Monday, July 22, 2013

अनजानी राह

अनिमेष ऑफिस से एक हफ्ते की छुट्टी लेकर अपने घर आया हुआ था . निरुद्देश्य सा सड़कों पर भटक रहा था .उसे यूँ घूमना अच्छा लगताजिन सड़कों पर सैकड़ों बार पैदल चला था...तपती  दोपहरी और ठिठुरती ठंढ में घंटो साइकिल चलाई थी मानो सड़कें भी शिकायत करती हों कि इतने दिन लगा दिए वापस लौटने में . पर बस सड़कें ही जानी पहचानी  रह गयी थींवरना इस छोटे से शहर में बहुत कुछ बदल गया था. मॉल्स ,मैकडोनाल्डस ,बड़े बड़े शो रूम खुल गए थे,, पहले जहां इक्का दुक्का कार नज़र आती थीअब सड़कों पर ट्रैफिक जाम होने लगे थे . बड़ी तेजी से बदल रहा था शहर उसकापर उसे अपना वो पुराना ऊंघता  हुआ  शहर ही प्यारा और अपना सा लगता और अनिमेष ने सर झटक दिया ,’क्या वो अपने शहर को तरक्की करते हुए नहीं देखना चाहता ‘. सामने रघु काका की चाय की दूकान दिख गयीशुक्र हैवो बस वैसी ही थी . सामने लकड़ी के तख्ते पर बिस्कुट के बड़े बड़े डब्बे .और एक तरफ स्टोव पर अदरक-इलायची वाली ,उबलती चाय. स्कूल जाते वक़्त हमेशा  इसी राह से गुजरना होता .जब स्कूल में था,तब चाय तो नहीं पीता थाआदत तो अब भी नहीं थी. पर ये चाय की खुशबू  बड़ी जानी-पहचानी सी लगती और जब भी अपने शहर आताथोड़ी देर बाहर ही खडाइस खुशबू को अपने अन्दर भरता रहता और फिर अन्दर चला जाता.

आज भी थोड़ी देर बाहर खड़े  रहकर जैसे ही अन्दर गया .एक तरफ कुर्सी पर बैठे उसके स्कूल के हिन्दी  सर दिख गए. वे तो शायद उसे नहीं पहचान पाते पर यूँ सामने देखकर कतरा जाना उसे अच्छा नहीं लगा .उसने सामने जाकर 'नमस्ते सर' कहा और सर ने अपनी ऐनक ठीक करते नज़रें उठा कर देखा और आदतन बोल गए...खुश रहो बेटा...कैसे हो ?”

ठीक हूँ सर...आप कैसे हैं ?”
तुssम ..अनिमेष हो न...अच्छाss..अच्छाss..रीयूनियन के लिए आये हो...बहुत अच्छा लगता है,देख कर कि तुमलोग अपने स्कूल को भूले नहीं हो अच्छा रिवाज़ शुरू हुआ है...हमलोग भी अपने पुराने छात्रों से मिल लेते हैं “..सर ने उसे पहचान लिया था .
नहीं सर, मैं तो यूँ ही घर आया हुआ था...हमारी बैच का रीयूनियन है ?मुझे नहीं पता 
कल ही तो है...जरूर आना बेटा....शाम चार बजे हैबहुत सारे स्टूडेंट्स आते हैं...तुम्हें बहुत अच्छा लगेगा सबसे मिलकर...चलो अब चलता हूँ...कितने हुए चाय के..” सर अपने कुरते की जेब में हाथ डालने ही वाले थे कि अनिमेष ने रोक दिया ..सर प्लीsज़...
आगे कुछ कहने की जरूरत नहीं पड़ी...सर हंस दिए..ठीक है ठीक है...आज की चाय तुम्हारी तरफ से...

सर तो चले गए पर वो बड़े पेशोपेश में पड़ गया .वो जाए या नहीं उसे इस रीयूनियन की कोई खबर नहीं थी. खबर भी कैसे होतीवो किसी सोशल नेटवर्क साईट पर तो था नहीं. उसे ये सब फ़िज़ूल का समय बर्बाद करना लगता. जिनलोगों से संपर्क में रहना चाहता उनके फोन नंबर तो उसके थे पास ही .रोज रोज बात नहीं होती पर एक दुसरे की ज़िन्दगी में क्या चल रहा है इसकी खबर होती थी. दो साल पहले रंजन ने बताया तो था ,अनिमेष से  से पूछा भी था बल्कि जोर भी डाला था चलने को. इनलोगों ने फेसबुक पर कोई कम्युनिटी बनाई थी ,अपने स्कूल की और वहीँ रीयूनियन का प्लान किया था .पर उसने मना कर दिया , ‘इतना ज्यादा किसी से मिलने की चाह नहीं थी..और कुछ औपचारिक बातों और बनावटी मुस्कुराहटों के लिए वो छुट्टी लेकर जाएउसे मंजूर नहीं था. बाद में  उसकी अनिच्छा देख फिर रंजन ने भी जिक्र नहीं किया. पर आज तो इसी शहर  में था ,उसके पास समय भी था .उसने तुरंत रंजन को फोन मिलाया ,रंजन  इस बार नहीं आ रहा था पर उसने अखिल का फोन नंबर दिया .जो इस आयोजन का कर्ता-धर्ता  था . अखिल तो उसका नाम सुनते ही उछल पडा..अरे हमारे बैच के स्टार, तुम शहर में हो और किसी को खबर ही नहीं. तुम्हे तो आना ही पड़ेगा .मैं  लेने आउंगा...किसी 'ना' का तो सवाल ही नहीं.

उसने आश्वस्त किया , “ना लेने आने की जरूरत नहीं..मैं खुद समय से पहुँच जाएगा 
अब जब जाने का मन बना लिया तो जैसे वो स्कूल के दिनों में ही पहुँच गया . कितने बेफिक्री भरे दिन थे वेबस पढाई और क्रिकेट दो ही शौक या कहें जूनून था उसके जीवन में .

सारे टीचर्स उसे बहुत मानते थे क्यूंकि मन लगाकर पढ़ाई करता ,समय पर होमवर्क करता ,कोई शैतानी नहीं करता और क्लास में फर्स्ट तो खैर आना ही था . घर आकर स्कूल बैग घर पर पटकता और फिर माँ जो भी देती बिना नखरे के खा कर खेल के मैदान में . क्यूंकि न नुकुर करने में समय बर्बाद होता और उसे अपने खेल का एक मिनट भी बर्बाद करना पसंद नहीं था .अन्धेरा होने के पहले ही घर वापसी .फिर पढ़ाई और खाना खा कर सो जाना .इस रूटीन में कोई बदलाव नहीं आता.

टीचर्स काअपने आस-पास के बड़े बूढों का तो वह बहुत प्यारा था पर उसकी उम्र के बच्चे उसे ज्यादा पसंद नहीं करते ,क्यूंकि हर वक़्त उन्हें अनिमेष का उदाहरण दिया जाता. "देखोकितना अच्छा लड़का है .कितना मन लगाकर पढाई करता है ".स्कूल में भी उस से सब थोडा दूर दूर रहते .सिर्फ परीक्षा के दिनों में उसके आस-पास मंडराते रहते. अनिमेष मैथ्स का ये सवाल समझा दो’, ‘हिस्ट्री के नोट्स दे दो’, ‘जरा ग्रामर में हेल्प कर दो’. लडकियां भी अपने नोट बुक्स लेकर आगे-पीछे घूमती रहतीं. वो सबकी हेल्प कर देता और फिर वहाँ से उठ कर चल देता. किसी से भी जरूरत से ज्यादा बातें नहीं करता. उसे भी गुस्सा आता बस एग्जाम के दिनों में ही सबको अनिमेष की याद आती है.  पर एक बार कुछ ऐसा हुआ कि वो एक दिन में ही स्कूल का हीरो बन गया

एक दिन वह स्कूल से निकल घर की तरफ बढ़ा ही था कि उसके क्लास की अंकिता दौड़ती हुई उसके पास आयी, ‘अनिमेष अनिमेष...देखो न सुरेश को कुछ लोग पीट रहे हैं.’ उसे इन सबमे नहीं पड़ना था फिर भी उसने सोचा कोई मुसीबत में हैउसकी मदद करनी चाहिए . स्कूल के पीछे की तरफ दो लड़के मिलकर एक दुबले-पतले मरियल से लड़के सुरेश को मार रहे थे . अनिमेष ने उनमे से एक से कहा, “दो लोग मिल कर एक को क्यूँ मार रहे हो...जाने दो न उसे 

तुम्हे क्या है..जाओ तुम यहाँ से “ उस लड़के ने उसे परे हटाते हुए कहा .

इस तरह किसी को मारना ठीक नहीं...चलो सुरेश..मेरे साथ चलो..” कहते अनिमेष ने

सुरेश को अपने साथ आने का इशारा किया.
सुरेश ने आशा भरी आँखों से उसे देखा और उठ कर उसकी तरफ बढ़ा .तभी एक लड़के ने सुरेश का कॉलर पकड़ लिया..किधर चला..

अनिमेष के फिर से कहने पर कि छोड़ दो लड़के को..” एक लड़का उसकी तरफ बढ़ा और उसे धक्का देते हुए बहुत ही बदतमीजी से कहा, “ जा जा किताबों में मुहं छुपा कर बैठ...और कुछ बोला तो सारे दांत तोड़ कर हाथ में दे दूंगा..

