Thursday, August 29, 2013

कहानी 'उलटबांसी', फिल्म 'सुनो अमाया ' और कुछ पोस्ट्स




शेखर सुमन ने जब फेसबुक पर लिखा कि फिल्म ‘सुनो अमाया ‘ देखते हुए उन्हें मेरी लिखी एक पोस्ट याद आयी तो ध्यान आया कि यह फिल्म तो देखने से रह ही गयी . भला हो इस भले लड़के का,उसने लिंक भी दे दिया और अच्छी फिल्मों (मेरी रूचि वाली ) की चट्टन मैंने उसी वक़्त वह फिल्म देख भी डाली . फिल्म की थीम उम्र की सांझ में अकेले पड़ गए स्त्री/पुरुषों के फिर से अपना साथी चुनने के विषय पर है .

कुछ संयोग ऐसा हुआ कि अगले ही दिन प्रसिद्द कथाकार राजेन्द्र यादव के जन्मदिन पर युवा लेखिका ‘कविता राकेश’ का एक  संस्मरण ‘जानकी पुल’ पर पढने को मिला. उस संस्मरण में कविता जी ने अपनी एक कहानी ‘उलटबांसी ‘ की चर्चा की है कि कैसे इस कहानी के कथानक को स्वीकारना सबके लिए मुश्किल हो रहा था क्यूंकि यह एक भरे -पूरे परिवार वाली उम्रदराज माँ ,जिनके बच्चे दूसरे  शहरों  में रहते हैं और जो अब अकेली पड़ गयी है ,के पुनः एक जीवनसाथी चुनने के निर्णय पर आधारित थी. पर फिर 'हंस' में यह कहानी प्रकाशित हुई और बहुत चर्चित रही और खूब सराही गयी. मुझे इस कहानी  को पढने की इच्छा हुई, कविता जी से इसके लिंक की फरमाइश की तो उन्होंने गूगल बुक्स पर उपलब्ध होने की बात  बतायी.

मैंने ढूंढ कर पढ़ी और इस कहानी ने जैसे निशब्द कर दिया. एक माँ जो अपने बच्चों को बड़ा करती है, उनके सुख-दुःख का ख्याल रखती है, उनके निर्णय में उनका साथ देती है पर जब बच्चे अपनी गृहस्थी में रम जाते हैं तो वह कितनी अकेली पड़ जाती है. बच्चे उसका ख्याल रखते हैं, पर उनके जीवन की अपनी उलझनें  हैं...और प्राथमिकताओं की सूची में माँ की जरूरतें सबसे नचले पायदान पर चली जाती हैं. माँ के मोतियाबंद का ऑपरेशन करवाना ,उनके जोड़ों के दर्द का इलाज टलता जाता है ...उनका झुक कर चलना,  उनके व्यक्तित्व का ही हिस्सा मान लिया जाता है.

बेटे-बेटियाँ अपने परिवार के साथ दर्शनीय स्थलों पर घूमने जाते हैं. माँ तस्वीरें देख कर ही कल्पना कर लेती है कि पहाड़ कितने ऊँचे होते होंगे...सागर की लहरें कैसे पैरों से टकराती होंगी.
ये कहानी जैसे सबको खुद से ही नज़रें चुराने पर विवश कर देती है .
 वही बीमार, नितांत अकेली पड़ गयी माँ, जब एक हमउम्र पुरुष के साथ शादी का फैसला करती है तो बेटों-दामाद  को नागवार गुजरता है. उन्हें अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा खतरे में पड़ती दिखती है. वे नाराज़गी जताते हुए, जैसे माँ से रिश्ता ही तोड़ कर चले जाते हैं. पर बेटी और पोती माँ के अकेलेपन के दर्द को समझती है और उनके फैसले में उनके साथ खड़ी होती है .
बहुत ही सशक्त कहानी है और कहानी में रूचि रखनेवालों को जरूर पढनी चाहिए.

फिल्म ‘सुनो अमाया’ में भी यही विषय है पर यहाँ मॉडर्न, स्वाभिमानी  बेटी जो अपने बॉस की
गलत हरकत पर उन्हें थप्पड़ मार कर नौकरी छोड़ देती है , माँ का यह फैसला स्वीकार नहीं कर पाती . जबकि माँ के उस पुरुष फोटोग्राफर मित्र से उसकी बहुत अच्छी जमती है . वह उनके साथ मिलकर एक किताब लिख रही है ,जिसमे उसके संस्मरण और उनकी खिंची तस्वीरें होंगी. पर जब अपनी माँ से उनकी दोस्ती का पता चलता है तो वह परेशान हो जाती है. पहनावे और बोलचाल में आधुनिक दिखने वाली यह लड़की अपनी सोच में उतनी ही पुरातनपंथी है . कहानी ‘उलटबांसी ‘ में मध्यम वर्गीय चालीस  वर्षीय बेटे और फिल्म में उच्च  वर्ग की बाईस-तेईस वर्षीया बेटी की प्रतिक्रया एक सी ही है , “अपने दोस्तों से क्या कहेंगे...कि माँ शादी कर रही है ?? “

फिल्म में माँ –बेटी के रिश्ते को भी बहुत खूबसूरती से उभारा गया है . बेटी माँ से नाराज़ हो जाती है , बात नहीं करती, उल्टा जबाब देती है, खाने के लिए पूछने पर कहती है , " मैं बड़ी हो गयी हूँ ..अपना ख्याल रख सकती हूँ ,जब मर्जी होगा खा लूंगी “ इस पर माँ कहती है , “तुम बड़ी हो गयी हो पर मैं तुम्हारी माँ ही रहूंगी, यह रिश्ता नहीं बदल सकता . जब जब गिरोगी तुम्हे उठाने आउंगी, ये अधिकार मुझसे कोई नहीं ले सकता “ साथ ही यह भी कह देती है..”मुझसे इज्जत से बात किया करो “ वह पुरातनपंथी माओं की तरह बेटी के हर नखरे चुपचाप बर्दाश्त नहीं करती . पर बेटी का रुख देखकर अपने पुरुष मित्र से शादी के लिए मना भी कर देती है . बाद में बेटी को भी अहसास होता है और वो माफ़ी मांग लेती है .

