Tuesday, February 19, 2013

वैवाहिक उम्मीदों की मरीचिका और उपन्यास 'अज्ञातवास'

नारी ब्लॉग पर एक लंबा विमर्श हुआ। रचना जी ने एक लड़के का पत्र  प्रकाशित किया है, उसने पत्र में जो भी लिखा है उसकी मुख्य बातें यूँ हैं,

"मेरे माता-पिता ने तकरीबन 1 साल पहले मेरा विवाह उन्होने बलिया में रहने वाली एक लड़की से तय किया था, मेरी इच्छा नौकरी करने वाली और दिल्ली में रहने वाली लड़की से शादी करने की थी पर मै अपने पिता के आगे नहीं बोल पाया ,उस लड़की का मेंटल मेकप मेरी सोच से बिलकुल नहीं मिलता हैं . उसको खाना बनाना बिलकुल नहीं आता हैं .
मेरे कहने से उसने वेस्टर्न कपड़े पहनने शुरू करदिये हैं लेकिन उसकी बोल चाल मे कोई फरक नहीं हैं .
मै उसे अपने दोस्तों के बीच में नहीं ले जा पाता हूँ क्युकी मुझे उसके बोलचाल का तरीका पसंद नहीं आता हैं . वो साथ में बैठ कर ड्रिंक इत्यादि भी सही तरीके से कम्पनी के लिये भी नहीं ले पाती हैं ..
मुझे उस लड़की मे कोई रूचि नहीं हैं .
मेरे लिये जिन्दगी में क्या ऑप्शन अब हैं ?
क्या मुझे ना चाहते हुए भी इस रिश्ते की आजन्म ढोना होगा ??

अब मेरे लिये क्या जिन्दगी मे सब रास्ते बंद हो गए जो मुझे जीवन साथी से ख़ुशी मिल सके .
आज कल मे सुबह 6 बजे घर से जाता हूँ , और शाम को 10 बजे के बाद आता हूँ

उस लड़के को सबने अपनी अपनी समझ से सलाह दी . वहां सारे कमेन्ट पढ़े जा सकते हैं।
टिप्पणियों में यह भी कहा गया, ये आजकल की आम समस्या है क्यूंकि माता -पिता लड़कों को पढने के लिए तो महानगर में भेज देते हैं पर उनकी शादी छोटे शहर की अपनी पसंद की लड़की से कर देते हैं। जिनका मानसिक स्तर  लड़के से कम होता है और उनकी आपस में नहीं निभती .

पर ये समस्या आजकल की नहीं है। कुछ दिनों पहले ही सतीश पंचम जी ने अपनी पोस्ट में श्रीलाल शुक्ल जी के उपन्यास 'अज्ञातवास' का जिक्र किया है .जिसमे उस उपन्यास का नायक हू ब  हू इसी समस्या से ग्रस्त है .और ये किताब  पचास साल पहले लिखी गयी है।
  इस  उपन्यास का मुख्य पात्र एक विधुर रजनीकान्त है, जिसने कि अपनी पत्नी को इसलिये छोड़ रखा था कि वह गाँव की थी,रहने-बोलने का सलीका नहीं जानती थी। एक दिन जबरी अपने पति रजनीकान्त के घर आ डटी कि मुझे रहना है आपके साथ लेकिन रजनीकान्त ने डांट दिया। उसे साथ नहीं रखने की ठानी लेकिन एक दो दिन करके रहने दिया। रजनीकान्त बाहर जाता तो घर के दरवाजे, खिड़कियां बंद कर जाता कि कहीं बाहर निकली तो लोग इस गंवारन को देखेंगे तो क्या सोचेंगे। दो चार दिन तक ताला बंद करके जाने के बाद कहीं से कोई शिकायत नहीं सुनाई पड़ी तो मिस्टर रजनीकान्त बिना ताला लगाये ऑफिस जाने लगे। उधर क्लब मे इन्हें चिंता लगी रहती कि लोग उनकी पत्नी के बारे में सुनेंगे, उनके शादी-शुदा होने के बारे में सोचेंगे तो क्या सोचेंगे।