इतना सुनते ही अनिमेष के अन्दर गुस्से का एक सैलाब उठाउसने थोड़ी दूर पर खड़ी अंकिता को अपना बैग थमाया ,और तूफ़ान की तरह वहीँ से दौड़ते हुए आया और उस लड़के को जोर से धक्का दे जमीन पर गिरा दिया. दूसरा लड़का हतप्रभ रह गया और उसकी तरफ बढ़ा पर अनिमेष पर जैसे गुस्से का भूत सवार हो गया था . ज़िन्दगी में पहली बार किसी ने उस से इतनी बदतमीज़ी से बात की थी .उसके अन्दर जैसे पांच लोगों की ताकत आ गयी थी. वैसे भी घंटो क्रिकेट के अभ्यास से उसका शरीर मजबूत हो गया था. जबकि ये लड़के न तो पढ़ते थे और न ही खेल में कोई रूचि थी उनकी . दो दो साल से फेल हो रहे थे और सारा दिन कोने में बैठ हंसी मजाक करते, फ़िल्में देखने जाते या फिर पत्ते खेलते. उनके शरीर में जान नहीं थी. अनिमेष अंधाधुंध हाथ पाँव सब चला रहा था . उसकी शर्ट के बटन टूट गएशर्ट भी फट गयी . मार-पीट शायद और थोड़ी देर चलती पर इतने में छोटी सी भीड़ इकट्ठी हो गयी थी किसी ने स्कूल में जाकर बता दिया था और दो टीचर दौड़ते हुए आये और बहुत फटकारा उन्हें.

अनिमेष को भी डांट लगाई. अनिमेष ने अपना बैग लिया और घर की तरफ चल पडा.
घर पर छोटे भाई ने पहले ही जाकर बता दिया था .माँ ने डांटा , “अब यही सब करो ..तुम्हे क्या जरूरत थी बीच में पड़ने की...नयी शर्ट भी फट गयी ..
तो क्या करता उस लड़के को मार खाने देता ?? अकेले लड़के को सब पीट रहे थे ...

पर माँ  से तो इतना कह गया...जब शाम को पिताजी ऑफिस से आये ,उनके कानों में भी बात पड़ी और उन्होंने भी डांटा...पर अनिमेष सर झुकाए बस सुनता रहा . मन ही मन सोच रहा था किसी की मदद करना क्या इतनी बुरी बात है ,आज तक सबने तारीफ़ ही की पर अब टीचरमाँ पापा सब डांट रहे हैं . बस छोटा भाई बहुत खुश थासोते वक़्त धीरे धीरे बोल रहा था, “क्या मारा भैया तुमनेउन्हें.... धूल चटा दी...बड़ा मजा आया 

पर सबसे डांट सुनकर अनिमेष का मन खिन्न हो गया थाउसने भाई को डांट दिया ,”सो जाओ चुपचाप 
पर सुबह सुना , पापा बगल वाले शेखर दादा से पापा कह रहे थे..किसी की रक्षा के लिए सामने आना बहुत बड़ी बात है अच्छा किया अनिमेष ने 
शेखर दादा तो पहले ही उसे बहुत मानते थे ,कहने लगे..लोरका तो आपका हीरा है हीरा..

रात का मलाल उसके मन से मिट गया . खुश खुश स्कूल गया तो पाया सबकी नज़रें उसपर ही टिकी हैं. सब कल की ही बातें कर रहे हैं क्लास के लड़के-लड़कियों ने उसे घेर लिया ,”सुना बहुत मारा तूने उन लड़कों को किधर छुपा के रखा था अपना ये रूप..
तुम्हारा बैग कितना भारी है अनिमेष ..क्या क्या भरे रहते हो इसमें..इतनी देर उठाये उठाये मेरे हाथ दुःख गए  अंकिता बार बार ये दुहरा कर सबको जता रही थी कि उसने अनिमेष का बैग उठा रखा था .

उसे इन सबका इतना अटेंशन पाकर ख़ुशी कम नाराज़गी ज्यादा हो रही थी. इतने मन से पढ़ाई करने परहमेशा फर्स्ट आने पर सबने इतनी सम्मान भरी नज़रों से नहीं देखा और ज़रा सी मार-पीट करते ही उसकी इज्जत बढ़ गयी . उसने इन सबको ज्यादा तवज्जो नहीं दी. उसे ज़िन्दगी में बहुत कुछ करना थाबहुत आगे जाना था. उसके बड़े बड़े सपने थे और बहुत जल्दी उसे पता चल गया था ,उन सपनो के ताले की कुंजी थी पढाई’ . अच्छी पढ़ाई से ही उसे आई आई टी  में एडमिशन मिल सकती थी और उसके बाद तो फिर स्काई इज़ द लिमिट ‘ उसने खुद को पढ़ाई में झोंक दिया...अंतिम छः महीने तो उसने क्रिकेट को भी अलविदा कह दिया .

आशानुसार रिजल्ट भी आया .एक प्रतिष्ठित कॉलेज में उसका एडमिशन हो गया .घर से हॉस्टल में आ गया पर इसके सिवा और कुछ नहीं बदला .यहाँ भी वो सिर्फ पढाई से ही मतलब रखता . और जब कोर्स बुक से ऊबता तो लाइब्रेरी की खाक छानता . चार साल कट गए और अंतिम वर्ष में एक बढ़िया कम्पनी में जॉब भी मिल गयी .

अब उसकी असली ज़िन्दगी की जंग शुरू हुई. अब तक सब कुछ बहुत आसान था बस पढ़ाई करना इम्तहान देना और क्रिकेट मैच देखना . किताबों से बाहर की दुनिया उसने देखी नहीं थी और लगा अचानक जैसे किसी अनजान जगह चला आया है. सब कुछ नया सा लगता ,उसे .उसके आस-पास के लोगों का किताबों से कोई नाता नहीं रह गया था .  साथ काम करने वाले हर वीकेंड्स पर पार्टी का प्लान बना लेते .पर उसे इन सबमे कोई रूचि नहीं थी . वो अपनी तरह से अपनी छुट्टियां बिताता .अपने तरीके से शहर घूमता ,कभी भी कोई ट्रेन पकड़ कर किसी छोटे से स्टेशन पर उतर जाता ,फिर वहाँ से किसी गाँव में चला जाता .

एक बार यूँ ही खेत के किनारे खड़ा एक किसान को हल चलाते देख रहा था.  खेत में गोल गोल चक्कर लगाते किसान दो तीन बार पास से गुजरा और फिर पूछ ही लिया.."क्या देख रहे हो भैया ?? " और उसने अचानक से कह दिया.."मैं एक बार हल चला कर देखूं ? "
किसान  हंसने लगा..और इशारे से बुला लिया....पहली बार हल चला कर उसे  बहुत मजा आया. थोड़ी देर बाद किसान बोला, "बस भैया...अब मैं घर जाउंगा...रोटी खाने..." फिर थोडा ठहर कर हिचकते हुए बोला.."आप साथ चलोगे ?"  
किसान ने बैलों को एक बैलगाड़ी में जोता और घर की तरफ चल दिया. अनिमेष भी बैलगाड़ी पर बैठ गया . संकरी सी पगडंडी पर हिचकोले खाती बैलगाड़ी . दोनों तरफ लहलहाते खेत किसी और ही दुनिया का आभास देते. फूस की झोपडी थी पर साफ़ सुथरी .सामने की जगह मिटटी से लीपी हुई थी. एक तरफ एक चारपाई खड़ी की हुई थी. किसान ने चारपाई बिछा दी और बोला, "आप बैठो बाबू ..."
पास ही अमरुद के पेड़ पर चढ़ी दो छोटी लडकियां  दौड़ती हुई पास आ गयी," बाबू आ गए...बाबू आ गए  "
फिर उसे देख सहम कर थोड़ी दूर पर ही ठिठक गयी, वह ,उन्हें पास बुला कर उनका नाम पूछने लगा.
तब तक किसना बैलों को दाना डाल कर चापाकल से हाथ-पैर धोने लगा. 
वह भी हाथ मुहं धोने उठ आया .

हाथ मुहं धोकर आया तो देखा चारपाई पर  दो बड़े से थाल में करारी सिंकी दो मोटी रोटियाँ, चटनी और प्याज रखे थे .किसान  की पत्नी पल्लू को दांतों से पकडे पास ही एक बड़े से लोटे में पानी लिए खड़ी थी . 
"बाबू जो रुखा सूखा हम  खाते हैं वही आपके लिए भी है.."
रोटियाँ और चटनी देख उसे भूख  लग आयी थी...उसे उन्हें धन्यवाद कहना अजीब औपचारिक सा लगा..इसलिए जल्दी से थाली खींच कर एक टुकड़ा रोटी का चटनी में  लगाकर मुहं में डाला और बोला, "बहुत स्वाद है...अच्छी बनी है " और सोचने लगा..स्वाद के लिए बस भूख होनी चाहिए. जिन्हें भूख नहीं लगती, वे ही खाने में स्वाद डालने के सौ जतन करते हैं. जम कर भूख लगी हो तो हर खाना स्वादिष्ट लगता है .और तेज भूख तभी लगेगी जब कड़ी मेहनत की गयी हो .आज उसने भी मेहनत की है तो ये चटनी रोटी भी इतना सुस्वादु   लग रहा है.  उसे चटनी बहुत अच्छी लगी और सोचने लगा, ऐसी चटनी बनाने का जुगाड़ हो जाए तो फिर वो भी सिर्फ रोटी और प्याज से काम चला सकता है. 

