Tuesday, October 16, 2012

गलतियाँ करने की इजाज़त भी उतनी ही जरूरी


कुछ दिनों से अखबारों में पढ़ी कुछ ख़बरों ने मस्तिष्क में उथल-पुथल मचा रखी है ...न तो उस विषय पर लिखना मुमकिन हो पा रहा है और न ही वो विषय किसी और विषय पर लिखने की इजाज़त दे रहा है।  हाल में ही कुछ  ख़बरें ऐसी आयीं जहाँ 21,22 वर्ष के बच्चों ने कच्ची उम्र में बेवकूफी भरा कदम उठा कर इस दुनिया को अलविदा कह दिया 

यह विषय इतना परेशान करता है कि  अब तक इसपर कई  पोस्ट लिख चुकी हूँ। फिर भी  समझ नहीं आ रहा आखिर ऐसा क्या हो कि  सबकुछ ठीक हो जाए। कोई भी ज़िन्दगी से हार कर ऐसा कदम उठाने को उद्धत न हो। 
दरअसल , मरना तो कोई भी नहीं चाहता पर जिनसे दर्द नाकाबिले बर्दाश्त हो जाता है, उन्हें कोई और राह नहीं सूझती। उन्हें इस दर्द से बचने का एक ही हल नज़र आता है, आत्महत्या .सबकी सहनशक्ति अलग अलग होती है।

पर जो लोग काफी दिनों से डिप्रेशन में हों ,निराश हों उनकी  सहायता के लिए मनोवैज्ञानिकों ने कई उपाय सुझाए  हैं। 

अगर कोई आत्महत्या की धमकी दे या आत्महत्या  की चर्चा करे तो कभी ऐसा नहीं सोचना चाहिए कि गरजने वाले बादल बरसते नहीं हैं। कितने भी मजाक में यह बात कही गयी हो पर उसके अन्दर का आंशिक सच ये होता है कि  उस व्यक्ति के दिमाग में यह चल रहा है .

यह कभी नहीं सोचना चाहिए कि  जिसने मरने की ठान ही ली थी,उसे रोका नहीं जा सकता था । कोई भी व्यक्ति मरना नहीं चाहता बस ये चाहता है कि वो उस कष्ट और उस दर्द से छुटकारा पा जाए और मरने के सिवा उसे इस दर्द से छुटकारे का कोई रास्ता नज़र नहीं आता। पर अगर उसे हलकी सी भी रौशनी दिखे तो वो ऐसे कदम उठाने से  बच सकता है। 

कई बार कोई दोस्त/रिश्तेदार/पडोसी चुप्पी ओढ़ ले, बात न करना चाहे तो उसकी मर्जी जान कर उसे उसके हाल पर छोड़ दिया जाता है कि  उसकी मनस्थिति जब अच्छी  होगी तो वो खुद बात करेगा। पर ये गलत है, उसके करीबी लोगों को अपने अहम् की परवाह किये बिना चाहे वो जितनी बार भी हाथ झटके, मदद के हाथ बढाने से बाज नहीं आना चाहिए। 
(फिल्म परदेस का ये डायलॉग मुझे हमेशा पसंद आता है "अगर कोई दोस्त दरवाजा बंद कर अन्दर बैठ जाए तो हम  भारतीय उसे उसके हाल पर अकेला नहीं छोड़ते ,दरवाजा तोड़ कर अन्दर घुस जाते हैं " पर भारत के सन्दर्भ में भी अब यह सच नहीं रहा। लोग अपने आप में सिमटते जा रहे हैं )

अगर कोई बहुत निराश हो और बार बार कहे कि जीने की इच्छा नहीं रही तो उसे से सीधा पूछ लेना चाहिए 'तुम आत्महत्या की तो नहीं सोच रहे न ??" ऐसा पूछना, उसे आत्महत्या के आइडियाज़ देने जैसा नहीं है बल्कि  उसे खुलकर उस विषय के दोनों पहलुओं पर बात करने का मौका देने जैसा है।