  धीरे धीरे रजनीकान्त महाशय कुछ अंदर ही अंदर खिंचे खिंचे से रहने लगे। उधर लोगों को धीरे धीरे पता लगा कि इनकी श्रीमती जी आई हुई हैं। एक दिन उनका मित्र गंगाधर अपनी पत्नी को लेकर इनके यहां आ पहुंचा। मजबूरी में भीतर से पत्नी को बुलवाना पड़ा। ड्राईंग रूम में चारो जन बातें करने लगे। मित्र की पत्नी श्रीमती रजनीकान्त से गांव देहात की बातें पूछतींमकई,आम के बारे में चर्चा करतीं। सभी के बीच अच्छे सौहार्द्रपूर्ण माहौल में आपसी बातचीत चलती रही। श्रीमती रजनीकान्त भी सहज भाव से बातें करती रहीं लेकिन मिस्टर रजनीकान्त को लग रहा था जैसे उनके मित्र की पत्नी जान बूझकर उनकी पत्नी से गांव देहात की बातें पूछकर मजाक उड़ा रही है, खुद को श्रेष्ठ साबित कर रही है। उनकी नजर मित्र की पत्नी के कपड़ों पर पड़ी जो काफी शालीन और महंगे लग रहे थे जबकि अपनी पत्नी की साड़ी कुछ कमतर जान पड़ रही थी। जिस दौरान बातचीत चलती रही महाशय अंदर ही अंदर धंसते जा रहे थे कि उनकी पत्नी उतनी शहरी सलीकेदार नहीं है, गांव की है और ऐसी तमाम बातें जिनसे उन्हें शर्मिंदगी महसूस हो खुद ब खुद उनके दिमाग में आती जा रही थीं।"

पचास साल पहले एक पुरुष के मन में अपनी गाँव की पत्नी को लेकर ये हीन भावनाएं थीं। उसे अपनी पत्नी बिलकुल पसंद नहीं थी लेकिन फिर भी वह उस से शारीरिक सम्बन्ध बनाने से बाज नहीं आया। 
उस उपन्यास में आगे लिखा है," उसके कुछ दिनों बाद एक रात शराब के नशे में अपनी पत्नी से जबरदस्ती कर बैठे। पत्नी लाख मना करती रही कि आपको उल्टी हो रही है, आप मुझसे दूर दूर रहते हैं फिर क्यों छूना चाहते हैं और तमाम कोशिशों के बावजूद पत्नी को शराब के नशे में धुत्त होकर प्रताड़ित किया। अगले दिन रजनीकान्त महाशय की पत्नी ने घर छोड़ दिया और जाकर मायके रहने लगी।
यह उपन्यास 1959-60 के दौरान लिखा गया है . और कहानी -उपन्यास में वही सब आता है, जो उस समय समाज में घट रहा होता है।

आज 2013 में उस लड़के के पत्र  में भी यह जिक्र है , " हम पूरे एक साल में भी कभी एक साथ अकेले कहीं घुमने नहीं गए क्युकी मेरी इच्छा ही नहीं होती उसके साथ कहीं भी जाने की { हनीमून पर हम बस 1 हफ्ते के लिये गए थे }"

यहाँ भी इस लड़के को अपनी पत्नी सख्त नापसंद है, पर उसके साथ हनीमून जरूर मना आया। इसमें उस लड़की का गंवारपन आड़े नहीं आया .

उपन्यास में आगे लिखा है , उधर रजनीकान्त एक अन्य शहरी महिला की ओर आकर्षित हुए जोकि अपने पति को छोड़ चुकी थी। दोस्तों के बीच शराबखोरी चलती रही। इनके दोस्तों में एक फिलासफर, एक डॉक्टर, एक अभियंता। सबकी गोलबंदी। इसी बीच खबर आई कि उस रोज छीना-झपटी और नशे की हालत में हुए सम्बन्ध से पत्नी गर्भवती हो गई है। बाद में पता चला कि एक लड़की हुई है। दिन बीतते गये और एक रोज खबर आई कि पत्नी की तबियत बहुत खराब है। श्रीमान रजनीकान्त किसी तरह अपने उस पत्नी को देखने पहुंचे लेकिन पत्नी बच नहीं पाई। उसका निधन हो गया। अब रजनीकान्त को भीतर ही भीतर यह बात डंसने लगी कि उन्होंने उसकी कदर नहीं की। दूसरा विवाह नहीं किया

आज के युग में भी इस तरह पत्नी को तिरस्कृत करने वालों का यही हाल न हो। पत्नी या तो दुनिया से चली जाती है या आजीवन दुखी रहती है। पर पति भी कोई सुखी नहीं रह पाता 

ये बेमेल विवाह शायद हमेशा से होते आये हैं। लड़के अपनी  पसंद की पत्नी तो चाहते हैं, पर माता -पिता के सामने खुल कर बोल नहीं पाते। ये आदर्श बेटे की इमेज बनाये रखना उन्हें महंगा पड़ता है और उनमें इतना धैर्य और संयम भी नहीं होता, कि गाँव से या छोटे शहर से आयी लड़की को थोडा प्यार से नए तौर-तरीके सिखाएं और अपना आगामी जीवन सुन्दर बनाएं .
और ऐसा नहीं है कि लड़कियों को भी हमेशा मनचाहा पति ही मिल जाता है, पर वे मुहं नहीं खोलतीं। और ख़ुशी ख़ुशी एडजस्ट करने की कोशिश करती हैं .
अंशुमाला ने अपनी टिपण्णी में जिक्र किया है, " व्यापारिक घरानों में अधिकांशतः लडकियां बहुत ज्यादा शिक्षित होती हैं। लड़के अक्सर अपनी पढ़ाई अधूरी छोड़कर दूकान संभालने लगते हैं। ऐसी अनेक शादियाँ होती हैं, जहाँ पत्नी ,पति से ज्यादा  शिक्षित होती है। फिर भी वह सामंजस्य स्थापित कर लेती है। "
वैसे अपवाद दोनों ही स्थितियों में होते हैं .