खाना खा कर किसान  फिर से खेतों की तरफ जाने लगा . अनिमेष से भी पूछा पर उसने मना कर दिया . वह अभी गाँव में थोड़ा घूमना चाहता था . जाते वक़्त दोनों लडकियां झोपडी के पास लगे छोटे से सब्जियों वाले खेत से उसके लिए एक खरबूजा तोड़ लाई. और शरमाती हुई उसे देने लगीं. उसने बिना ना नुकुर के ले लिया. समझ नहीं पा रहा था , उनका कैसे शुक्रिया अदा करे .बस इतना ही कहा..."यहाँ आकर बहुत अच्छा लगा, फिर आऊंगा " .

थोडा आगे बढ़ा तो कुछ लड़के कंचे खेल रहे थे .उनके साथ थोड़ी देर कंचा खेला. सबके साथ मिलकर खरबूजा खाया .और फिर शाम को शहर लौट आया. ऐसे ही उसने दुनिया देखने का भी प्लान बना रखा था. खूब पैसे जमा करेगा और फिर पेरिस स्विट्ज़रलैंड ,न्यूयार्क नहीं दुनिया के छोटे छोटे शहर देखेगा... कैसी हैं ज़िन्दगी उनकी..कैसे रहते हैं लोग वहां .

 अब तक वह लड़कियों से दूर दूर रहता था. संयोग से कॉलेज में उसके बैच में ज्यादा लडकियां भी नहीं थीं. और उसकी किसी से दोस्ती भी नहीं हुई. पर ऑफिस में लडकियां ही लडकियां थीं . रंग बिरंगी चिड़ियों की तरह चहचहाती रहतीं. अपनी डेस्क पर टिक कर बैठती भी नहीं. उसे  बहुत जल्दी पता चल गया था, ऑफिस के सारे लड़के/लडकियां काम को लेकर बहुत  सिंसियर नहीं है. लडकियां किसी बहाने उससे बातचीत बढ़ातीं और फिर अपना काम उसके सर पर डाल चल देतीं. उसे गुस्सा नहीं आता क्यूंकि उसे बिजी रहना अच्छा लगता था  . पर काम के बाद जो थैक्यू का सिलसिला शुरू होताउस से उसे चिढ़ थी.  

अक्सर उसे वे ओवर फ्रेंडली लगतीं. बात शुरू कर देतींकिसी बहाने से फोन करतींअक्सर चाय-कॉफ़ी के लिए भी साथ जाना पड़ता. अनिमेष समझता था वह और लड़कों से थोडा अलग हैआगे बढ़कर उनसे दोस्ती का हाथ नहीं बढाता. उनसे हंसी मजाक नहीं करता इसलिए वे उसपर भरोसा करती हैं. और करीब आना चाहती हैं ,पर वो भी क्या करेउसकी रुचियाँ उनसे बिलकुल ही मेल नहीं खातीं. किसी भी विषय पर वो एक प्लेटफॉर्म पर होते ही नहींउसे एक्शन मूवीज, साइंस फिक्शन  पसंद आते तो लड़कियों को रोमांटिक फ़िल्में .उसे इंस्ट्रूमेंट बेस्ड म्युज़िक  पसंद था तो लडकियों को बॉलीवुड गाने . .ज्यादातर बातचीत में वो हाँ हूँ ही करता रह जाता और उम्मीद करता कि उसकी हाँ हूँ से बोर होकर वे उस से दूर हो जायेंगी. पर लड़कियों को इतना अच्छा श्रोता कहाँ मिलता उसे ही उनसे दूर  रहने के सौ बहाने बनाने पड़तेकभी मोबाइल स्विच ऑफ कर देता कभी बीमारी का बहाना बनाता . तंग आ गया था पर निजात नहीं मिल रही थी . बस कंपनी चेंज करताशहर बदलता तो थोड़े दिन की राहत मिलती पर फिर वही सारे वाकये सिरे से खुद को दुहराते .


और अब तो घर वाले किसी के पल्ले उसे बाँधने के लिए बेताब थे . बार बार दुहराते ,’उसे नौकरी करते हुए पांच साल हो गए हैं अब तो सेटल हो जाना चाहिए ‘. पर उसे सेटल होने वाली बात समझ में नहीं आती .वो सेटल ही तो थाअपनी मर्जी से अपनी ज़िन्दगी जी रहा था. उसे वो स्टीरियो टाइप ज़िन्दगी नहीं चाहिए थी. पढाई-नौकरी-शादी-बच्चे के चक्कर में नहीं फंसना था .उसे अपनी ज़िन्दगी अपनी तरह से जीनी थी. पर उसकी बात कोई नहीं समझता .अब तो घर आना भी उसने कम कर दिया था ,. 

इस बार तो माँ से कह ही दिया, ‘अगर वो शादी की बात करेगी तो फिर वो घर नहीं आएगा 

माँ का ख्याल आते ही ध्यान आया कब से वो सड़कों पर ही भटक रहा हैअन्धेरा होने को आया ,माँ परेशान होंगी कि कहाँ चला गया. जल्दी जल्दी घर की तरफ कदम बढ़ा दिए.

दुसरे दिन वो समय से अपने स्कूल पहुँच गया. गेट पर ही बैनर लगा हुआ था और सजे-धजे लोग भीतर जा रहे थे ,लग रहा था जैसे कोई उत्सव हो. अखिल गेट पर ही मिल गया ,गर्मजोशी से हाथ मिलाया और फिर गले ही लग गया .और भी दोस्त आस-पास सिमट आये .वो सबको पहचान भी नहीं पा रहा था . दस साल बाद मिल रहा था सबसे . बहुत बदल गए थे सब चेहरा तो फिर भी गौर से देखने पर जाना-पहचाना लग रहा था पर सबके नाम नहीं याद आ रहे थे .अन्दर आकर उसने अखिल से कह भी दिया तो अखिल हो हो कर हंसने लगा..फिकर न कर ..तुझे सब पहचनाते हैं..तेरी सारी खबर है सबकोआखिर स्टार थे हमारे स्कूल के..अब भी नहीं बदले तुम तो. और कैसे बदलोगे अब तक छड़े घूम रहे हो..यार शादी क्यूँ नहीं की अबतक ?”
अब तू भी शुरू मत हो जा...कोई ये सवाल करे तो फिर मैं वहां जाना ही छोड़ देता हूँ..
अरे बाबा कोई नहीं..चिल.. नहीं करेंगे कोई सवाल “ 

अखिल के कंधे पर किसी ने हाथ मारा और अखिल उस से मुड़ कर बातें करने लगा. अनिमेष हॉल में सबका जायजा लेने लगा ,लडकियां जो अब औरतें ज्यादा लग रही थीं एक घेरा बना कर बैठी थीं. कुछ के गोद में छोटे बच्चे थे तो कुछ की उंगलियाँ पकडे बच्चे हैरानी से सबको देख रहे थे . उनके पास में ही एक लड़की कुर्ता जींस में ,गले में बड़े बड़े मोतियों की माला डाले कानों में लम्बे इयर रिंग्स पहने खड़ी थी. उसके काले बालों के बीच एक लट हाई लाईट किये हुए लाल रंग की थी. अनिमेष को यकीन हो गया कि ये लड़की उसके बैच की तो हो ही नहीं सकती .

उसने पास खड़े अमित से पूछ लिया, जूनियर्स भी आये हैं क्या ??
 ” नहीं जुनियर्स तो नहीं पर जिनके भाई-बहन इसी स्कूल में पढ़े हैं और शहर में हैं वे साथ में आये हैं ." अमित ने बताया 

अनिमेष ने सोचा...,’उसके स्कूल से निकल जाने के बाद इतनी फैशनेबल लडकियां पढने लगींबहुत तरक्की कर ली उसके स्कूल ने 

पर उसके वक़्त में लड़के लड़कियों के अलग अलग ग्रुप में रहने का रिवाज आज भी कायम था .आज भी लड़के अलग गोल बना कर खड़े थे और लडकियां अलग घेरा बना कर बैठी थीं . वो लड़कों के साथ खड़ा था. करीब करीब सभी दोस्तों की शादी हो चुकी थी और वे बढ़ते खर्चों और इन्वेस्टमेंट की बातें ही ज्यादा कर रहे थे . वो बस सुन रहा थाउनकी बातों में शामिल नहीं हो पा रहा था .वह थोडा अलग हटकर खिड़की के पास खड़ा हो गया ,जहाँ से स्कूल का मैदान दिख रहा था . वही मैदान जहाँ हज़ारों रन बनाए थे ,सैकड़ों विकेट चटकाए थे और कैच पकडे थे . अब बरसों हो गए बैट थामे. उन दिनों एक अच्छे से बैट की कितनी हसरत थी उसे. दूकान में तीन सौ के बैट को उलट-पुलट कर देखता और फिर रख देताजानता था उसके पिता की सीमित आय में ये शहंशाही खर्च संभव नहीं .आज चाहे तो रोज तीन सौ का एक बैट खरीद कर फेंक दे..पर वो दिन कहाँ से लौटा कर लाये.