आत्महत्या के लिए प्रेरित व्यक्ति कोई न कोई इशारा जरूर देता है। जरूरत है ,उसके आस-पास वालों को इस इशारे को समझने की। 

आत्महत्या के विषय में बात करना,ये कहना कि  ज़िन्दगी से तंग आ गया हूँ, कोई रास्ता नहीं सूझता। काश ! पैदा ही नहीं हुआ होता ..
मरने के तरीके की चर्चा करना।
मृत्यु  से समबन्धित कहानी और कवितायें लिखना। 
ये सोच लेना  कि अब कुछ नहीं हो सकता, भविष्य अंधकारमय है 
खुद में हीन भावना भर जाना ,अपने को किसी काम के लायक न समझना, खुद से ही घृणा करना 
अपनी प्रिय चीज़ें लोगों में  बांटने  की बात करना।।
अपनी वसीयत  तैयार करना। 
अगर काफी दिनों के निराशा  और अवसाद के बाद अचनाक से कोई बहुत खुश दिखने लगे तब भी समझना चाहिए कि  उसके मन में कुछ चल रहा है।

ये सब  सिर्फ इशारे नहीं हैं बल्कि इसे मदद की पुकार समझा जाना चाहिए 

डिप्रेशन के शिकार व्यक्ति से ये सब कहकर बात की शुरुआत  की जा सकती है कि 
'तुम्हारी चिंता हो रही है।
तुममे कुछ परिवर्तन दिख रहा है।
अब तुम पहले जैसे नहीं हो 
मैं तुम्हारे साथ हूँ अपनी चिंता मुझसे बाँट सकते हो।
मैं  तुम्हारा दर्द बाँट नहीं सकता पर समझ सकता हूँ कि  तुम किस दौर से गुजर रहे हो।
बहुत तरह से मदद की जा सकती हैं।जरूरी नहीं कि  सही शब्द ही कहे जाएँ पर आवाज़ में  चिंता और व्यवहार बता देता है कि  अमुक चिंतित है ,उसके लिए। 

गहरे अवसाद में जो हो उसे कभी भी लेक्चर नहीं देना चाहिए कि 
 ज़िन्दगी कितनी अमूल्य है। वो गलत कर रहा है .
उसके ऐसे कदम के परिणाम क्या होंगे . 
उस व्यक्ति को बहुत ही प्यार से समझाने की कोशिश करनी चाहिए  कि उसके बिना किन लोगों को फर्क पड़ेगा। वो ज़िन्दगी में कितना कुछ कर सकता है।
कोशिश करनी चाहिए कि  वो किसी साइकियाट्रिस्ट से मिले। हमेशा उसके संपर्क में रहना चाहिए। वो न मिलना चाहे फिर भी उस तक पहुँचाने की हर कोशिश करनी चाहिए। 

कुछ दिनों से ही विषय पर लिखने की की सोच रही थी और आज ही  Mumbai Mirror अखबार  में एक हेल्पलाइन के विषय में विस्तार से जानकारी दी गयी है। जहाँ 24 घंटे चार युवा clinical psychologist सहायता के लिए तत्पर रहते हैं। उनका कहना है कि लोग कॉल इसीलिए करते हैं क्यूंकि वो जीना चाहते हैं और कहीं से भी एक आश्वासन चाहते हैं कि 'दुनिया जीने लायक है ,उनके पास भी जीने का कोई कारण है।'
एक महिला का उदाहरण बताया गया है . उसने फोन किया कि ' " उसने फांसी का फंदा तैयार कर लिया है बस अपने पति के ऑफिस जाने की प्रतीक्षा कर रही है।" 
इतना कहकर उसने फोन काट दिया। इनलोगों ने उसे कॉल बैक किया तो फोन स्विच ऑफ मिला। आधे घंटे तक की लगातार कोशिश के बाद उस महिला ने फोन उठाया। उसे शिकायत थी कि  पति घर से बाहर  नहीं जाने देते। नौकरी नहीं करने देते आदि .उसकी एक छोटी बेटी भी थी। इनलोगों ने उसकी बेटी के विषय में पूछा।बेटी को क्या पसंद है।वो कैसी  शरारतें करती है। उसे वो कैसे संभालती हैं।
उस से ये नहीं कहा कि उनके जाने के बाद बेटी का क्या होगा बल्कि यह सब पूछकर उनलोगों ने उसके सामने बेटी की तस्वीर ला दी। और वो खुद समझ गयी कि बेटी उसकी जिम्मेवारी है। फिर उसे अपनी ज़िन्दगी बेहतर बनाने के कई सुझाव दिए। उसने भी स्वीकार किया कि वो मरना नहीं चाहती थी पर ज़िन्दगी से निराश हो गयी थी .ये लोग बाद में भी कॉल करके उसका हाल लेते रहे .