फिल्म में माँ का एक कैफे है (Book a coffee )वह  सक्षम है, व्यस्त रहती है. अपना ख्याल रख सकती है . उसके पास उसकी बेटी भी है .पति भी बहुत अच्छे थे , कोई कडवी यादें नहीं हैं . अच्छा समय बिताया था पर बारह साल से अकेली है और जब एक पुरुष से दोस्ती होती है तो आगे की ज़िन्दगी उनके साथ बिताना चाहती है क्यूंकि सिर्फ यादों के सहारे ज़िन्दगी नहीं बिताई जा सकती.

अविनाश कुमार सिंह द्वारा निर्देशित इस फिल्म में दीप्ती नवल, फारुख शेख, और बेटी के रूप में 'स्वरा भास्कर' ने बहुत ही सहज अभिनय किया है. लगता ही नहीं  फिल्म देख रहे हैं..लगता है सब कुछ सचमुच सामने घट रहा है .
फिल्म के अंत में यह भी दिखाते हैं कि फारुख शेख  ‘अल्जाइमर ' से पीड़ित हैं . (और दीप्ती नवल को यह बात मालूम है ) शायद यह सन्देश भी देना चाहते हैं कि जब उम्रदराज़ होने पर किसी रिलेशनशिप में जाएँ तो इस उम्र के साथ आने वाली बीमारियों के लिए भी मानसिक रूप  से तैयार रहें .
शेखर ने भी यहाँ फिल्म की बहुत अच्छी समीक्षा लिखी है

फिल्म में एक बात खटकी , यह एक हिंदी फिल्म है, हिंदी दर्शकों के लिए बनायी गयी है  . कैफे(Book a coffee ) में जहाँ कॉफ़ी के  साथ किताबें भी पढ़ी जा सकती  हैं . वहां सारी किताबें अंग्रेजी की हैं . क्या हिंदी किताबें पढने वाले ऐसी कॉफ़ी नहीं अफोर्ड कर सकते ? पात्रों  के बीच ज्यादातर बातचीत अंग्रेजी में ही दिखाई गयी है. पूरी फिल्म अंग्रेजी में भी बन सकती थी .जैसे 'लीला ' जैसी फ़िल्में बनायी गयी थीं .

ब्लॉग पर हम अपने मन की बात ,दिमाग में चल रही हलचल उतार कर भूल जाते हैं . शेखर ने ही जिक्र किया कि मैंने इस विषय पर आपकी कुछ पोस्ट्स  पढ़ी तो मुझे हैरानी हुई फिर देखा तो पाया हाँ, अक्सर इस विषय पर लिखती रहती हूँ क्यूंकि एक असहायपन का अहसास होता है. इनका दर्द हम देख सकते हैं, समझ सकते हैं पर कुछ कर नहीं सकते .

अधिकाँश बुजुर्ग तो इस अकेलेपन को अपनी नियति मान लेते हैं . पूजा-पाठ में मन लगाने की कोशिश करते हैं और जैसे दुनिया से वैराग्य ही ले लेते हैं . उनके बच्चे शौक से उन्हें घुमाने ले जाना चाहें ,उनके लिए आधुनिक सुख सुविधा की चीज़ें मुहैया करना चाहें तो इनकार कर देते हैं. उन्हें लगता है वे अपने बच्चों पर बोझ डाल रहे हैं जबकि बच्चे ख़ुशी-ख़ुशी करना चाहते हैं .
हज़ारों में एकाध बुजुर्ग महिलाए/पुरुष ऐसे होते हैं जो ज़िन्दगी को एक दूसरी पारी का मौक़ा देना चाहते हैं तो उनके निर्णय का सम्मान करना चाहिए. समाज की चिंता करना  व्यर्थ है . क्यूंकि  समाज हमसे बना है , कोई समाज पहले से नहीं बना बनाया था कि हम उसमे शामिल हुए .वैसे भी जो लोग समाज की परवाह नहीं करते ,समाज भी उनके सामने घुटने टेकने में देर नहीं लगाता .

Monday, August 26, 2013

क्षमा करना कितना सही

"क्षमा बड़न को चाहिए छोटन को उत्पात "
 
"क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो "

"To err is human , to forgive is divine "

"Forgiveness is the virtue of the brave and the final form of love "

ये  सारी उक्तियाँ सुनने में बहुत ही प्रेरणास्पद लगती हैं . क्षमा अपने आप में एक महान चीज़ है, व्यक्ति के उदारमना होने का परिचय देती है, अपराधी को सुधरने का मौक़ा देती है. पर क्या गारंटी है कि अपराधी सुधर जाए ?? कई बार अपराधी इसे सामनेवाले की  कमजोरी भी समझ लेते हैं और फिर वे तो नहीं ही सुधरते बल्कि उन्हें यूँ कोई सजा पाते न देख आपराधिक प्रवृत्ति के दुसरे लोगों का भी हौसला बढ़ता है और उनका डर गायब हो जाता है ,फिर उन्हें भी कोई अपराध करने में हिचक नहीं होती .