पर ये बेमेल विवाह तभी रुकेंगे। जब माता-पिता अपनी मर्जी लड़के/लड़कियों के ऊपर नहीं थोपेंगे। लड़के भी संकोच छोड़कर अपनी पसंद की जीवनसंगिनी चुनने में सहयोग करेंगे .

लेकिन सबसे बड़ी बात कि ये बेमेल वाली स्थिति पैदा ही क्यूँ होने दी जाए?? लडकियां क्यूँ हीन रहें?? उन्हें भी लड़कों की तरह महानगर भेजकर पढ़ाया जाए , नौकरी करने के अवसर दिए जाएँ (आजकल हो भी रहा है ,पर बहुत ही कम प्रतिशत में ) फिर उन्हें भी कोई नीचा नहीं दिखा पायेगा . और न ही किसी को उनसे शिकायत होगी।

लडकियां आत्मनिर्भर होंगी तो 'दहेज़ के लिए 'ना' भी कह सकेंगी। वरना अधिक दहेज़ देकर भी अपनी कमतर बेटियों के लिए सुयोग्य  वर ढूंढें  जाते हैं। पर तब लड़कों को कोई शिकायत नहीं होनी चाहिए . लेकिन वे शिकायत तब भी करते हैं, जैसा उस लड़के ने अपने पत्र  में यह भी लिखा है, "  शादी पूरे रीति रिवाजो से हुई थी , यानी दान दहेज़ के साथ . लेकिन वो दान दहेज़ तो सब मेरे अभिभावक के पास हैं और मेरी पत्नी जिस से मेरा सामंजस्य कभी नहीं हो सकता मेरे पास हैं .

वैसे , इसके लिए तो दोषी वही है। पर दहेज़ क्या ज़िन्दगी भर काम आती है ?? शादी का नाम ही सामंजस्य है। चाहे दो लोगो  ने एक जैसी पढाई की हो, एक से वातावरण में पले हों। एक सी आर्थिक स्थिति हो, फिर भी दोनों के स्वभाव  और रुचियाँ अलग होती है . सुख भोगने  की कल्पनाएँ और दुःख  सहने  की क्षमता अलग होती है। इसलिए आपसी सामंजस्य  के बिना कोई भी शादी नहीं निभती .
अदा ने उस लड़के को उचित  सलाह दी है ,
"शादी ही क्यूँ दुनिया का हर रिश्ता समझौता ही होता है, जब तुम अपने माँ-बाप से समझौता कर सकते हो, तो फिर अपनी पत्नी से क्यूँ नहीं। "

Wednesday, February 13, 2013

हमारी पीढ़ी की कशमकश

हमारी पीढ़ी बड़े कशमकश से गुजर रही है। वह नयी पीढ़ी के साथ कदम मिला कर चल रही है, लेकिन पुरानी पीढ़ी के रिवाजों रवायतों का दामन भी नहीं छोड़ना चाहती। पुरानी परम्पराओं को भी बड़े शौक से निभाती है या यूँ कहें  पुरानी पीढ़ी की भावनाओं को ठेस नहीं पहुंचाना चाहती। हाल में ही बहुत करीब से यह सब अनुभव हुआ जब अपनी फ्रेंड के बेटे के हल्दी की रस्म में शामिल हुई।

वही बचपन की सहेली 'सीमा', जो बारह साल बाद मुझे इंटरनेट के थ्रू मिली और उसके मिलने की पूरी दास्तान  मैंने यहाँ लिख दी थी। आप सबने जरूर पढ़ी होगी, और शायद याद भी हो फिर भी मुझे अपनी इस सहेली का परिचय देने में बहुत गर्व महसूस होता है।  बहुत लोगो के लिए वह उदाहरण स्वरुप है। बारहवीं के बाद ही उसकी शादी हो गयी। शादी के बाद उसने बी. ए. , एम. ए. , बी. एड. , एम. एड.  और पी एच डी भी किया। सेन्ट्रल स्कूल में टीचर बनी और अब कटिहार केन्द्रीय विद्यालय की प्रिंसिपल है . 