ये कुछ हेल्पलाइन के फोन नंबर हैं -- Vanderwala Foundation --1860 266 2345 And  022 25706000 . Aasra helpline --91-22-27546669..I Call  Helpline --91-22-25563291


पर ये सारे उपाय उनलोगों के लिए हैं जो काफी दिनों से डिप्रेशन में हों। पर कई केस ऐसे भी होते हैं जहाँ क्षणांश में ऐसे घातक निर्णय ले लिए जाते हैं। 
हाल में ही अखबार  में एक खबर थी थर्ड इयर इंजीनियरिंग का एक स्टूडेंट कॉलेज की तरफ से टूर पर गया  था .वहाँ एक शिक्षक ने लड़कों के बैग की तलाशी ली . इस छात्र के बैग में एक सिगरेट मिली। शिक्षक ने पूछा, "क्या तुम्हारे पिता जानते हैं तुम सिगरेट पीते हो?"

उस छात्र के ना कहने पर उक्त शिक्षक ने उसके पिताजी को फोन कर दिया . और उसी रात उस लड़के ने छत से कूद कर आत्महत्या कर ली। 
अपनी एक पुरानी पोस्ट में जिक्र किया था, ' एक ग्यारह साल की लड़की ने अपनी नोटबुक में अपने क्लास के एक लड़के के लिए अपनी फीलिंग्स के बारे में लिखा था . माँ ने वो नोटबुक पढ़ ली। उन्होंने प्रिंसिपल से उसकी शिकायत कर दी . लड़की ने घर आकर ख़ुदकुशी कर ली।

यहाँ माँ और उक्त शिक्षक दोनों से इस मामले में थोड़ी संवेदनशीलता की दरकार थी। न इंजीनियरिंग के स्टूडेंट्स के पास से सिगरेट मिलने की बात अनहोनी थी न ग्यारह साल की लड़की के मन में ऐसे ख्याल आने की . पर उन दोनों वयस्कों की लापरवाही से दो मासूम जिंदगियां मिटटी में मिल गयीं।

कई बार ऐसा भी होता है कुसूर किसी का नहीं होता . एक परिचित का लड़का बहुत ही होनहार था .पूरे खानदान में उसकी प्रतिभा ,उसकी स्मार्टनेस के किस्से मशहूर थे। होटल मैनेजमेंट कर रहा था . उसके किसी साथी ने फोन  पर खबर दी कि  वो फेल हो गया है और इस लड़के ने तुरंत ही नौकर को किसी काम के बहाने बाहर भेज दिया, माँ  को पडोसी के यहाँ से कोई अखबार लाने के लिए कहा और खुद की इहलीला समाप्त कर ली।

यहाँ  सिर्फ अपने इमेज की बात होती है ,उस इंजीयरिंग के छात्र की इमेज घर में बहुत ही सुशील सज्जन लड़के की होगी, वो बर्दाश्त नहीं कर पाया कि उसके पैरेंट्स उसके विषय में ऐसा सोचें और पैरेंट्स की नज़रों में गिरने से ज्यादा बेहतर उसने मौत को गले लगाना समझा। यही बात उन परिचित के बेटे के साथ भी थी। आज भी उनका पूरा खानदान उस लड़के के विषय में बड़े गर्व से बात  करता है कि उस जैसा टैलेंटेड, स्मार्ट लड़का एक ही था, ख़ानदान  में पर अनजाने में ही उस लड़के के कन्धों पर अपेक्षाओं की कितनी बड़ी गठरी लाद  दी थी,इनलोगों ने, ये नहीं समझ पाते। उस गठरी का बोझ संभाले रखने की बजाय दुनिया छोड़ना उसे ज्यादा आसान लगा। 