इन्हीं सोचों में गुम था कि अपना नाम सुन कर पलटा..सामने वही जींस वाली लड़की खडी थी .कैसे हो..पहली बार आये ही रीयूनियन पर...बिजी रहते होगे 
पर उसकी आँखों में आये अपरिचय के भाव को पढ़ कर हंस दी वह..नहीं पहचाना मुझेअंकिता...तुम्हारी क्लास में थी 

ओह ओके .. उसके क्लास की कैसे हो सकती है...उसकी क्लास में तो सारी लडकियां सलवार कुरता पहनतीं और कंधे पर चौड़ा सा तह किया हुआ दुपट्टा लेतीं थीं या फिर घुटनों तक ढीला ढाला स्कर्ट. और दो चोटियाँ तो सबकी होती थीं.कुछ उसे डबल कर कान के पास बाँध लेतीं उनके कान के पास दो बड़े बड़े लाल फीते के फूल देख उसे हमेशा ही हंसी आ जाती .अगर उसके क्लास की होगी भी तो इतना कैसे बदल सकती है..इसे कोई ग़लतफ़हमी तो नहीं हो गयी.

तभी उसने नाक फुला कर कहा ,“क्या इतनी मोटी हो गयी हूँ कि तुम पहचान ही नहीं रहे 
इन लड़कियों को बस मोटे-पतले की ही चिंता रहती है . नहीं नहीं पहचान लिया ...वो सफ़ेद झूठ बोल गया.

“तुम लास्ट टू रीयूनियन में क्यूँ नहीं आये ?...कितना अच्छा लगता है सबसे मिलकर ..कहाँ से चले थे हम और कहाँ पहुँच गए पर अपने बैच के साथ बड़ी अच्छी बात है , सबकी ज़िन्दगी में पौज़िटिव चेंज ही आये हैं.
अनिमेष को पक्का यकीन हो गया . इसकी शादी जरूर विदेश में हुई है तभी इसका रंग-ढंग इतना बदल गया है. पर ये है कौन ?
वो अपनी रौ में बोलती चली जा रही थी..”क्या दिन थे वे न...कोई फिकर नहीं कोई चिंता नहीं...बस जिए जाओ..खाओ-पियो-पढो  और मस्त रहो...मैं तो वैसे अब भी वैसी ही ज़िन्दगी जीती हूँ पर ये घर वाले और दुनिया वाले राम जाने इनके पेट में इतना दर्द क्यूँ होता है “
“क्यूँ क्या हुआ “..उसे सचमुच समझ नहीं आ रहा था .
‘अरे वही शादी की ‘रट’ जैसे ज़िंदगी की सबसे जरूरी चीज़ है यह. रात-दिन मेहनत करके पढो-लिखो..पैसे कमाओ और फिर जब अपने ढंग से जीने का समय आये तो शादी करके बैठ जाओ .वही घर –गृहस्थी -बच्चे ..मुझे नहीं पड़ना इस जंजाल में “
मुस्कुरा दिया वह .’ये तो उसकी भाषा बोल रही है .’
“हाँ, हंसो हंसो..सबको ये बेवकूफी भरी बात ही लगती है..छोडो तुम नहीं समझोगे और सुनाओ..कहाँ हो आजकल...कैसी हैं तुम्हारी पत्नीश्री और बच्चे “
“हम्म... अब तक उनका पदार्पण तो हुआ नहीं ज़िन्दगी में “
“ओहो !!! शहर के मोस्ट एलिजिबल बैचलर हो तब तो तुम ...हाँ अंकल-आंटी को कोई पसंद ही नहीं आ रही होगी....अक्सर होता है ,पैरेंट्स को लगता है,उनके बेटे के लायक तो कोई लड़की पैदा  ही नहीं हुई...वे लडकियां छांटते चले जाते हैं और बेटे की उम्र बढती चली जाती है...मेरी पूरी हमदर्दी है,तुम्हारे साथ...करो अपनी ड्रीम गर्ल का इंतज़ार “
“ऐसा कुछ नहीं है, ओके ...वो मैंने ही मना कर रखा है...”
‘ओह!! अच्छा ऑफिस में कोई पसंद होगी पर तुम्हारे कास्ट की नहीं होगी ..इसीलिए श्रवण कुमार डर रहें होंगे...माता-पिता को कैसे बताएं ..है न ”
अब उसे बहुत गुस्सा आ रहा था ,वो पहचान भी नहीं रहा है इसे और ये इलज़ाम लगाए जा रही है उस पर . उसने भी उसे झटका देने की सोची...” तुम सचमुच हमारे बैच की हो...पर मैं पहचान नहीं पा रहा “
“बताया तो नाम ‘अंकिता’ . अरे, अब तक थैंक्यू उधार है,तुम पर  ..तुम्हे हीरो बना दिया था पूरे स्कूल का .याद है? टेंथ में वो जो फाईट की थी तुमने दो लड़कों के साथ . मैंने ही तो तुम्हे बुलाया था .तुम तो अपने रास्ते जा रहे थे,नहीं बुलाती तो तुम कैसे फाईट करते और कैसे हीरो बनते  और सारे समय तुम्हारा बैग भी उठा कर रखा था “
“ओह्ह !! “ वो खुलकर मुस्करा दिया .उसे पुरानी अंकिता पूरी की पूरी याद हो आयी. वही कंधे तक लटकती दो चोटियाँ और लम्बी सी स्कर्ट. बिलकुल सींक सलाई सी थी. अब कोई मिलान ही नहीं था इस नयी और उस पुरानी अंकिता में ,
’वो बैग उठाये रखने वाली बात अब तक कितनी बार दुहराई जा चुकी है “हँसते हुए कहा,उसने
“हाँ तो कोई झूठ तो नहीं बोला...”
तभी विजय पास आ गया , “ ये बढ़िया मौक़ा है ,कल मेरे छोटे भाई की शादी है . इतना काम रहते हुए भी मैं सिर्फ सबको इनवाईट करने आया हूँ ,अंकिता...अनिमेष..तुम दोनों को भी आना पड़ेगा. “
“मुझे तो तुम पहले ही बता चुके हो और मैं आ भी रही हूँ...इन छुपे रुस्तम से पूछ लो..”
‘पर मैं तो कल शाम जा रहा हूँ...मेरी छुट्टी ख़त्म हो गयी है..”
“अरे एक्सटेंड कर लो न..इतने सालों बाद मिले हो..अच्छा लगेगा...फिर अगले साल आ पाओ या नहीं...” विजय ने बहुत जोर देकर कहा

फिर सबको खाने-पीने के लिए बुलाया जाने लगा . सब छोटे छोटे ग्रुप में खाने की टेबल की तरफ बढ़ गए. जाने के समय अंकिता पास आयी और कहने लगी..”आ रहे हो न कल..प्लीज़ न मत कहना..तुम रहोगे तो मैं थोड़ी बची रहूंगी..वरना घर परिवार क्या ये सारे दोस्त भी पीछे पड़े रहते हैं... किसी को मैं अपनी पत्नी के भाई तो किसी को अपने पति के भाई के लिए सही मैच लगती हूँ...इनका वश चले तो उसी मंडप में मेरा भी फेरा करवा दें ..तुम कल आ रहे हो बस ..”

उसने मुस्कुरा कर बस इतना कहा ,”देखता हूँ..”

पर घर आया तो एक खुशनुमा अहसास उसे घेरे हुए था .पहली बार उसका भी मन हो रहा था किसी से फिर से मिले ..उसकी बातें सुने ...उसे बस देखता रहे . उसे नहीं पता ,इस राह की कोई मंजिल है भी या नहीं..या है तो कितनी दूर पर सामने जो  राह नज़र आ रही थी उसपर कदम रखने को उसका दिल उस से मिन्नतें  कर रहा था और वह सोच रहा था ,पहली बार दिल ने कोई फरमाइश की है. एक बार उसकी भी सुन लेनी चाहिए. 
.और वह अपनी लीव एक्सटेंड  करवाने के लिए अपने बॉस को फोन मिलाने लगा . 

(समाप्त )


(इस कहानी  के सभी पात्र और घटनाएं काल्पनिक हैं, किसी भी जीवित या मृत व्यक्ति से कोई समानता होने पर इसे मात्र संयोग समझा जाए )

Sunday, July 14, 2013

क़ानून को बदला लेने का हथियार न बनाएं


हाल में ही  एक ऐसी खबर पढ़ी जिसे पढ़कर सुकून आया . आजकल कई केस ऐसे देखने में आ रहे हैं जहां लड़के लडकियां लिव-इन-रिलेशनशिप में रहते हैं. और झगडे, ग़लतफ़हमी किसी भी वजह से आपसी अफेयर  ख़त्म हो जाता है तो लड़की, लड़के के ऊपर रेप का केस दर्ज कर देती है. पुलिस तो नियम के तहत बंधी है, वो लड़के को गिरफ्तार कर लेती  है और इस अपराध में जमानत भी नहीं होती . लड़के को जेल जाना पड़ता है. 