बेटे की बारात  तो भुवनेश्वर जानी थी, पर सीमा के भाई, माता -पिता मुंबई में ही हैं, बेटे की जॉब भी मुंबई में है, इसलिए शादी से पहले की रस्में यहाँ  करनी थी और मुझे उसमे शामिल होना ही था। (सीमा की ज़िद  तो भुवनेश्वर साथ चलने की भी थी ,पर कई कारणों से वह संभव नहीं हो पाया ) इसलिए समय से मैं, इन रस्मों में शामिल होने के लिए पहुँच गयी।
 सीमा के माता -पिता ,उसके छोटे भाई-बहनों से मिलने के लिए अति उत्साहित थी क्यूंकि सीमा से तो मुलाकात होती रही थी,पर उन सबसे मैं  करीब पच्चीस साल के बाद मिलने वाली थी। माँ ने देखते ही पहचान लिया और मुझे सुकून हुआ,चलो इतना भी नहीं बदली हूँ .

सीमा पूजा की तैयारियों में लगी थी । जैसे ही सीमा और उसके पति पूजा के आसन पर बैठने को हुए। उसकी माँ ने टोक दिया "अरे, दोनों के पैरों में आलता तो लगा ही नहीं है " दोनों ने कहा, 'अब जाने भी दो न " इस बार उसके पिता बोले, "ऐसे कैसे, बेटा का बियाह एक ही बार होता है  न, पैर तो रंगना ही पड़ेगा "
अब मुश्किल थी आलता लगाए कौन? शादी-ब्याह के घरों में ये काम 'नाउन' करती हैं (अब मैं कोई सेलिब्रिटी तो हूँ नहीं कि ऐसा लिखने पर कोई केस कर देगा, वरना जाति सूचक शब्दों का प्रयोग वर्जित है। शाहरुख खान को 'बिल्लू बार्बर' फिल्म में से ऐसे शब्द हटाने पड़े थे ) पर यहाँ तो खुद सीमा दो दिन पहले आयी थी। अकेले बैचलर लड़के के घर में तो कोई काम वाली बाई भी नहीं थी। सीमा की छोटी बहनें ,उसके भाई के फ़्लैट पर से अब तक आयी नहीं थीं। बड़ी बहन आलता लगाने बढ़ी तो माँ ने मना  कर दिया,'वो बड़ी होकर उनके पैर को कैसे हाथ लगाएगी ' .सीमा की बेटी श्रुति ने  रंग की शीशी हाथों में ली तो माँ ने फिर से कहा, "बेटी कहीं पैर रंगती है, थोडा रुक जाओ छोटी बहनें आती ही होंगी।" पर कई सारे रस्म करने थे,देर हो रही थी और सीमा की नज़र मुझ पर पड़ी, "अरे, रश्मि है न ,ये लगा देगी " मैंने भी ख़ुशी ख़ुशी सहेली के पैरों में आलता लगा दिया। पर उसके पति को बहुत झिझक हो रही थी । वे वहां से चले गए .जब बार बार उनकी पुकार होने लगी तो श्रुति ने राज़ खोला, 'वे रश्मि आंटी से आलता नहीं लगवाएंगे ' सीमा ने रौब जमाया 'क्यूँ नेग देने से डर रहे हैं क्या ?' मैं भी अड़ गयी, "ये मौका तो नहीं छोडूंगी ,मनपसंद नेग लूंगी " (शादी-ब्याह में ऐसे हलके-फुल्के मजाक बहुत चलते हैं, माहौल खुशनुमा बना रहता है ) बेचारे किसी तरह झेंपते हुए आकर सावधान की मुद्रा में खड़े हो दूसरी तरफ देखने लगे। वे बहुत ही असहज महसूस कर रहे थे और मैं उनकी असहजता को लम्बा खींचने के लिए और देर कर रही थी .:)

पूजा शुरू हुई तो पंडित जी ने बड़ी बहन से कहा,अगली रस्म के लिए चीज़ें इकठ्ठा कर लीजिये। थोडा 'गाय का गोबर' मंगवा लीजिये। अब तो सब सकते में आ गए .रात  के आठ बजे मुंबई में गोबर कहाँ से  मिलेगा ?
 सीमा ने कहा 'आपने पूजा की सामग्री में तो लिखवाया ही नहीं।, पंडित जी नाराजगी से बोले, 'कहीं गोबर भी लिखवाया जाता है वो तो बगल से कोई भी ले आता है।' अब पंडित जी गाँव से आये थे, उन्हें कोई क्या एक्सप्लेन करे। सीमा ने कहा, ' पूजा के सामान की दुकान पर उपले दिखे ,वो तो मैं अपने मन से ले  आयी,' मेरे  पतिदेव ने उपाय सुझाया," उसमे पानी डाल कर गीला कर दीजिये,वो गोबर बन जायेगा " पंडित जी ने कहा," नहीं, उसे दीवार पर पांच जगह चिपकाना होता है, वो नहीं चिपकेगा " ( मेरे मन में आया, कहूँ, उसके पांच टुकड़े कर फेविकोल से चिपका दिया जा सकता है,पर पता था यह आइडिया खारिज हो जाएगा, इसलिए चुप रही ) पंडित जी ने ऐलान कर दिया 'बिना गाय  के गोबर के 'घिउढारी ' की रस्म नहीं होगी '. इस रस्म में दीवार पर गोबर चिपका कर दूब ,अक्षत, रोली से उसकी पूजा की जाती है और फिर उसपर घी डाला  जाता है इसलिए कहते हैं 'घिउढारी' (घिउ =घी , ढारी =ढालना ) .इसके पीछे कोई कहानी  तो होगी पर मुझे नहीं पता (औरों को भी कितना पता है, ये भी नहीं पता )