अभी हाल में ही महिलाओं के लिए सबसे सुरक्षित शहर कहे जाने वाले मुंबई में एक वीभत्स घटना हुई .(जो सामने आयी वरना पता नहीं मुम्बई सहित कितने शहरों में रोज ऐसे कितने ही अपराध होते हैं और पता भी नहीं चलता ) पिछले दिसंबर में निर्भया के साथ हुए दर्दनाक हादसे और उसकी मौत से पूरे देश का गुस्सा उबल पड़ा था , लोग सड़कों पर  आ गए  थे . लेकिन उन अपराधियों को सजा देने की प्रक्रिया भेडचाल से चल रही है. ऐसा नहीं है कि मुम्बई में इस कुकृत्य को करने वाले इन अपराधियों ने देश का वो रोष नहीं देखा होगा . लोग सड़कों पर थे ,टी,वी चैनल्स हफ़्तों पूरे पूरे दिन इसका प्रसारण करते रहे फिर भी इन अपराधियों को ज़रा भी डर नहीं लगा . वे साथ में ये भी देख रहे थे कि नारों,धरनों और टी.वी. रिपोर्टिंग के आगे कुछ नहीं हो रहा . उन्होंने इस फोटो जर्नलिस्ट के पहले भी जाने कितनी ही लड़कियों के साथ ये अमानुषिक अत्याचार किया है. क्यूंकि इन्हें सजा पाने का कोई डर नहीं था . इन्हें विश्वास था कि लडकियां पुलिस में रिपोर्ट नहीं करेंगी. समाज में बदनामी का भय और पुलिस की नाकामी और हमारी धीमी न्याय प्रक्रिया ..इन अपराधियों के हौसले और भी बढ़ा देती है .

पिछली पोस्ट लिखते वक़्त मुझे दो घटनाएं याद आयीं जो इन बड़े बड़े अपराधों के समक्ष तो बहुत छोटी हैं पर अपराध की श्रेणी में तो आती ही हैं.
 

जब मैंने यह जिक्र किया था कि धीमी ट्रैफिक में मैंने कार का शीशा इसलिए नीचे नहीं किया क्यूंकि मंगलसूत्र छिन जाने का डर था ...उस वक्त दिमाग में कुछ ही दिनों पहले अखबार में पढ़ी एक घटना ताज़ा थी . फिल्म अभिनेता 'विद्युत जामवाल ' ट्रैफिक जैम में फंसे हुए थे और अपने कार का शीशा नीचे कर मोबाइल पर बातें कर रहे थे .तभी एक लड़का उनके हाथों से मोबाइल छीन कर भागा . आज के अभिनेताओं की तरह विद्युत् भी अच्छी  वर्जिश करते हैं और फिट हैं. उन्होंने उस लड़के का पीछा किया .लड़के का एक साथी मोटरसाइकिल पर सवार था , लड़का जैसे ही बाइक पर बैठने को हुआ विद्युत् ने उसे पकड़ लिया .उसे कुछ झापड़ रसीद किये .पब्लिक ने भी उसे मारना शुरू कर दिया. लड़का गिडगिडाने लगा और विद्युत् ने उसे माफ़ कर दिया ,पब्लिक से बचा कर उसे जाने दिया. विद्युत् का कहना है , "वह एक अच्छे घर का पढ़ा -लिखा लड़का लग रहा था. अंग्रेजी में बातें कर रहा था .उसे सुधरने का मौक़ा मिलना चाहिए "
पहली नज़र में विद्युत् जामवाल की बातें सही लगती हैं ,लेकिन क्या पता वो लड़का इसे एक थ्रिल समझे फिर से ऐसा करने का प्रयास करे. इस बार किसी ओवरवेट सज्जन का मोबाइल छीने जो उसे भाग कर नहीं पकड़ सकें. उसे अपने किये की कोई सजा तो नहीं मिली .