ऐसी इमेज बनती कैसे है? बच्चे तो जिम्मेवार हैं ही। पर उनकी उम्र कच्ची  है। ज्यादा समझदारी पैरेंट्स को दिखानी है। इतनी ज्यादा उम्मीद अपने बच्चों से न लगाएं .उनके ऊपर ऐसे इमेज न थोपें। मैंने बहुत लोगो से कहते सुना है, "इतना तो विश्वास है मुझे अपने बेटे पर, ऐसा तो वो कर ही नहीं सकता।" विश्वास रखना बड़ी अच्छी  बात है। पर उसे थोडा सा सामान्य बने रहने की छूट भी दे दें। बच्चों के कम नंबर आने पर मैंने बच्चों से कई गुना उदास और निराश उनके माता-पिता को देखा है। 
एक मेरी  परिचिता बड़े गर्व से कहती  हैं, "मेरा  बेटा लड़ाई कर ले, किसी का सर फोड़ दे, मैं मान लूँ पर अगर  कोई कहे कि  किसी लड़की के साथ उसे देखा है, ये मैं नहीं मान सकती  वो तो लड़कियों से दूर भागता है। बात तक नहीं  करता ."
बड़ी अच्छी बात है .पर अगर कहीं उसे किसी से प्यार हो गया और माँ  ने देख लिया फिर तो उसके लिए डूब मरने की बात  ही हो जायेगी,न । 

बच्चे का प्रतिभावान होना, सज्जन होना, सुशील होना .चरित्रवान होना, आज्ञाकारी होना  हर पैरेंट्स के लिए गर्व की बात है पर उन्हें कभी -कभी गलतियां करने की इजाज़त भी दें . उन्हें सामान्य बने रहने भी दें .

ज़िन्दगी से बढ़कर कुछ भी नहीं। ज़िन्दगी रहेगी तभी गलतियां करके सुधरने का अवसर भी देगी।

इसी विषय से सम्बंधित और पोस्ट हैं 

Sunday, October 7, 2012

कहीं देखा है,आपको...



ऐसा सबके साथ  ही होता है...कोई अनजान चहरा देखते ही लगता है....ये चेहरा  कहीं देखा है..जाना-पहचाना सा है. या फिर किसी को देखकर लोग कहें..'आपको कहीं देखा है' . अब ऐसे वाकये एकाध बार हों  तो वो सामान्य सी बात है...पर अगर बार-बार हो तो  फिर थोड़ा असहज लगता  है या  फिर आदत पड़ जाती है. 
 अभी हाल में ही गणपति पूजा के लिए एक नए पंडित जी घर आए. उन्होंने पूजा की तैयारियाँ करते हुए पूछा, "आप उस साईं मंदिर में हमेशा आती हैं ना? "
"कौन सा मंदिर ?"
"वही ब्रिज के पास जो  है..."
मैं समझ गयी उनकी ग़लतफ़हमी, पर हामी भरी.." हाँ..जाती हूँ."
वे खुश होकर बोले.."हां, मैने कई बार देखा है,आपको  "
जबकि सच ये है कि मुझे पता भी नहीं  वो मंदिर किधर है.
ये हामी भरनी अब सीखी है ,मैने...वरना पहले सीधा 'ना' कह देती थी. और अपना अंदाजा यूँ गलत होते देख लोगों की भृकुटी पर बल पड़ जाते थे.

कभी लोगो के इस मुगालते से मुझे फायदा भी होता था तो कभी लोगों की नाराज़गी भी झेलनी पड़ती थी. 