खैर फिर विमर्श हुआ कि वाचमैन से पूछा जाए, 'आस पास कहीं तबेला हो तो  ,वहां गोबर मिल जायेगा '. वाचमैन ने बताया, "पास ही एक गाँव है, वहां एक तबेला है ." चन्दा  दी और मैं गाडी ड्राइवर लेकर गोबर  की खोज में निकले। लोगों से रास्ता पूछते , अँधेरे में कच्ची सड़क पर काफी आगे निकल जाने पर एक मंदिर दिखा। हमारे चेहरे खिल गए ,वहां एक गाय बैठी थी। पर गाय को गन्दगी पसंद नहीं थी। वो बिलकुल साफ़-सुथरी जगह पर बैठी थी। गोबर वह तबेले में कर के आयी थी। अब जब हम तबेले तक पहुँच गए तब मुझे ख्याल आया, 'गोबर लेकर कैसे जायेंगे ? हमने तो कुछ लाया ही नहीं था ' ये मुंबई का ड्राइवर उस पर से फैशनेबल युवा (लम्बे बाल थे उसके, हाइलाइट किये हुए ) कहीं गाडी लगा कर कह दे 'आ गया तबेला ,जाइए  गोबर ले आइये ' कल्पना से ही मन सिहर गया। चन्दा दी बड़ी थीं उन्हें कैसे कहूँ, और मैं कोई फिल्म या रियलिटी शो तो नहीं कर रही थी जहाँ हिरोइन्स को ये सब करना पड़ता है (ओंकारा फिल्म में 'कोंकणा सेन' को गोबर से उपले पाथने थे और रिटेक पर रिटेक हुए जा रहे थे। रोते हुए अपनी माँ  'अपर्णा सेन' को फोन किया तो उन्होंने नसीहत दी ,' अभिनय का शौक अपनाया है तो ये सब झेलना ही पड़ेगा '.

मैंने ड्राइवर को मस्का लगाया और DDLJ फिल्म का डायलॉग मारा , "जरा आप  ही लेकर आओ न , कहते हैं शादी के घर में काम करने से सुन्दर लड़की मिलती है " ड्राइवर ने कहा, "मेरी शादी ऑलरेडी हो चुकी है " पर वो चला गया लेने और एक पौलिथिन भर के गोबर ले आया . अब घर पहुंचे तो मैंने कहा, 'दीवार पर पेपर चिपका देते हैं,उसके ऊपर गोबर लगा कर पूजा कर दी जायेगी '.(लड़के ने नया फ़्लैट लिया था , बल्कि पैरेंट्स ने खरीदवा दिया था कि  इधर-उधर पैसे न वेस्ट करे ) पंडित जी तैयार भी हो गए (और जगह भी लोगो ने ऐसा करवाया  होगा ) 
पर सीमा के पिताजी ने कहा, "नहीं, पूजा तो विधिवत दीवार पर ही होगी, क्या हुआ जो दीवार खराब हो जायेगी, फिर से पेंट करवा लेगा, शादी तो एक ही बार होती है ,ये सब शुभ है ' माता--पिता के बीच बैठा 'रिशु ' सर झुकाए बेबसी से सर हिला  रहा था। 