जब मैंने मॉर्निंग वाक पर जाने वाली महिलाओं के गले से चेन छीने जाने की घटना का जिक्र किया तो उसी से जुडी एक घटना याद हो आयी .तीन-चार साल पहले की बात है ,इस तरह की घटनाएं नयी नयी शुरू हुई थीं .एक दिन वॉक पर जाते वक़्त मैं गले की चेन उतारना भूल गयी. मेरी फ्रेंड ने कहा . उतार कर पर्स में रख लो ,मैंने वैसा ही किया .लौटते वक़्त सब्जी खरीदने के लिए छोटा सा पर्स हम साथ रखते थे . वॉक से लौटकर मैंने डाइनिंग टेबल पर पर्स रख दिया और दुसरे कामों में लग गयी . जब बाद में पर्स ढूँढा तो पर्स नहीं मिला. पर्स में छः सौ रुपये भी थे . इसके चार-पांच दिनों पहले कहीं जाते हुए मंगलसूत्र पहनना चाहा था तो वो भी नहीं मिला . मुझे लगा मैंने कहीं और रखा होगा . मैं इतनी कुशल गृहणी नहीं हूँ . हर चीज़ जगह पर नहीं रखती  और आलमीरा भी लॉक  नहीं करती. मैंने सोचा किसी और दराज में या किसी और डब्बे में रख दिया होगा. मेरी लापरवाही की एक और वजह है, इतने दिनों की गृहस्थी में मुझे हमेशा ईमानदार कामवालियां मिलीं थीं . बाथरूम में गिरा हुआ चेन उठा कर दे देतीं, इधर उधर पड़ी मेरी अंगूठियाँ, कड़े  उठा कर दे देतीं. जब मैं पटना जाती तो वहां भी वही आदत ,कहीं भी चीज़ें रख देतीं और माँ  कहतीं 'यहाँ की कामवालियां तुम्हारे मुम्बईवालियों की तरह ईमानदार नहीं हैं ' इसीलिए जब मंगलसूत्र नहीं मिला तो मुझे कामवाली पर शक नहीं हुआ. नयी कामवाली दस दिन पहले ही मेरे पास आयी थी . उसका पिता पिछले दस वषों से बगल की बिल्डिंग में वाचमैन था .उसकी माँ भी आस-पास के फ्लैट्स में काम करती थी इसलिए उसपर शक का कोई सवाल ही नहीं पर जब चेन भी नहीं मिला तो उसपर शक किये बिना गुजारा भी  नहीं. मैंने कबर्ड का कोना कोना..पूरा दराज, हर डब्बा खोल खोल कर देख लिया पर न तो चेन था न मंगलसूत्र . सोचा वो काम करने आएगी तो पहले काम करवा लूंगी ,फिर उस से पूछताछ करुँगी. पर इतना धीरज नहीं रहा . उससे पूछा और वो जोर जोर से चिल्ला कर कसमें खाने लगी...रोने लगी ..तरह तरह के दलील देने लगी. पर मेरा भी कहना था , 'उसके सिवा कोई बाहरी व्यक्ति घर में आया ही नहीं.' वो बाहर चली गयी , अपने पिताजी , माँ को लेकर आयी . उनका भी यही कहना था ,"ऐसा काम वो कर ही नहीं सकती " जब मैंने पुलिस की धमकी दी तो रोने लगी, "मेरे दो छोटे छोटे बच्चे हैं..पति ने छोड़ दिया है..बच्चों का क्या होगा " मेरे बेटे  भी उसका रोना देख द्रवित हो गए . अंकुर ने मुझे अलग बुलाकर कहा , "उस दिन तुमने मुझे पांच सौ दिए थे ..शायद उसी पर्स में से दिया होगा " मेरी झल्लाहट उनपर निकली ,"अकेला वही पांच सौ का नोट था घर में ??"
पूरे दिन ये चलता रहा ,वो, उसके भाई..माता-पिता आते रहे . {और झाडू-पोछा बर्तन मैं करती रही :(} आखिर उसने कहा , "आपने ही  घर में इधर उधर गिरा दिया होगा..ठीक से देखिये " मैं उसकी चाल समझ गयी .मैंने कहा," ठीक है तुम्ही देखो" तो उसने  कहा,"अब तो रात हो गयी..कल झाड़ू लगाकर देखती हूँ '

दुसरे दिन आते ही उसने झाडू उठाया .मैं जानबूझकर कमरे में नहीं गयी . थोड़ी देर बाद उसकी चिल्लाने की आवाज़ आयी.."भाभी देखिये..यहाँ चेन है.." कोने में एक थैला पड़ा था जिसमे कुछ कागज़ वगैरह रखे थे. उसी में से उसने चेन निकाल कर दे दिया. मुझे सुनाया भी.."आप खुद ठीक से नहीं रखतीं ...दुसरे का नाम लगाती हैं..आदि आदि " उस पर्स में से निकल कर उस थैले में चेन गिर जाने की कोई संभावना नहीं थी फिर भी मैं चुप रही..मैंने कहा.."देखो ऐसे ही कहीं मंगलसूत्र गिरा होगा..वो भी ढूंढो " पर पूरे घर में झाडू लगाने के बाद उसने झाडू पटका और जोर से ये कहती हुई कि " चेन की तरह मंगलसूत्र भी आपने  कहीं गिरा दिया होगा,शायद घर से बाहर गिराया हो  " चली गयी. फिर दुबारा उसने मेरे घर का रुख नहीं किया . कई बार मन में आया पुलिस में शिकायत करूँ फिर उसके  बच्चों का ख्याल कर रुक गयी. कुछ दिनों बाद सुनने में  आया आस-पास के फ्लैट्स से भी उसने पैसे ,बर्तन चुराए हैं .सबने उसे निकाल दिया . अब किसी नयी कॉलोनी में काम कर रही होगी .पर न तो उसे कोई सबक मिला  न उसकी आदतें सुधरीं . ये उसके  हक में भी अच्छा नहीं हुआ. इसी तरह हर जगह से काम छूट जाएगा तो भूखो मरने की नौबत आ जायेगी .

मेरे लिए तो और भी बुरा हुआ . उसकी झोपड़पट्टी में ये बात फ़ैल गयी . .बाद में जो कामवाली आयी ,उसने भी बड़ा आश्चर्य जताया ,अपने ईमानदार होने की  कसमे खाईं . उन दिनों मेरे कुछ बुरे ग्रह ही चल रहे थे .एक दिन ऐसे ही देर रात कंप्यूटर पर कुछ पढ़ते हुए इस अंगुली की  अंगूठी उस अंगुली में डाल रही थी और अंगूठी नीचे गिर गयी . टन्न से आवाज़ भी हुई . झुक कर देखा,नहीं मिला..सोचा अब इतनी रात में मेज खिसका कर क्या सबकी नींद खराब करूँ .दुसरे दिन मैंने  बाई के साथ ही टेबल खिसका कर ढूँढा पर मुझसे पहले शायद बाई को नज़र आ गयी . और अंगूठी नहीं मिली .