बॉम्बे हाई कोर्ट की जज साधना जाधव ने  ३९ वर्षीय मनेश कोटियन को उनपर तीन साल पहले लगे रेप  चार्ज से विमुक्त कर दिया है ...और तीन साल के बाद उन्हें जेल से रिहा करने के आदेश दे दिए गए हैं. महेश कोटियन का एक लड़की के साथ अफेयर था ,लड़की प्रेग्नेंट भी हो गयी पर फिर उनका सम्बन्ध टूट गया और लड़की ने मनेश पर केस कर दिया, और वे गिरफ्तार हो गए. 

मनेश पर धोखाधड़ी का मुकदमा कायम है क्यूंकि उन्होंने अपने शादी-शुदा और तीन बच्चे होने की बात छुपाई थी. लड़की से पूरी सहानुभूति होते हुए भी उसे दोषमुक्त नहीं कहा जा सकता .गलती उसकी भी बराबर की है क्यूंकि अदालत ने भी इस बात का उल्लेख किया है कि वह चीखी चिल्लाई नहीं और तुरंत उस पर रेप चार्ज नहीं लगाया बल्कि आपसी सम्बन्ध बिगड़ने के बाद  लगाया ,इसलिए लड़के को दोषी नहीं माना जा सकता.

ज़िया खान की ख़ुदकुशी से बहुत दुःख हुआ. एक उभरती हुई ज़िन्दगी असमय ही कालग्रसित  हो गए. पर जिया की  आत्महत्या के  लिए 'सूरज पंचोली' को दोषी ठहराना कहीं से भी उचित प्रतीत नहीं होता.  कच्ची  सी उम्र में उन्हें बीस दिन जेल  की सलाखों के पीछे रहना पड़ा. किस अपराध के तहत ?? अगर प्यार करने का अपराध  था तो ये दोनों ही भागीदार थे. सूरज ने अपनी ज़िन्दगी, जिया के नाम नहीं लिख दी थी कि उसके इशारों पर चले. क़ानून दोषियों को सजा देने के लिए बनाए जाते हैं न कि निरपराधों को परेशान करने के लिए.


एक लड़के और उसके परिवार की पीड़ा बहुत पास से देखी  है, मेरी एक परिचिता के छोटे भाई की शादी हुई पर दोनों की आपस में  नहीं बनी .दोनों ने  डिवोर्स का फैसला ले लिया पर केस तो सालों चलते हैं. इस बीच लड़के ने एक लड़की के साथ मिलकर कोई बिजनेस शुरू किया . दोनों के बीच  प्यार हुआ पर वह लड़की से शादी नहीं कर सकता था क्यूंकि डिवोर्स की कार्यवाई पूरी नहीं हुई थी और उसे अभी डिवोर्स नहीं मिला था. दोनों लिव-इन रिलेशन में रहने लगे . चार साल साथ रहने के बाद उनके आपसी  सम्बन्ध खराब हुए और उस लड़की ने लड़के के ऊपर रेप चार्ज लगा दिया. पुलिस ने लड़के को गिरफ्तार कर लिया. उस लड़की ने मेरी परिचिता ,उसके पति और  और उनके  बच्चों  का नाम भी पुलिस में दे दिया था (डोमेस्टिक वायलेंस या ऐसा ही कुछ चार्ज होगा ) परिचिता  के पति ने पुलिस को पचास हज़ार रिश्वत देकर अपने परिवार का नाम हटवाया. और इस बीच दस दिन तक एक अपराधी की तरह पूरा परिवार पुलिस से छुपता रहा . महीनों जेल में रहा वो लड़का. उसके क्लास वन ऑफिसर पिता जिन्हें रिटायरमेंट के बाद जहां सुकून से अपनी ज़िन्दगी बितानी चाहिए थी. नियमित रूप से बेटे से जेल में मिलने जाते. उनके घर में मातम का माहौल था . फिर आउट ऑफ कोर्ट सेटलमेंट हुआ. उस लड़की को अच्छे खासे पैसे दिए गए .तब उसने अपना चार्ज वापस लिया और लड़का जेल से रिहा हुआ .

अगर लडकियां लिव-इन-रिलेशन में रहना स्वीकार करती हैं या फिर प्यार में सारी  सीमाएं तोड़ देती हैं तो उन्हें इस सम्बन्ध के टूटने के अंदेशे  के लिए भी मानसिक रूप से तैयार रहना चाहिए. मात्र अफेयर में होने से  या लिव-इन -रिलेशनशिप  शिप में होने से वे शादी के लिए दबाव नहीं डाल सकतीं . और अफेयर ख़त्म हो जाने कि दशा में लड़के को सजा देने के लिए इस कानून को हथियार के रूप में इस्तेमाल नहीं कर सकतीं. 

यह एक बहुत ही जरूरी क़ानून है और हज़ारों लडकियां जो रेप का शिकार होती हैं ,उनके अपराधी को इस क़ानून के सहारे सजा दिलवाई जा सकती है. इस क़ानून को और सख्त बना कर इसका आतंक पैदा किया जा सकता है. लेकिन इसे बदला लेने का हथियार बना ,क़ानून का माखौल नहीं उड़ाने दिया जा सकता. बॉम्बे हाई कोर्ट का यह फैसला  स्वागतयोग्य है.

Sunday, July 7, 2013

ख़ामोश इल्तिज़ा

(मन हो तो ये कहानी पढ़ लें या फिर निलेश मिश्रा जी की गहरी भावभरी आवाज़ में सुन लें )

तन्वी बालकनी में खड़ी सामने फैले स्याह अँधेरे को घूंट घूंट पीने की कोशिश कर रही थी ,सोचती कुछ ऐसा जादू हो कि वो स्याह अँधेरे में गुम हो जाए और फिर कोई उसे देख न पाए. तभी मोबाईल पर मैसेज टोन बजावो चेक करने नहीं गयीपता था सचिन का मैसेज होगा, "पढ़ लिया न मेरा मैसेज ,अब जरा मुस्करा दो . सचिन का पहला मैसेज पढने के बाद ही बालकनी में आयी थी. और पता था वो दूसरा मैसेज यही भेजेगा . सचिन उसके ऑफिस में हाल में ही आया है ,पर अक्सर टूर पर रहता है. पूरे देश में घूमता रहता और जहां भी जाता है वहां से उसे मैसेज जरूर करता है, कुछ ख़ास नहीं बस उसकी खिडकी से जो भी नज़ारा उसे दिखता है ,वो लिख भेजता है .कभी लिखता , ‘बर्फीली चोटियों पर चाँद की किरणें ऐसे पड़ रही हैं कि सबकुछ नीले रंग में नहा उठा  है ,काश तुम देख पाती कभी राजस्थान के सैंड ड्यून्स का वर्णन करता , कभी काले घुमड़ते बादलों का ,कभी दहकते गुलमोहर का तो कभी पछाड़ खाती समुद्र की लहरों का . एक बार ताजमहल देखने गया तो सिर्फ इतना मैसेज लिखा...वाह ताज !!  ताजमहल को देखा और तुम याद आयी वो किसी मैसेज का जबाब नहीं देती .और सचिन ये बात जानता था .एक बार मैसेज में ही लिखा था , ‘मेरा फोन तो उठाओगी नहीं पर जानता हूँ मैसेज जरूर पढ़ोगी और पढ़ कर मुस्कुराओगी भी ‘.

सचिन बहुत ही जिंदादिल और हंसमुख लड़का था . जितने दिन भी ऑफिस में रहता रौनक आ जाती ऑफिस में. लडकियां तो उसके आस-पास ही मंडराती रहतीं. लड़के भी उसके अच्छे दोस्त थे. अक्सर शाम उन सबका  किसी पार्टी का प्लान बन जाता. वो हमेशा की तरह बस अपने काम से काम रखती और फिर ऑफिस के बाद सीधा घर . शुरू में सबने उसे भी शामिल करने की कोशिश की थी. पर हर बार उसकी ना सुन कर उसे अपने हाल पर छोड़ दिया था .सचिन ने भी हर संभव कोशिश की ,साथ चाय कॉफ़ी लंच का आग्रह ,उसे घर छोड़ देने की पेशकश पर हर बार वो सिर्फ हल्का सा मुस्कुरा कर सर हिला कर ना कर देती . एक बार सचिन ने उसे कह ही दिया , “आपको पता है, आपने अपने चारो तरफ एक  दीवार उठा रखी है, पर यह दीवार दूसरों  को बाहर रखने से ज्यादा आपको अन्दर बंद रखेगी...बहुत घुटन होगी...एक छोटी सी खिड़की तो खोलिए ,थोड़ी ताज़ी हवा आने दीजिये
आपकी बातें मेरी बिलकुल समझ में नहीं आ रहीं...ये काम निबटा लूँ ज़रा कब से पेंडिंग पड़ा है और तन्वी ने कंप्यूटर स्क्रीन पर नज़रें गड़ा दीं.
कोई बात नहीं ,हम भी छेनी हथौड़ा लेकर इस दीवार को गिरा कर ही रहेंगे .उसकी तरफ एक मुस्कुराहट उछालता सचिन चला गया वहाँ से .

वो बेतरह डर गयी , अगर सचिन ज्यादा से ज्यादा टूर पर नहीं होता तब शायद वो रिजाइन ही कर देती. अब किसी के करीब जाने या किसी को अपने करीब आने देने की हिम्मत नहीं बची थी उसमे. दो दो बार धोखा खा कर उसका दिल छलनी हो चुका था.