तब तक सीमा की छोटी बहने भी आ गयीं, उनलोगों ने भी मुझे पहचाना लिया था पर हैरान हो गयी थीं, मुझे वहाँ देख। जबकि मैंने तो किसी को नहीं पहचाना . सबको फ्रॉक में देखा था। 'सुषमा' जो तब नवीं कक्षा में थी ,आज उसका बेटा नवीं  में है। डिम्पल पांचवी में थी,और आज एक बेटे को गोद में लिए दुसरे की ऊँगली थामे खड़ी  थी। सब पुराने दिन याद  कर रहे थे। डिम्पल बता रही थी," हमेशा सीमा दी एक चिट्ठी लेकर आपके यहाँ दौड़ा देती .(तब फोन तो थे नहीं,छोटे भाई बहन ही सन्देश पहुंचाने  का काम किया करते थे )  एक बार बारिश हो रही थी,सीमा दी बीमार थी  और मैं छाता लेकर सीमा दी की चिट्ठी आपको देने  आयी थी। मैंने आपसे कहा था, 'सीमा दी अपनी किताबों पर सुन्दर सुन्दर हीरो हिरोइन, फूलो के कवर लगाती है, मुझे नहीं देती 'और आपने धर्मयुग और साप्ताहिक हिन्दुस्तान से कई पेज निकाल कर मुझे दिए थे "(तब हमलोग ब्राउन पेपर खरीद कर किताब कॉपियों पर कवर नहीं लगाते थे) 
सुषमा ने अटकते हुए कहा, "आप रश्मि रवि...रविजा नाम से मैगजीन में लिखती थीं न, अब भी लिखती हैं ?" अच्छा हुआ तीन साल पहले वो नहीं मिली वरना मुझे होंठ बिसूर कर जबाब देना पड़ता ," वो सब तो कब का छूट गया " 

हमलोग बातों में ही थे कि सीमा की भाभी आयी, "चलिए सबलोग 'मटकोर' की रस्म करनी है " इस रस्म में वर, वर की माँ और बाकी महिलायें ,तालाब या नदी के किनारे पूजा करने जाती  हैं। उनमे से दो औरतें सर पर घड़ा लेकर जाती हैं और नदी/तालाब से पानी भरकर सर पर रखकर लाती हैं। सबने मुझे आगे कर दिया। आप सीमा दी की सहेली  हैं,आपको तो सर पर घड़ा लेकर जाना ही होगा। सीमा की भाभी हाथों में सिंदूरदान लेकर आयी और नाक से लेकर सर तक सिंदूर लगा दिया। मैं प्लीज़ प्लीज़ कहती रह गयी पर सबका कहना था, फ्रेंड का बेटा यानि आपका बेटा , ये सब तो करना ही पड़ेगा। 
अब यहाँ नदी तालाब कहाँ, स्विमिंग पूल के किनारे पूजा करना तय हुआ। स्विमिंग पूल भी गैरेज के ऊपर बना हुआ है ,जहाँ कई सीढियां चढ़ कर जाना पड़ता है। स्विमिंग पूल के किनारे पूजा संपन्न हुई। वहीँ पास लगी फूलों की क्यारियों से थोड़ी मिटटी निकाल कर 'मटकोर' की रस्म पूरी की गयी। और स्विमिंग पूल से घड़े में पानी भरकर सर पर लिए हम लिफ्ट से बारहवीं मंजिल पर पहुंचे। 
यह अनुभव भी क्यूँ बाकी रहे, नदी-कुआँ-तालाब से घड़ा भर कर पानी लाना किस्से कहानियों फिल्मो में होता है . हकीकत में तो स्विमिंग पूल से भरा जाता है। :)

एक धान कूटने की रस्म भी होती है। जिसमे वर के साथ पांच औरतें आँगन में ओखली में मूसल  से धान कूटती हैं। यहाँ, बालकनी में स्टील की छोटी सी ओखली मूसल  रखी गयी  जो हर किचन में होती है, उसे छह लोग पकड़ें कैसे? एक ने दो ऊँगली से पकड़ा और बाकी लोगों ने उसके ऊपर अपनी अपनी ऊँगली रख दी। छह लोगों का छोटी सी बालकनी में खड़ा होना ही मुश्किल हो रहा था। चाहे जिस रूप में हो पर रस्में  सारी करनी थीं। बस मंगल गीतों की कमी खल रही थी। किसी को गीत आते ही नहीं। रिशु भी अच्छा बच्चा बने औरतों से घिरा सर झुकाए सारे रस्म चुपचाप किये जा रहा था . हमें तो बहुत मजा आ रहा था . पर ये सब शायद हमारी पीढ़ी तक ही सीमित रह जाए . न तो हमें इतने डिटेल में रस्में याद रहने वाली हैं कि अगली पीढ़ी को बताएं और न ही वो सब ये सारी  बातें मानने वाले हैं। 

वैसे भी यह शादी बहुत अलग सी है। शादी की रस्मों की शुरुआत सीमा ने अपने ससुराल 'दरभंगा' से की। वहां कुल देवता की पूजा की। मुंबई में 'हल्दी - मटकोर' की रस्म की .प्लेन से बारात भुवनेश्वर गयी, जहाँ शादी की रस्में होंगी । और शादी के बाद की रस्मे और रिसेप्शन 'कटिहार' में 

आज 14 फ़रवरी को प्रेम दिवस के दिन दोनों बच्चे विवाह सूत्र में बंधने जा रहे हैं। उन्हें ढेरों आशीर्वाद और असीम शुभकामनाएं .

Wednesday, February 6, 2013

क्या हम पीछे की तरफ लौट रहे हैं ??