कुछ दिनों बाद ही  किसी फंक्शन में जाना था ,मैंने अपनी डायमंड इयररिंग्स उतार कर सौ रुपये के मैचिंग लम्बे इयररिंग्स पहने  . दुसरे दिन, घर पर कुछ गेस्ट आने वाले थे ,बहुत ही बिजी थी..उसी में जल्दी में पुरानी इयररिंग्स पहनी पर ठीक से उसका स्क्रू नहीं लगा और वो  घर में ही कहीं गिर गया . मैंने तो अगले दिन नोटिस किया तब तक झाडू-पोछा हो चुका था .दुबारा झाडू लगाकर ढूँढने की कोशिश की पर नहीं मिला.  कामवाली साफ़ नकार गयी . उसे डर तो था नहीं कि ये पुलिस में शिकायत कर देंगी . उसे लगा, इनके यहाँ तो आराम से चीज़ें ली जा सकती हैं .उन मैडम को भी अलविदा कहा . टचवुड उसके बाद से सब ठीक रहा है...मैं भी थोड़ी सतर्क हो गयी और अच्छी कामवाली भी  मिल गयी . लोगो ने ये कह कर भी डरा दिया था "सोना खोना बहुत बुरा होता है " पर सब ठीक ठाक ही है.

फिर भी कई बार ये ख्याल आता है अगर मैं पहली वाली बाई के साथ ही सख्ती बरतती तो शायद उसे मेरा मंगलसूत्र भी लौटाना पड़ता और दूसरी बाइयां भी मुझसे डर कर रहतीं कि इनके यहाँ से चोरी करके नहीं बचा जा सकता. उन्हें सबक मिलता तो उनकी आदतें भी सुधर जातीं .
 
क्षमा करने जैसी बात सुनने में बड़ी अच्छी लगती है ,पर जिन्हें क्षमा किया जाता है, उनका कुछ अच्छा नहीं होता .आखिर हम अपने बच्चों को भी छोटी छोटी बातों पर सजा देते हैं. 'होमवर्क नहीं किया, आज टी.वी. देखना बंद.' 'अपनी चीज़ें जगह पर नहीं रखीं ,.खेलने जाना बंद' .अपने बच्चों को हम अच्छा इंसान बनाना चाहते हैं ,उनकी गलतियां सुधारना चाहते हैं ,उनमें अच्छे गुण भरना चाहते हैं तो वैसे ही समाज के प्रति भी हमारा यही दृष्टिकोण होना चाहिए . उन्हें भी सुधारने की जिम्मेवारी हमारी ही है .

Friday, August 23, 2013

रसातल और कितनी दूर

स्कूल कॉलेज के दिनों में बिहार में माँ के साथ उत्तर बिहार से दक्षिण बिहार का (जो अब झारखंड है ) रात में बस से लंबा सफ़र किया है . एक बार तो  'तिलैया सैनिक स्कूल' में छोटे भाई से मुलाकात कर लौटते वक़्त तिलैया के छोटे से बस स्टैंड पर हम माँ  -बेटी को बस के इंतज़ार में देर रात तक रुकना पडा था पर हमें किसी तरह का डर भी नहीं लगा था और हम बस पकड़ छः घंटे का सफ़र कर सकुशल घर पहुँच गए थे.
 

एक सहेली के साथ कई बार लगभग खाली पिक्चर हॉल में दोपहर के शो देखे हैं. जब पूरी बालकनी में सिर्फ हम दो सहेलियां ही हुआ करती थीं. पर हमें कभी अपने लड़की होने का कोई डर नहीं लगा .हमारे पैरेंट्स भी हमें जाने की इजाज़त देते थे ,इसका अर्थ उन्हें भी किसी अनहोनी की आशंका नहीं थी.
 

जब मुम्बई शिफ्ट हुई उस वक्त घर पर फोन नहीं था और रात ग्यारह के बाद कॉल चार्ज वन फोर्थ हो जाते थे . मैं और पड़ोस में रहने वाली एक फ्रेंड ,अपने अपने पति और बच्चों को खिला-पिला-सुला कर करीब एक  किलोमीटर चलकर मार्किट एरिया में फोन करने जाते और फिर आइसक्रीम खाते हुए, गप्पें लड़ाते हुए ,आराम से लौटते. मुम्बई की यह बात मुझे बहुत ही भली लगती . आश्चर्य भी होता और ख़ुशी भी कि इतनी आजादी है यहाँ..लडकियां/औरतें इतनी सुरक्षित हैं .
 

जब कभी परिवार के साथ देर रात लोकल ट्रेन से लौटना होता तो देखती कई लडकियां अकेले लौट रही हैं .वे प्लेटफॉर्म  पर उतर जातीं, फिर भी मेरी आँखें दूर तक उनका पीछा करतीं .कितने आत्मविश्वास से भरी हैं ये लडकियां. अब यहाँ से ऑटो या बस ले अकेले ही घर जायेंगी ..महिलाओं की ये तरक्की देख ,मन गर्व से भर जाता . कभी किसी फ़िल्मी अवार्ड समारोह में या ज़ी टी.वी. के 'सा रे  गा मा' , या 'अन्त्याक्षरी' का शो देखने जाती तो अच्छा लगता देख , प्रोडक्शन टीम में आधे से ज्यादा लडकियां ही होतीं . अक्सर रात के बारह-एक बजे शो ख़त्म होता तो मैं यही सोचती अब जाकर ये लडकियां घर जा सकेंगी .कितने इत्मीनान से इतनी देर तक  बाहर रहती हैं .कोई डर नहीं इन्हें और एक बार मुम्बई को मन ही मन थैंक्स कह देती.