*** 

सिड तन्वी की बिल्डिंग में रहता था और उसके ही स्कूल में था . कब साथ खेलते पढ़ते उनके बीच प्रेम का अंकुर फूटा, अहसास भी नहीं हुआ. पर धीरे धीरे वो अंकुर एक पौधे का रूप ले चुका था और उसमे फूल खिल आये थे, जिसकी खुशबु पूरी बिल्डिंग में फ़ैल गयी थी . सबको पता चल गया था , बात तन्वी के माता-पिता तक भी पहुंची .लेकिन तन्वी की शादी को लेकर उसके माता- पिता ने बड़े बड़े ख्वाब बुन रखे . लम्बे बालों वाला, कलाई में ब्रेसलेट पहने ,हाथों पर टैटू बनवाये ,म्युज़िक को ही अपनी ज़िन्दगी समझने वाला सिड कहीं से भी उन सपनों पर खरा नहीं उतरता था .तन्वी ने हिम्मत दिखाई , ‘सिड के साथ भाग जाने को भी तैयार थी .पर सिड ने ही कदम खींच लिए .उलटा उसे समझाने लगा , ‘हम कहाँ रहेंगे ,कैसे घर चालायेंगे ,मेरे कैरियर  का क्या होगा?’ तन्वी ने कहा भी, ‘वो नौकरी कर लेगी, सिड आराम से अपना कैरियर बना सकता हैलेकिन सिड उलटा उसे समझाने लगा , “तुम कितना कमा लोगी कि हम अलग रह कर घर भी चला सकें और मैं अपने शौक भी पूरे कर सकूँ. एक गिटार की कीमत पता है?? और उसकी क्लासेज़ की फीस ?? मुझे अभी बहुत कुछ सीखना है तन्वी...कितनी मिन्नतें करनी पड़ती हैं ,तब जाकर पापा पैसे देते हैं. अगर तुम्हारे पैरेंट्स नहीं मान रहे तो फिर हमें एक दुसरे को गुडबाय कह देना चाहिए

सिड की ये बातें सुनकर तन्वी ने फिर कुछ नहीं कहा, ‘उसे भीख में प्रेम नहीं चाहिए था ‘ .पर इस घटना ने पता नहीं उसके पैरेंट्स पर क्या असर डाला कि वे तन्वी की शादी के लिए जल्दबाजी मचाने लगे. चुपचाप रिश्तेदारों से मिलकर एक लड़का ढूंढा गया और मुम्बई से बहुत दूर वह इस शहर में ब्याह दी गयी. तन्वी के एतराज जताने पर माँ से सुनने को मिला, “पहले ही बहुत गुल खिला चुकी हो...इसके पहले कि हमारे मुहं पर कालिख पुते, अपना घर –बार संभालो “.

तन्वी को भी अपने पैरेंट्स पर बहुत गुस्सा आया और उसने भी सोच लिया..ठीक है वह ,अब अपना घर बार ही संभालेगी ,पलट कर उन्हें नहीं देखेगी उसने पूरे तन-मन से अपने पति को अपनाया . पर उसकी किस्मत ने यहाँ भी धोखा दिया. उसके पति को एक साथी नहीं एक केयर टेकर चाहिए थी. उनकी ज़िन्दगी शादी से पहले जैसी चल रही थी, उसमे शादी के बाद भी कोई बदलाव नहीं आया . वही ऑफिस के बाद दोस्तों के साथ समय बिताना . शनिवार की रात जमकर शराब पीना और फिर सारा सन्डे सो कर निकालना . अगर तन्वी कुछ कहती तो गालियाँ मिलतीं . एक बार तन्वी ने तेज आवाज़ में एतराज जताया तो पति ने हाथ भी उठा दिया . इसके बाद तन्वी सहम सी गयी , अपने माता-पिता से शिकायत की तो उन्होंने कहा , “वक़्त के साथ सब ठीक हो जाएगा थोड़ा बर्दाश्त करो पर वक़्त के साथ ठीक कुछ भी नहीं हुआ बल्कि पति और भी ढीठ हो गया . तन्वी के पति को खुद के एक छोटे शहर से होने का बहुत कॉम्प्लेक्स था .वे अक्सर तन्वी को बड़े शहर वाली , बॉम्बे वाली कहकर ताना दे जाते. फिर भी तन्वी इस शादी को कामयाब बनाने की कोशिश में जुटी रही. पर जब उसका मिसकैरेज हुआ और उसके बाद भी पति ने एक दिन भी छुट्टी नहीं ली, उसे हॉस्पिटल में छोड़ वैसे ही ऑफिस चला गया तब तन्वी बुरी तरह टूट गयी. उसे इस शादी से कोई उम्मीद नहीं बची.

दो तीन महीने तो वो डिप्रेशन में ही रही. फिर उसके बाद खुद को ही धीरे धीरे समेट कर ज़िन्दगी पटरी पर लाने की कोशिश करने लगी. रोज अखबार में नौकरी वाले कॉलम देखती,लाल निशान लगाती और बिना पति को बताये इंटरव्यू दे आती. पर कहीं उसे नौकरी पसंद नहीं आती कहीं क्वालिफिकेशन के अभाव में वो रिजेक्ट कर दी जाती. कहीं दोनों पसंद आते तो सैलरी इतनी कम होती कि इतना मर खप कर नौकरी करना उसे नहीं जमता. फिर उसे इस कंपनी में मनलायक नौकरी मिली.

पति से पूछा नहीं बस उन्हें बताया . सुनने को मिला, “हमारे खानदान की औरतें नौकरी नहीं करतीं

उसने पलट कर तुरंत ही कहा और हमारे खानदान के पुरुष शराब पीकर औरतों को नहीं पीटते
शायद नयी जॉब ने ही उसे इतना कहने की हिम्मत दे दी थी . पर पति का इगो बहुत हर्ट हुआ और वे रोज सुबह शाम ताने कस कर बदला लेने लगे , तैयार होते देख व्यंग्य करते ,”इतना सजा धजा किसके लिए जा रहा है ,बॉस  बहुत हैंडसम है क्या ?”
रोज देर से आने वाले पति अब जल्दी आने लगे थे . जिस दिन उसे देर हो जाती सुनने को मिलता, “ ऑफिस के बाद कॉफ़ी-शॉफी पीने चली गयी होंगी , नौकरी बचाए रखने को ये सब करना पड़ता है...रोज देखता हूँ मैं, यह सब  “

अपने होंठ सिल कर वो सारे काम किये जाती. अपने माँ-बाप के मन का हाल जानती थी . उन्हें अगर पता चल जाता कि उसके पति को उसका जॉब करना पसंद नहीं तो शायद जबरदस्ती छुड़वा देते. इसलिए बिना पति के किसी ताने  का जबाब दिए वह सारे काम करती और ज्यादा से ज्यादा उनसे दूर रहती. बस ऑफिस का काम ही उसके लिए जीने का सहारा था. उसने बहुत मन लगाकर काम सीखा. ऑफिस के पौलिटिक्स, गॉसिप से भी दूर रहती, मेहनत से काम करती. इस वजह से ऑफिस में उसकी बहुत इज्जत भी थी .

कभी कभी तलाक लेने के विषय में सोचती भी पर फिर खुद को ही समझा देती, “क्या फर्क पड़ जाएगा तलाक लेने से ,आज भी एक छत के नीचे अजनबी की तरह ही रह रहे हैं, आगे भी अजनबी ही रहेंगे पर एक दिन वो घर की चाबी ले जाना भूल गयी थी. ऑफिस में ऑडिट चल रहा था, उसे घर आने में देर हो गयी. कई बार घंटी बजायी पर उसके पति ने दरवाजा नहीं खोला. पूरी रात उसने सीढियों पर बैठ कर बिताई . और वहीँ बैठे बैठे एक निर्णय ले लिया. सुबह दूध वाले, पेपर वाले न देख लें इस डर से पति ने दरवाजा खोल दिया . वह अपने कमरे में जाकर सो गयी . उस दिन ऑफिस से छुट्टी ले ली. और सारा दिन घर ढूँढने में बिताया . शाम को सामान बाँधा पति के आने का इंतज़ार किया पति का रिएक्शन था ,“ हाँ ,ठीक है..जाइए जाइए..मैं भी डिवोर्स दे दूंगा..दूसरी शादी करूंगा

आप शौक से दूसरी तीसरी जीतनी मर्जी हो शादी कीजिये मुझे आपके डिवोर्स पेपर का इंतज़ार रहेगा “  कह वह बाहर निकल आयी.

उसके बाद से ही उसकी ज़िन्दगी एक शांत झील की तरह हो गयी है. सीमित दायरे में कैद...न उसमें कोई तरंग उठती है न किनारे  टूटने का कोई डर होता है. ऑफिस से आना देर रात किताबें पढना , गज़लें सुनना .इतना सुकून शायद उसकी ज़िन्दगी में कभी रहा भी नहीं. पर जब से सचिन ने ऑफिस ज्वाइन किया है वो लगातार इस शांत झील में कंकड़ फेंकता जा रहा  है. थोड़ी देर को तरंगें उठती हैं पर फिर झील की सतह वैसे ही शांत हो जाती है. पर अब झील के तल में इतने कंकड़ जमा हो गए थे कि उनकी चुभन , झील को तकलीफ दे रही थी .