मुझे थोड़ा सा आश्चर्य होता था, जब मेरे बेटे के स्कूल के प्रिंसिपल मुझसे बड़ी आत्मीयता से बात करते. वरना प्रिंसिपल लोग कहाँ...स्टुडेंट्स के पैरेंट्स को इतनी तवज्जो देते हैं. पर मुझे हमेशा अच्छा ख़ासा समय देते और बात करते. बच्चों के बारे में भी बड़े विस्तार से पूछते . आखिर एक बार उन्होंने पूछ ही लिया.."आप नागपुर की रहने वाली हैं ना?"
"ना.."
"आप वहाँ.... रहती थीं ना..??" (किसी कॉलोनी का नाम लिया...जो मैं दूसरे पल ही भूल गयी..अब तक कहाँ याद रहेगा )
मेरे ये कहने पर कि 'मैं तो नागपुर कभी गयी भी  नहीं'.... बड़े आश्चर्य से भर कर उन्होंने सर हिलाया. कुछ सोचते रहे पर सज्जन व्यक्ति हैं..बाद में भी वही आत्मीयता बनाए रखी.  

पर मेरे दूसरे  अनुभव इतने अच्छे  नहीं रहे. ट्रेन में एक मोहतरमा मिलीं.परिचय का आदान-प्रदान हुआ...कुछ देर  बातचीत करने  के बाद.उन्होंने पूछा.."आप गोरखपुर की हैं..?"
मैने समझ गयी..थोड़ा हंस कर ही कहा.."नहीं."
"फिर आपके रिश्तेदार होंगे वहाँ...आप उनसे मिलने आयीं होंगी क्यूंकि आपको मैने वहाँ देखा है." 
मैने फिर जोर देकर कहा.."मैं कभी गोरखपुर नहीं गयी "
इस पर उस महिला ने मुहँ फुला लिया...और खिड़की से बाहर देखने लगीं...शेष यात्रा चुप्पी में कटी. उन्हें लगा, मैं झूठ बोल रही हूँ. 
ये तो फिर भी ठीक था..वे अजनबी थीं. कुछ देर का ही साथ था. एक बार तो एक 'ब्रैंड न्यू ' रिश्तेदार ही नाराज़ हो गए.
मेरी कजिन की शादी थी. दूल्हा-दुल्हन मंडप में बैठे रस्मे कर रहे थे. मैं बहनों में सबसे बड़ी हूँ..तो थोड़ा सब पर रौब जमा रही थी. फोटो वोटो  खींच रही थी. दुल्हे महाशय अक्सर मेरी तरफ देख लेते. मुझे यही लगता..'मैं शायद इतनी बातें कर रही हूँ..इसलिए वे कयास लगा रहे होंगे कि  मैं रिश्ते में कौन हूँ ?"

शादी के दूसरे दिन...जब इत्मीनान से सबलोग बैठे..परिचय का दौर शुरू हुआ..तो उन्होंने झट से पूछा.."आप दिल्ली में रहती हैं ना..?"
"ना मुंबई में...पर पहले दिल्ली में रहती थी.."
"हाँ, वही तो..मैने आपको दिल्ली में देखा है.."
फिर थोड़ी बातचीत के बाद चला...वे दिल्ली तब आए थे, जब मैने दिल्ली छोड़ दी थी.
वे फिर उलझन में पड़े,पूछा.."..आपके ममी -पापा कहाँ रहते हैं ?? " ये बताने पर कि  'पटना में,रहते हैं'....उनका चेहरा खिल गया.." अच्छाss...फिर  मैने आपको पटना में देखा होगा"
कुछ और बातें करने पर पता चला..रिटायरमेंट के बाद पापा  ने जब पटना में घर लिया तब तक वे जनाब पटना छोड़ 
दिल्ली जा चुके थे.
 पर अपने सारे कयास  गलत होते देख वे बुरी तरह झुंझला गए. रात भर जागने की थकान भी थी. और मेरे साथ इस तरह के वाकये कई बार  होने से मुझे हंसी भी आ गयी. जिसने उनके मूड को खुशनुमा बनाने में कोई योगदान नहीं दिया. वे भी मुहँ फिरा कर दूसरों से बातें करने में व्यस्त हो गए. 