एक बार ऐसा मौका भी आया, जब मैं,मेरी फ्रेंड और उसकी ननद एक शो देखने गए और रात के करीब एक बजे लौटे. मेरे लिए वह पहला मौक़ा था जब इतनी देर रात सहेलियों के साथ अकेले लौट रही थी. फ्रेंड ही ड्राइव कर रही थी. वह काफी पहले से मुम्बई में रह रही थी और एक वही आत्मविश्वास से भरी हुई थी .मेरे लिए और यू.पी.से आयी हुई उसकी ननद के लिए यह नया अनुभव था ...थोडा रोमांच भी था , और एक आज़ादी का अहसास भी .

पर यह सब तेरह-चौदह  साल पहले की बात है . मैंने धीरे धीरे मुम्बई को बदलते देखा है. सिर्फ मुम्बई ही क्या पूरे देश को ही बदलते देख रही हूँ. देश के हालात बद से बदतर होते जा रहे है . हर शहर से लूट-पाट, ह्त्या ,बलात्कार की ख़बरें सुर्ख़ियों में होती हैं.
एक तरफ विज्ञान और तकनीक में प्रगति की ख़बरें मिलती हैं और दूसरी तरफ मानवीयता जैसे रसातल में जा रही है.
  
करीब तेरह साल पहले मैं बिना किसी डर के ,देर रात सिर्फ महिलओं के साथ अकेली लौटती हूँ .और अभी दो दिन पहले की राखी के दिन की  बात है . अब ऑफिस में राखी की छुट्टी तो होती नहीं , लिहाजा रात में ही राखी  बाँधने का कार्यक्रम संपन्न होता है. लौटते वक़्त रात के सवा बारह बज गए . बेटे को काफी खांसी जुकाम था . उसने कहा,' कार की ए.सी. बंद कर दो.' पर मैं ए.सी. बंद कर कार की खिडकी के शीशे  नीचे करने में डर गयी क्यूंकि मैंने सोने का मंगलसूत्र पहना हुआ था और ड्राइव कर रही थी, इसलिए इतना मौका नहीं था कि उसे निकाल कर पर्स में रख दूँ . डर था कि सिग्नल पर या धीमी ट्रैफिक होने पर कोई गले से खींच न ले.

कई वर्षों से मॉर्निंग वॉक पर जाती हूँ , हमेशा हम सहेलियां गले में सोने की चेन और हाथों में सोने के कड़े या चूड़ियाँ पहने होती थीं. पर पिछले तीन -चार साल से मॉर्निंग वॉक पर जाने वाली महिलाओं के गले से चेन छीनने की घटनाएं इतनी आम हो गयी हैं कि मोटरसाइकिल पर पुलिस गश्त लगाती रहती है और जिनलोगो ने चेन पहने होते हैं उन्हें पास बुला कर चेन पहनने से मना करती है. अभी कुछ महीनों से तो देख रही हूँ . बीच में पुलिस चौकी सा ही बना दिया गया है और  सुबह सुबह एक पुलिसमैन वहाँ तैनात रहता है. हम सबने चेन,मंगलसूत्र  और कड़े पहनना छोड़ ही दिया है कि अब रोज पहनने और उतारने की इल्लत कौन पाले.

पहले देर रात अकेले काम से लौटती लड़कियों को देख मन गर्व से भर जाता था और मैं दूर तक उन्हें जाते हुए देखती रहती थी पर अब ख़ुशी और गर्व की जगह आशंका और डर ही ले लेगा. अब शायद किसी अकेली लड़की को देख डरा हुआ मन बस ये दुआ करेगा कि वो जल्द से जल्द सुरक्षित अपने घर पहुँच जाए.

बाईस साल की जीवन से भरपूर लड़की ,अपनी रूचि का काम पाकर कितनी खुश होगी. कितने मंसूबे होंगे उसके ,कितनी बेफिक्र होगी वह ...पर उन वहशियों ने पल भर में उसकी ज़िन्दगी तहस-नहस कर डाली. ईश्वर करे...वो लड़की इन सबको एक भयानक हादसा समझ भूल जाए और अपनी आगे की ज़िन्दगी,उसी उत्साह और उमंग  के साथ जिए. पर इन सबसे उबरने में जो समय लगेगा, उसका हिसाब कौन देगा ?? उसने जो शारीरिक और मानसिक यातनाएं झेलीं ,कौन होगा इसका जिम्मेवार?? 

बहसें शुरू हो गयी हैं , सरकार, प्रशासन, पुलिस, क़ानून व्यवस्था को जिम्मेवार ठहराना, बढती जनसँख्या..अशिक्षा.. बेरोजगारी को कारण बताना...मोर्चे निकालना...धरना देना ..आलेख लिखना ..पोस्ट लिखना ..जैसे एक चक्र  सा चल पडा है ...फिर यह पहिया रुक जाएगा...अगले हादसे के इंतज़ार तक .

Tuesday, August 20, 2013

भाई-बहन के निश्छल स्नेह के कुछ अनमोल पल

राखी का एक दिन तो ऐसा है जब भाई सात समंदर पार हो....कितना भी व्यस्त हो, किसी काम में आकंठ डूबा हो...बहन की याद आ ही जाती है और कैसे नहीं आएगी?? बहन इतने दिल से जो याद करती है :)

इस राखी  पर मैं भी , अपने सभी भाइयों  के लिए दिल से दुआ करती हूँ कि 

 

सफलताओं के शिखर हो,उनके कदमो तले
हर डाली पर जीवन की,नव पुष्प खिले,
दीपों की माला सी, पाँत खुशियों की जगमगाए
सुख, शान्ति, समृद्धि से उनका दामन भर जाए
.