कुछ मित्रों ने अपने अनुभव शेयर किये . एक मित्र दफ्तर से छुट्टी ले ,पहाड़ों की तरफ अकेले निकल गए। कोई प्लान नहीं, कोई शेड्यूल नहीं। शिमला, मसूरी, नैनीताल, ऋषिकेश  जिस जगह जब तक मन हुआ रुके और फिर आगे चल दिए। एक और मित्र हैं जो हर सन्डे आस-पास के गाँवों की तरफ निकल जाते हैं। खेतों में घूमते हैं, किसी किसान के साथ हल चलाते हैं, किसान के घर उसके परिवार संग उनका सादा सा भोजन करते हैं। गाँव के बच्चों के साथ पतंग उड़ाते हैं, कंचे खेलते हैं और शाम तक घर वापस।  

इस तरह के शौक बहुत कम लड़कों में ही होते हैं। पर वे अपने शौक पूरे कर तो पाते हैं। ऐसे ही ख्याल आया अगर किसी लड़की के भी ऐसे शौक हों तो क्या वह ऐसे बेधड़क, बेखटके, निडर होकर घूम पाएगी ?? अपनी यह उलझन फेसबुक पर लिख दी और फिर कई लोगो ने तो कहा यह संभव नहीं, वो ज़माना जाने कब आएगा .
 कुछ का यह भी कहना था कि सोचना  नहीं चाहिए निकल जाना चाहिए .अनुराधा मंडल जी ने कहा कि  वे तो अकेले निकल जाती हैं। मनीषा पांडे ने अपनी एक दोस्त के विषय में बताया कि  साइकिल से वो आधा राजस्थान घूम चुकी है।

एक सहेली से चर्चा की तो उसने अपने अनुभव बताये कि आज से बीस साल पहले कॉलेज के दिनों में वो ,उसकी छोटी बहन और दो और सहेलियां कुल चार लडकियां कहीं भी घुमने चली जाया करती  थीं। अचानक प्रोग्राम  बना और बैग उठा धर्मशाला, चंडीगढ़, शिमला ..कहीं भी जाने के लिए वो दिल्ली के बस स्टॉप की तरफ चल देती थीं। उक्त शहर में जाकर भी वे किसी बड़े या फ़ाइव स्टार होटल में नहीं ठहरती थीं बल्कि छोटे होटलों में रुकतीं ,आराम से तीन चार दिन तफरीह करतीं और फिर घर वापस। उनके माता -पिता ने भी उन्हें कभी नहीं रोका . उनके पैरेंट्स को उनपर पूरा विश्वास था। , वे लोग भी उनसे कुछ भी छुपाती नहीं थीं। उन दिनों मोबाइल फोन्स भी नहीं थे . पर पैरेंट्स उनकी सुरक्षा को लेकर आश्वस्त थे। 

पर अब पता नहीं यूँ बेफिक्र हो चार  टीनेज़ लडकियां किसी अनजान शहर में घूम सकती हैं या नहीं। क्या उनके पैरेंट्स उनकी सुरक्षा को लेकर उतने  ही आश्वस्त होंगे ?
तो क्या आज से बीस साल पहले लडकियां ज्यादा सुरक्षित थीं?
 क्या हम पीछे की तरफ लौट रहे हैं ??
जिन हब्बा खातून की शायरी से कश्मीर की वादियाँ गूंजती थीं अब तीन  बच्चियों का  एक बैंड 'प्रगाश ' का निर्माण कुफ्र हो गया। लड़कियों के मोबाइल रखने ,शाम को घर से बाहर निकलने पर पाबंदी। स्कूल के यूनिफॉर्म स्कर्ट और फ्रॉक की जगह सलवार कुर्ते दुपट्टे में बदल गए . लड़कियों पर अंकुश के रोज नए फरमान। 

कुछ लडकियां हिम्मत वाली होती हैं, अकेले कहीं भी चली जाती हैं। किसी ने चूं चपड़ की तो थप्पड़ जड़ देती हैं। ऐसी लड़कियों से सब डरते भी हैं। सीधी सादी लड़कियों को ही छेडछाड, फिकरों का ज्यादा सामना करना पड़ता है ( अपवादों को छोड़कर ) यह बात मैंने भी बहुत पहले ही जान ली थी। सत्रह वर्ष की उम्र में जो कहानी लिखी थी,उसमे भी जिक्र है ," उसे आत्मविश्वास दिया था उसकी ‘जूडो कराटे‘ की ट्रेनिंग ने...इनका इस्तेमाल करने की जरूरत तो नही ंपड़ी लेकिन इसने इतनी हिम्मत जरूर दे दिया कि ईंट का जवाब पत्थर से दे सके। और तब जाना कि लड़के भी छुई-मुई सी कतरा कर निकल जाने वाली... लेकिन इस कतराने के क्षण में भी जतन से सँवारे अपने रूप की एक झलक देने का मोह रखनेवाली लड़कियों को ही निशाना बनाते हैं। किसी ने स्वच्छंदता से खुल कर सामना करने की कोशिश की नहीं कि भीगी बिल्ली बन जाते हैं। 

