐसे ही फॉर ग्रांटेड  लेते रहे...तो वे दिन दूर नहीं जब ऐसे वाकये आम हो जायेंगे.और आजकल की स्त्रियाँ जिस तरह...बच्चे को पालने का सारा भार अकेले वहन कर रही हैं. डॉक्टर-स्कूल-पैरेंट्स मीटिंग- स्पोर्ट्स डे- ट्यूशन-अनुशासन सिखाना...अक्सर सब कुछ अधिकांशतः  महिलाओं  पर ही निर्भर होता जा रहा है. यह सब देख बड़ी होती लडकियाँ...सोच सकती हैं...कि जब अकेले ही बच्चे को पालना है तो फिर किसी पुरुष की  जरूरत ही क्यूँ. भविष्य की यह तस्वीर कोई सुखद नहीं है.

 (अगली पोस्ट में...आफिया की सहेली मेघा (जूही चावला ) की कहानी जो कश्मीरी पंडित  है..और बीस वर्षों से अपने घर नहीं लौट सकी है )

हैप्पी बर्थडे 'काँच के शामियाने '

दो वर्ष पहले आज ही के दिन 'काँच के शामियाने ' की प्रतियाँ मेरे हाथों में आई थीं. अपनी पहली कृति के कवर का स्पर्श , उसके पन्नों क...