हम मध्यमवर्गियों का इतिहास में कहीं नाम नहीं होता पर रस्मो-रिवाज़,त्योहार,परम्पराएं..एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक इन्ही के द्वारा हस्तांतरित की जाती है. राखी में भी बहने बड़े शौक से राखी खरीदती हैं या खुद बनाती हैं, मिठाइयां  बनाती हैं,भाई शहर में हुआ तो राखी बाँधने जाती हैं  वरना दिनों पहले ,राखी पोस्ट की जाती है, भाई भी उसी स्नेह से इसका प्रतिदान करते हैं.

पर जब भाई -बहन का यही प्यार निम्न वर्ग और उच्च  वर्ग में देखने को मिलता है तो बड़ी सुखद अनुभूति होती है.

एक बार मैं अपने दादा जी के पास गाँव गयी हुई थी.देखा हमारी गायें चराने वाला चौदह -पंद्रह वर्ष का एक किशोर, मेरे दादा जी से सौ  रुपये मांग रहा है (तब वह एक बड़ी रकम थी ) कुछ दिन बाद उसकी माँ ने बताया कि शिवराम अपनी बहन 'प्रमिला' से मिलने पहली बार उसके ससुराल गया .प्रमिला चावल का पानी निकाल रही थी (भोजपुरी में कहें तो मांड पसा रही थी )..उसने जैसे ही सुना, भाई आया है, ख़ुशी में उसका ध्यान बंट गया और गरम पानी से उसका हाथ जल गया. शिवराम अंदर गया तो देखा,उसकी बहन पुआल पर सोती है. घर आकर वह अपनी माँ से बहुत झगडा कि ऐसी जगह उसकी शादी कर दी कि उसका हाथ जल गया और वह पुआल पर सोती है. उसने मेरे दादाजी से एडवांस पैसे लिए और एक चौकी खरीद,बैलगाड़ी पर लाद, अपनी बहन के ससुराल पहुंचा आया.

ऐसा ही प्यार हाल में देखा. मेरी कामवाली मराठी  बाई, 'माँ बीमार है' कहकर एक दिन अचानक गाँव चली गयी.उसकी बहन काम पर आने लगी तो बताया कि उसके पति ने बहुत मारा-पीटा है..इसीलिए वह चली गयी है. करीब दस दिन बाद वह वापस आई, उसने कुछ नहीं बताया तो मैने भी नहीं पूछा...अचानक उसके थैले में से मोबाइल बजने लगा.मैने यूँ ही पूछ लिया ,'नया मोबाइल लिया?"

तब उसने सारी बात बतायी कि यह सब सुनकर ,उसका भाई चार लोगों के साथ गाँव से आया और उसके पति की अच्छी धुनाई की (कितने मध्यमवर्गीय भाई हैं जिन्होंने यह सुन, अपने जीजाजी को दो झापड़ रसीद किए हों कि मेरी बहन पर हाथ क्यूँ उठाया ?..खैर..) एक कमरा किराये पर ले उसका सारा समान वहाँ शिफ्ट किया और बहन को एक मोबाइल खरीद कर दिया कि जब भी जरूरत हो,बस एक फोन कर ले .इसका  परिणाम भी यह हुआ कि उसका पति खुद माफ़ी मांगता हुआ साथ रहने आ गया.

भाई-बहन का ऐसा  ही निश्छल स्नेह ,उच्च वर्ग में देख भी आँखें नम हो जाती हैं.


अमिताभ बच्चन जब कुली फिल्म की शूटिंग के दौरान भयंकर रूप से बीमार  पड़े थे ,उन्हीं दिनों राखी भी पड़ी थी और डॉक्टर के मना करने के बावजूद ,अमिताभ बच्चन ने 'सोनिया गांधी' और रमोला (अजिताभ की पत्नी ) की राखी कलाई से नहीं उतारी थी. बाद में सोनिया गाँधी और अमिताभ बच्चन  के सम्बन्ध मधुर नहीं रहें.पर जब तक निश्छल प्रेम था,उसे नज़रंदाज़ कैसे किया जा सकता है? पता नहीं कितने लोगों को पता है,सोनिया गाँधी की शादी ,हरिवंश राय बच्चन के घर से हुई थी ,मेहंदी,हल्दी की रस्म वहीँ अदा की गयी थी और इसी नाते अमिताभ से भाई का रिश्ता बना.

संजय दत्त से सम्बंधित घटना बहुत ही द्रवित करनेवाली है. एक प्रोग्राम में उनकी बहन प्रिया बता रही थीं. संजय दत्त सबसे बड़े थे,इसलिए दोनों बहनों को हमेशा इंतज़ार रहता कि राखी पर क्या मिलेगा,वे अपनी फरमाईशें भी रखा करतीं.पर जब संजय दत्त जेल में थे,उनके पास राखी पर देने के लिए कुछ भी नहीं था. उन्हें  जेल में कारपेंटरी और बागबानी  कर दो दो रुपये के कुछ कूपन मिले थे. उन्होंने वही कूपन , बहनों को दिए. जिसे प्रिया ने संभाल कर रखा था और उस प्रोग्राम में दिखाया. सबकी आँखें गीली हो आई थीं.

ऋतिक रौशन का किस्सा कुछ अलग सा है. उनका और उनकी बहन सुनयना के कमरे तो अलग अलग थे पर उन्हें बाथरूम शेयर करना पड़ता था. ऋतिक रौशन को सफाई पसंद थी जबकि टीनएज़र लड़कियों सी सुनयना  के क्रीम, लोशन,क्लिप्स, नेलपौलिश इधर उधर बिखरे होते. उनका रोज झगडा होता. फिर सुनयना  की शादी हो गयी.ऋतिक जब दूसरे दिन  बाथरूम में गए तो एकदम साफ़ झक झक करता बाथरूम  देख हैरान रह गए.और इतनी  याद आई बहन  की कि तौलिया आँखों से लगाए बाथरूम के फर्श पर ही बैठ रोने लगे.