पर इन दो वाकयों से मैंने सीख  लिया...कोई ऐसा कहे..तो हंस कर हामी भर दो.'.अपना क्या जाने वाला है'.:)

पटना साल में एक बार ही जाती हूँ..एक दिन सब्जी लेने गयी...सब्जी वाले को कहा.."अच्छी सब्जी देना."
 कहने लगा.."रोज ही तो मुझसे लेकर जाती हैं...मैने कभी खराब सब्जी दी है,आपको.?." मैं बस मुस्कुरा कर चुप हो गयी...कुछ नहीं कहा.

एक बार मुंबई में भी..मेरी सहेली...समुद्री मछली खरीद रही थी. उसे देने के बाद मछली वाले ने  मुझसे कहा .."आप नहीं लेंगी..आप भी लीजिये.."
सहेली के कहने पर कि ये तो मछली खाती ही नहीं...वो बोला.."क्या भाभी...हमेशा तो ये मुझसे मच्छी लेकर जाती हैं...हैं ना भाभी ? ."
मैने हामी भरी और कहा..'आज नहीं लेना है '
सहेली आश्चर्य से मुझे देख रही थी..मैने उसे चलने का इशारा किया...और फिर सबकुछ एक्सप्लेन किया.

पर ये सब देख कर मेरा मन बहुत रुआंसा हो जाता था, "मेरी इतनी साधारण शक्ल सूरत है...सबको लगता है..कहीं देखा हुआ है." फिर मन को समझाती रंग-रूप तो भगवान की देन  है,उसका क्या गिला करना....जो मिली है उस पर ही  संतोष करके अपने कर्म अच्छे रखो.

पर एक बार एक कहानी में कुछ पंक्तियाँ  पढ़ीं...और दिल सुकून से भर गया.उसमे कहानी के किसी एक पात्र का वर्णन करते हए लिखा था, .."कभी कभी भीड़  में भी कोई चेहरा अपना सा लगता है...देखते ही लगता है...इसे कहीं देखा है ..जाना पहचान चेहरा है. उस चेहरे से अपनापन झलकता है , कुछ ऐसा ही चेहरा था उसका. " (पता नहीं था..कभी ब्लॉग पर ये सब लिखूंगी..वरना..कहानी  और कहानी-लेखक का नाम जरूर याद रखती ) 

और जैसे मेरे खिन्न मन पर शीतल फुहारें पड़ गयीं. इस कथन में कितनी सच्चाई है, नहीं पता..पर मैने अपने दिल को बहलाने के लिए इसे बिलकुल सच मान लिया..:):)

Wednesday, October 3, 2012

यादों की रौशनी की उजास



मौजूदगी से गहरा , मौजूदगी का अहसास है
दूर जाकर, पता चले,  कोई कितने पास है .

सामने  जो  लफ्ज़  रह  जाते  थे, अनसुने
अब अनकही बातों को भी सुनने की प्यास है. 

बेख्याली में फिसल, उड़ गए, गुब्बारों से वो लम्हे
फिर  से  पास  सिमट  आएँ , ये कैसी  आस  है.

मिली होती मुहलत , करने को सतर, जिंदगी की सलवटें 
ना कर पाने की कसक, ज्यूँ दिल में गडी कोई फांस है.

तिमिर की कोशिश तो पुरजोर है,घर कर लेने की
पर दिल में, तेरी यादों की  रौशनी की उजास है. 


ये पंक्तियाँ लिखते वक्त 'वाणी गीत' याद आई...वो अक्सर मेरी कहानियों को पढ़कर कोई कविता रच देती है. 
कुछ ऐसा ही हुआ.सलिल जी की कहानी पढ़ने के पश्चात . जो भाव उपजे वो यूँ  शब्दों में ढल गए. 

हैप्पी बर्थडे 'काँच के शामियाने '

दो वर्ष पहले आज ही के दिन 'काँच के शामियाने ' की प्रतियाँ मेरे हाथों में आई थीं. अपनी पहली कृति के कवर का स्पर्श , उसके पन्नों क...