***

सचिन भला लड़का था, तन्वी को उसका अटेंशन पाकर अच्छा लगता था.पर प्यार और शादी में दो बार धोखा खा चुकी तन्वी, सचिन को करीब आने देने से डर रही थी. उसे यह भी लगता, सचिन को उसके पास्ट के बारे में मालूम नहीं है, इसीलिए वह उसकी तरफ आकर्षित है. जैसे ही सचिन को सच्चाई पता चलेगी ,वह उस से खुद ब खुद दूर हो जाएगा ,इसीलिए वह सचिन से दूर दूर ही रहती पर सचिन के बार बार आते sms ने उसे उलझन में डाल दिया था. और उसने सचिन से मिलकर उसे सबकुछ साफ़ साफ़ बता देने का फैसला किया. उसे विश्वास था सचिन को उसके बारे में कुछ भी पता नहीं अगर वो अपना सारा पास्ट उसे बता देगी तो वो बात समझ जाएगा और फिर उस से दूर हो जाएगा . कुल जमा अपनी चौबीस साल की ज़िन्दगी में तन्वी ने इतना कुछ देख लिया था कि उसे अब अपनी ज़िन्दगी में और उथल-पुथल गवारा नहीं थे.

उसने सचिन को मैसेज किया , “कब वापस आ रहे हो टूर से ?”

वाsssऊ... कांट बीलीव, तुम पूछ रही हो...बस अभी एयरपोर्ट की तरफ निकलता हूँ , सुबह तक कोई न कोई फ्लाईट मिल ही जायेगी और फिर डेढ़ घंटे में आपके सामने हाज़िर
मजाक छोडो ..सच बताओ...तन्वी ने फिर से मैसेज किया .
आई शपथ...सच कह रहा हूँ
ठीक है मैं कल ऑफिस में पता कर लूंगी...
और इस बार सचिन ने मैसेज की जगह कॉल ही किया. थोड़ी देर फोन घूरती रही तन्वी फिर उठा कर जैसे ही हलोकहा, सचिन का चिंता भरा स्वर सुनायी दिया, “क्या बात है तन्वी...कुछ परेशानी है...मैं मजाक नहीं कर रहा ,सच में कल आ सकता हूँ “ 
दिल भर आया तन्वी का थोडा रुक कर बोली , कि कहीं आवाज़ का कम्पन पता न चल जाए . कोई परेशानी नहीं बाबा....बस ऐसे ही कुछ बात करनी है
आज तो मेरे सितारे खुल गए ...तुम्हे मुझसे बात करनी है ?? जो सामने देख कर भी मुहं घुमा लेती है आज उसे मुझसे बात करनी है...ओह!! सचमुच यकीन हुआ, खुदा है इस जहां में वरना मेरी दुआ कैसे क़ुबूल हो जाती...
अब ये डायलॉगबाज़ी बंद करो...तुम्हारे आने के बाद कॉफ़ी पर मिलते हैं..चलो गुडनाईट
अरे !! इतनी जल्दी क्या गुडनाईट...अभी तो बात की शुरुआत है..फिर मुलाक़ात होगी और फिर...
मैं सोने जा रही हूँ..गुडनाईट
मैं परसों आ रहा हूँ तन्वी...सीधा ऑफिस ही आउंगा उसके बाद मिलते हैं...गुडनाईट एन यू प्लीज़ टेक केयर...बाय इस बार सचिन का स्वर गंभीर था .
यू टू...बाय तन्वी ने फोन रख दिया पर अब आँखों में नींद कहाँ थी. पहली बार सचिन से इस  तरह खुलकर बात हुई थी और दोनों ही अपनेआप तुम पर आ गए थे . शायद उसके लगातार आते मैसेज ने आप वाली अजनबियत हटा दी थी .देर रात तक ताने बाने बुनती रही कि कैसे बात की शुरुआत करेगी क्या क्या बताएगी, सचिन का क्या रिएक्शन होगा.

सचिन दोपहर बाद ऑफिस में आया . बाल बिखरे हुए थे . चेहरे पर थोड़ी परेशानी की लकीरें दिख रही थीं अब वे सचमुच थीं या तन्वी की कल्पना कहना मुश्किल था. दूर से ही उसकी तरफ बड़ी गहरी नज़रों से देखते हुए बहुत ही अपनेपन से मुस्कुरा दिया .लेकिन उसकी डेस्क के पास नहीं आया ,शायद उसकी असहजता भांप रहा था . छः बजे के करीब उसके पास आकर धीरे से बोला, “कहीं इरादा बदल तो नहीं दिया ?”
उसने भी मुस्करा कर सर हिला कर कह दिया .
फिर कहाँ चले कॉफ़ी के लिए
वो बीन्स एंड बियोंड ‘ है न ..ऑफिस से ज्यादा दूर भी नहीं.
दूर के लिए कोई बात नहीं, कार लेकर आया हूँ...अब इतनी मुश्किल से मौक़ा मिला है ,जितनी देर का साथ मिल जाए ,घर भी  छोड़ दूंगा ..इसी बहाने घर भी देख लूंगा...फिर तो जब मन हुआ डोरबेल बजायी जा सकती है शरारत से मुस्कराया सचिन .
तन्वी ने त्योरियां चढ़ाईं तो हंस दिया  ,”मजाक था बाबा ..समझा करो .अब सब समेटो मैं बाहर इंतज़ार कर रहा हूँ .
सचिन के जाने के बाद तन्वी सोचती रह गयी, पहली बार ऐसे भरपूर नज़र डाली थी सचिन के चेहरे पर सचमुच दिलकश है मुस्कान उसकी..इसीलिए लडकियां मरी जाती हैं..फिर कंधे उचका दिए..उसे क्या , आज तो उसे सब बता देगी फिर सच जानकार सचिन खुद ही उस से सौ फीट की दूरी रखेगा

सचिन कार में वेट कर रहा था .जगजीत सिंह की नज़्म बज रही थी, “बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जायेगी...”तन्वी कहने वाली थी ,’मेरी फेवरेट नज़्म है यह ‘ फिर खुद को ही झिड़क दिया, “वह दोस्ती बढाने नहीं, ख़त्म करने आयी थी. फिर एक ठंढी सांस भी ली, “अब बात दूर तलक क्या जायेगी...हमेशा हमेशा के लिए ख़त्म हो जायेगी .सचिन ड्राइव करते हुए चुप सा था. शायद उसके भी मन में चल रहा था, क्या कहने वाली है वह रास्ते में बस ट्रैफिक मौसम की बाते होती रहीं. जब बीन्स एंड बियोंडनिकल गया तो तन्वी ने उसकी तरफ देखा .सचिन ने सड़क पर नज़रें जमाये हुए ही कहा, ‘यहाँ बहुत भीड़ होती है...आगे चलते हैं न सुकून से दो पल बैठेंगे