आज सभी लड़कियों से अपील की जाती है कि वे बहादुर बने, किसी से डरें नहीं, सताने वाले को थप्पड़ जड़ दें, वगैरह वगैरह . पर हर लड़की एक सी नहीं होती। सबका स्वभाव एक जैसा नहीं होता। बस में धक्का लगने पर जहाँ एक लड़की पलट कर एक झापड़ रसीद कर देती है, वहीँ एक दूसरी लड़की खुद में ही और सिमट जाती है। और उसे और भी धक्के खाने पड़ते हैं। पर इसलिए कि वह आगे बढ़कर चिल्ला नहीं सकती, उल्टा थप्पड़ नहीं जड़ सकती ,उसे यह सब सहना पड़ेगा ?? 

यह सही नहीं है। यह स्थिति ही बदलनी चाहिए . लड़कियों के लिए सुरक्षित माहौल होना चाहिए .वे जहाँ चाहें बेखटके आ जा सकें। अंकुश अगर जरूरी है तो लड़के लड़कियों दोनों पर। इन सब बातों पर भी मेरी उस फ्रेंड का कहना था कि तब मोबाईल , टी वी , इंटरनेट का ज़माना नहीं  था। इन सबने युवाओं को और भी करप्ट कर दिया है। कच्चे मस्तिष्क पर इन सबका बहुत ही गलत प्रभाव पड़  रहा है। लड़के/लडकियां दोनों  फिल्मों , सीरियल्स में देखे प्रसंगों को अपने जीवन में उतारने की कोशिश करते हैं। और फिर खामियाजा भुगतते हैं। अदा ने अपनी पोस्ट में एक प्रकरण का जिक्र किया है ,जहाँ लड़कियों ने एक दुसरे की वस्त्रहीन तस्वीरें खींची थीं। उनकी किस्मत अच्छी थी कि उन्होंने एक भले लड़के को मोबाइल रिपेयर करने के लिए दिया और उसने वो तस्वीरें डीलीट कर दीं .किसी गलत हाथों में वो मोबाइल पड़ जाता तो वे लडकियां मुसीबत में पड़ सकती थीं। 

ऐसी हरकतों की एक और वजह हो सकती है, बंधन से आजादी महसूस करने कोशिश। जब ढेर सारे बंधन लगाए जाते हैं तो उन बंधनों के ज़रा सा ढीले पड़ते ही ऐसी हरकतें सामने आ जाती हैं। भेड़ बकरियों को भी अगर बाँध कर रखा जाता है तो दडबा खुलते ही वे सीधी सामने वाले रास्ते पर नहीं चलतीं, इधर उधर भागने लगती हैं। यही बात मानव स्वभाव के लिए भी कही जा सकती है .अगर उन पर विश्वास किया जाए, अनावश्यक बंधन न लगाएं जाएँ तो शायद वो अपना सही गलत खुद तय करें। विद्रोह जताने या यह महसूस करने के लिए कि वे कुछ भी करने के लिए आज़ाद हैं,  कुछ उल्टा-सीधा न करें। क्यूंकि कुछ लोग तो ऐसे होते  हैं जिन्हें बंधन की इतनी आदत पड़  जाती है कि बंधन खोल भी दिए जाएँ फिर भी वे उसी दायरे में घूमते हैं पर कुछ ऐसे भी हैं, जो सरपट भाग  निकलते हैं और नहीं देखते कि राह में खाई है या बड़े बड़े  गड्ढे। 

हालांकि जब कोई हादसा होता है तो उसे अंजाम देने वाले विकृत मनोवृत्ति के होते हैं। हाल में  जो दामिनी के साथ हुआ उन छह नरपिशाचों में से कोई भी इंटरनेट से प्रभावित तो नहीं था। वे स्वभाव से ही अधम थे। 
नयी नयी चीज़ों का आविष्कार होता रहेगा। विकास को तो अवरुद्ध नहीं किया जा सकता . लेकिन उसके इस्तेमाल के लिए बहुत ही सावधानी बरतने की जरूरत है। अगर लापरवाही बरती गयी तो उससे होने वाले फायदे के साथ नुकसान का खतरा भी उठाना ही पड़ेगा। 

हैप्पी बर्थडे 'काँच के शामियाने '

दो वर्ष पहले आज ही के दिन 'काँच के शामियाने ' की प्रतियाँ मेरे हाथों में आई थीं. अपनी पहली कृति के कवर का स्पर्श , उसके पन्नों क...