अच्छी जगह चुनी थी सचिन ने, बड़े बड़े आरामदायक चेयर्स थे . हलकी सी रौशनी थी और लोग भी बहुत ज्यादा नहीं. वो भी पैर फैलाकर रिलैक्स होकर बैठी थी . बस बात कैसे शुरू करे यही सोच रही थी . 
सचिन ने मेन्यु कार्ड पर नज़र घुमाते हुए पूछा , “क्या लोगी...
बस कॉफ़ी...
चिली टोस्ट ट्राई करो बड़ी अच्छी होती है यहाँ की" कहते उसने चिली टोस्ट और और कॉफ़ी ऑर्डर कर दिया था .तन्वी ने बात जारी रखने को कहा, ‘अक्सर आते हो यहाँ ?”
अब कहाँ वक़्त मिलता है..महीनों बाद आया हूँ, कॉलेज के दिनों में अक्सर आता था
गर्ल फ्रेंड्स के साथ ?” उसने छेड़ा
हाँ, गर्लफ्रेंड्स के साथ...जलन हो रही है ? “ सचिन ने भी हंस कर उसी सुर में जबाब दिया .
मुझे क्यूँ जलन होगी ? “,उसने तेजी से कहा .
हाँ, तुम्हे क्यूँ जलन होगी...ऐसा है ही क्या हमारे बीच सचिन कुछ गंभीर हो गया था .
तन्वी को सूझा नहीं क्या जबाब दे ..अच्छा हुआ उसी वक़्त कॉफ़ी आ गयी.
टोस्ट कुतरते कॉफ़ी के घूँट भरते दोनों ही चुप थे सचिन शायद इंतज़ार कर रहा था ,वो अपनी बात शुरू करे
आखिर तन्वी ने बात शुरू की , “सचिन तुम्हारे एस.एम.एस आते हैं..मैं रिप्लाई नहीं करती...मुझे अच्छा नहीं लगता
मुझे भी ये अच्छा नहीं लगता ...सचिन ने कप रखते हुए उसकी आँखों में सीधा देख मुस्कराते हुए कहा. 
वो थोड़ी असहज हो गयी लेकिन फिर संभाल लिया खुद को , “ देखो इसकी एक वजह है ...मैं सिंगल नहीं हूँ
ओह! आई सी...
नहीं मेरा मतलब सिंगल तो हूँ..पर वैसी सिंगल नहीं ...एक्चुअली आयम अ डीवोर्सी
सो ??”..सचिन ने कंधे उचका दिए
तुम्हे कोई फर्क नहीं पड़ता ???” उसे अचरज हुआ
क्या फर्क पड़ना चाहिए ...और ये बात मुझे पता है “ सचिन ने कंधे उचका दिए .
क्याsss ??..वो जैसे आसमान से गिरी . तुम्हे कैसे पता ??”
मैडम हमलोग इन्डियन हैं और हमारा फेवरेट टाईमपास है गॉसिप...याद नहीं पर किसी ने बहुत पहले ही बताया था
और तुम्हे लगा ये तो अवेलेबल है ,इसपर चांस मारा जा सकता है ?“ ये जानकार कि सचिन को ये बात पहले से पता है तन्वी को बहुत गुस्सा आ रहा था
व्हाssट ??..सचिन इतने जोर से चौंका कि थोड़ी कॉफ़ी उसके पैंट पर छलक ही गयी .
हाँ !! तुमने यही सोचा ये तो डीवोर्सी है...अकेली रहती है....इसके साथ टाईमपास किया जा सकता है ...रात बिरात मैसेज भेजा जा सकता है ऑफिस में उसके पीठ पीछे लोग उसकी बातें करते हैं ये जान उसे बहुत गुस्सा आ रहा था और वो इसका बदला सचिन से ले रही थी.
तन्वी..आयम सॉरी... आयम रियली रियली सॉरी...मैं तुम्हें कैसे यकीन दिलाऊं मैंने ऐसा कभी नहीं सोचा...और मुझे भी नहीं पता तुम मुझे इतना अवॉयड करती थी फिर भी मुझे तुमसे बात करना ,अच्छा लगता था. पता नहीं तुम्हे देख कर क्यूँ लगता कि तुम एक शांत झील सी हो, एक सीमित दायरे में कैद जबकि तुम्हे एक चंचल नदी बनकर बहना चाहिए. मैसेज इसलिए भेजता कि कहीं भी कुछ अच्छा  देखता तो मुझे तुम्हारा ख्याल आ जाता. मन होता ,वो जगह तुम्हारे साथ देखूं, बस इतनी सी बात है तन्वी और कुछ नहीं
यही होता है... डीवोर्सी के साथ अवेलेबल का टैग अपने आप लग जाता है....इसीलिए मैं सबसे इतनी दूरी बना कर रखती हूँ और देखो तुम्हें भी मालूम था फिर भी तुम मेरे करीब आने की कोशिश करते रहे, मुझसे दोस्ती बढाते रहे तन्वी की आँखें छलछला आयीं .
सचिन कुछ कहने जा रहा था पर उसकी भीगी आँखें देख चुप हो गया , कुर्सी से पीठ टिका दी ...एक गहरी सांस ली...फिर पूछा , “तो तुम क्या चाहती हो...मैं तुमसे दूर रहूँ ??”
हाँ ..आँखों में जलते हुए आंसू लिए हुए जैसे बच्चों की तरह एक जिद से कहा .
ठीक है डन.... अब नो मैसेजेस...नो बातचीत.. दूर रहूँगा, तुमसे ..इतनी बड़ी बात कह दी...बहुत हर्ट किया है मुझे...ऐसा कैसे सोच लिया तुमने...सचिन ने हैरानी से सर हिलाया
क्यूंकि यही सच है ...वो कड़वी होती जा रही थी .
फिर सचिन ने वेटर के बिल लाने का भी इंतज़ार नहीं किया काउंटर पर जाकर बिल चुकाया . वो भी साथ ही उठ आयी.
 बाहर निकल कर तन्वी ने कहा ,”मैं ऑटो ले लूंगी..
ओके.. कहता सचिन आगे बढ़ कर ऑटो रोकने लगा . ऑटो में बैठते हुए , सचिन की तरफ देखने की हिम्मत नहीं हुई तन्वी की ..बाय भी नहीं कहा...उसकी आँखें तो गंगा जमुना बनी हुई थीं.
घर आकर भी देर तक रोती रही . पर समझ नहीं पा रही थी ,वो तो सचिन को खुद से दूर रहने के लिए कहने गयी थी. सचिन ने उसकी बात मान भी ली ,फिर भी क्यूँ उसके आंसू यूँ उमड़े चले आ रहे थे .
***

सचिन ने अपना वायदा निभाया भी. उसकी तरफ कभी देखता भी नहीं , ऑफिस में भी थोडा बुझा बुझा सा रहता, लोगो ने भी नोटिस किया तो उसने टाल दिया..अरे, इतना टूर रहता है,यार ...आज यहाँ, कल वहाँ थक जाता हूँ पर अब तन्वी की नज़रें हर वक़्त सचिन पर रहतीं. वो कब टूर पर जा रहा है, कब वापस आ रहा है, सारी  खबर रहती उसे. मोबाइल कंपनी वालों का भी कोई मेसेज आता तो चौंक जाती , और फिर सचिन के पुराने मैसेज कई कई बार पढ़ती. अपने उस दिन के व्यवहार का गिल्ट उसके मन में घर कर गया था . वो सचिन को कुछ और कहना चाहती थी पर कुछ और ही कह गयी. उसने सारा दोष सचिन पर डाल दिया ,जबकि इतना वो भी जानती थी ,सचिन के मन में ऐसा ख्याल नहीं रहा होगा. पर तन्वी को समझ नहीं आ रहा था, यह जानते हुए भी कि वह एक डीवोर्सी है सचिन उस से प्यार कैसे कर सकता है? जबकि वो हैंडसम है, काबिल है, उसे कितनी ही सिंगल लडकियां मिल जायेंगी. फिर ये भी सोचती ,अगर सचिन सचमुच सिर्फ उसके साथ टाइम पास करना चाहता था तो फिर उसके बात करने से मना करने पर इतना उदास क्यूँ रहने लगा है?और तन्वी ने सोचा, उस से मिलकर ,अपने उस दिन के व्यवहार के लिए माफ़ी तो मांग ही लेनी चाहिए. उसे अपनी बीती ज़िंदगी की सारी बातें बता देगी कि क्यूँ वह इतनी कड़वी हो गयी थी.
और उसने सचिन को मैसेज कर दिया..क्या बहुत नाराज़ हो ?“
मैं तुमसे कभी नाराज़ नहीं हो सकता...इस जनम में तो नहीं सचिन का जबाब पढ़ फिर से उसकी आँखें भर आयीं .
कल, चलें कॉफ़ी पीने ?“
ठीक है एक स्माइली के साथ सचिन का सादा सा जबाब आया ,फिर से कोई मजाक कर के वो रिस्क नहीं लेना चाहता था .

ऑफिस के बाद सचिन उस दिन की तरह ही कार में उसका वेट कर रहा था . पर आज गाड़ी में कोई ग़ज़ल या गाना नहीं बज रहा था हलके से मुस्कुरा कर उसने उसके लिए दरवाजा खोल दिया .
बैठते ही तन्वी ने कहा.. सॉरी मुझे वो सब नहीं कहना चाहिए था...मैं कुछ ज्यादा ही बोल गयी ..
कोई बात नहीं...मैं समझता हूँ ..
सचिन मुझे तुमसे ढेर सारी बातें करनी है...
बोलो..आयम ऑल इयर्स जरा सा मुस्कुरा कर उसकी तरफ देख फिर नज़रें सड़क पर जमा दीं.
छोडो कहीं नहीं जाते हैं ...लॉन्ग ड्राइव पर चलो..यहीं प्राइवेसी है ..मैं सब बताती हूँ
ठीक है..”..इतना बोलने वाले सचिन के दो दो शब्द के जबाब तन्वी को बड़े अजीब लग रहे थे पर वो समझ रही थी..वो बहुत हर्ट है और अब कुछ भी बोलकर मुसीबत में नहीं पड़ना चाहता .

वो चुन चुन कर सुनसान रास्ते पर धीरे धीरे गाड़ी घुमाता रहा और तन्वी परत दर परत अपनी ज़िन्दगी के गुजरे लम्हे उसके सामने खोलती गयी . सचिन ध्यान से सुन रहा था जब कभी उसकी तकलीफ से बहुत आहत होकर उसकी तरफ देखता तो तन्वी सामने नज़रें टिका देती. पति से अलग होकर अकेले रहने की बात तक पहुँचते पहुँचते तन्वी की आवाज़ आंसुओं में डूब चुकी थी . सचिन ने एक किनारे गाड़ी लगाकर, तन्वी का सर अपने कंधे से टिका लिया. आंसुओं से चिपके उसके बाल समेट कर पीछे कर दिए और उसका सर सहलाते हुए बस इतना कहा, “भरोसा कर सकती हो तो इतना भरोसा करो मुझपर, अब इसके बाद एक आंसू नहीं आने दूंगा तुम्हारी आँखों में ..बहुत झेल लिया तुमने, अब और नहीं, मेरे होते अब और नहीं ..तन्वी थोड़ी और पास सिमट आयी , आज तक सब कुछ उसने अकेले झेला था ,सारी लड़ाई अकेले लड़ी थी ,अब तक कोई उसकी तकलीफ को यूँ अपनी तकलीफ समझ दुखी नहीं हुआ था. और तन्वी ने अपनी आँखें मूँद लीं . सब कुछ कह कर उसका मन हल्का हो गया था .साड़ी कडवाहट आंसुओं में धुल चुकी थी और अब उसका मन बीते दिनों के गहरे अँधेरे से निकल कर ,इस निश्छल प्रेम की नर्म रौशनी के स्वागत के लिए तैयार था .

(समाप्त )

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