ये थे भाई बहनों के निश्छल स्नेह के कुछ खट्टे-मीठे पल.



एक बार फिर मेरे सभी भाइयों को राखी की ढेर सारी  शुभकामनाएं
(तीन साल पहले यह पोस्ट लिखी थी आज इसे ही फिर से पढने और पढवाने का मन हो आया )

Wednesday, August 14, 2013

जीना यहाँ,मरना यहाँ...इसके सिवा जाना कहाँ

मुम्बई एक happening city  तो है ही...हमेशा चर्चा में रहती है . कुछ लोगो को पसंद आती है कुछ लोगो को नहीं, कोई इस शहर से बेपनाह मुहब्बत  करता है तो कोई शिद्दत से नफरत तो किसी किसी के नफरत और मुहब्बत का पलड़ा बिलकुल बराबर का रहता है. इस शहर में कोई मजबूरीवश रहता  है  तो कोई शौक से रहता है . इस शहर के अन्दर भी हर तबके के लोगों के लिए जैसे एक अलग शहर बना हुआ है. और ये  सारे शहर समानांतर चलते हैं. और सब अपने अपने शहर में मगन रहते हैं.एक दुसरे के क्षेत्र  का अतिक्रमण नहीं करते. 

इस शहर में हज़ार कमियाँ हैं . सडकों की हालत खस्ता है . रोड पर गड्ढे हैं.( मुम्बई की सडकों से कहीं अच्छी तो मेरी गाँव की सड़कें हैं .मेरा बेटा  हैरान था ,वहाँ की सड़कों को देखकर..'माँ, एक भी गड्ढा नहीं है सड़क पर' ये उदगार थे उसके  ) भयंकर ट्रैफिक जैम है . एक जगह से दूसरी जगह पहुँचने में घंटो लगते हैं. बेतहाशा महंगाई है . लगातार होती बारिश है... बहुत भीड़ है..गंदगी है... ढूँढने बैठें तो शायद लिखते थक जाएँ पर कमियों की फेहरिस्त ख़त्म न हो.

 मुम्बई में कुछ महीने गुजार चुके एक मित्र ने एक दिलचस्प बात नोटिस की कि इस शहर में इतनी सारी कमियाँ होते हुए भी यहाँ रहने वाला  एक भी व्यक्ति,उन्हें  ऐसा नहीं मिला जिसे मुंबई से शिकायत हो, इस शहर को भला-बुरा कहे, कोसे ...यहाँ रहने वाले सभी को मुंबई पसंद है ....जबकि ऐसा किसी और शहर के लिए उन्होंने नहीं देखा ."

उनकी इस बात ने सोचने के लिए मजबूर कर दिया ,आखिर ऐसी क्या बात है, मुम्बई में ??
 बाहर से आनेवालों को मुम्बई पसंद नहीं आती पर वही बाहर से आये लोग जब यहाँ के बाशिंदे बन जाते हैं तो उन्हें मुम्बई रास आ जाती है. हालात वहीँ रहते हैं पर नज़रें बदल जाती हैं...भावनाएं अलग सी हो जाती हैं .

इसका मतलब यही होगा कि जब लोग यहाँ बसने की सोच लेते हैं तो फिर इस शहर को अपना लेते हैं... उसके अनुसार रहने की आदत डाल लेते हैं . इसकी अच्छाइयां-बुराइयां उनकी अपनी हो जाती हैं. और जब किसी को भी, चाहे वो शहर हो या व्यक्ति या कोई वस्तु ,अपना लो तो उसकी बुराइयां दिखती तो हैं पर खलती नहीं. कुछ देर के लिए खीझ भी जाएँ...परेशान भी हो जाएँ पर ये भाव स्थायी नहीं होते  क्यूंकि "जीना यहाँ,मरना यहाँ...इसके सिवा जाना कहाँ

अब जिन शहरों में रहते हुए भी लोग नाखुश रहते हैं, उस शहर से शिकायत होती है तो शायद यही वजह होती हो कि उनके सामने हमेशा ये विकल्प खुला होता है , "उस शहर को छोड़ कर चले जाने का " . दुसरे शहर में बसने का सपना पलता रहता है उनके मन में . इसमें कोई बुराई भी नहीं ,हर किसी  को बेहतर भविष्य के प्रयास का हक है. पर जिनलोगों ने उस शहर को अपना बसेरा बना लिया होगा, वे शायद शिकायत न करते हों, उस शहर को भला-बुरा न कहते हों  या करते भी हों तो खुद के लिए नहीं अपने बच्चों के लिए क्यूंकि उन्हें बच्चों के भविष्य के लिए शायद साधन सीमित लगते हों,वहाँ  .वरना अपनी पुरानी बनिए की दूकान, दूधवाला , सब्जीवाली , कपड़े की दूकान जिसे अब दादा के बाद पोता चला रहा हो..सब अपने से लगते होंगे .रास्ते में जमा  पानी और नियमित पावर कट भी जीवन का हिस्सा बन गए होंगे .और अपने हिस्से से शिकायत कैसी ? 
(वैसे कुछ लोगों की शिकायत की आदत ही होती है,  हर चीज़ से शिकायत होती है,उन्हें ...उनका जिक्र नहीं हो रहा ,यहाँ ) 
मेरा गाँव 

वरना मेरे गाँव में ज्यादा सुविधाएं नहीं थीं. बिजली नहीं रहती थी (अब भी नाम के लिए ही आती है ) ..शहर दूर था ,अच्छे डॉक्टर नहीं थे पर हमने अपने दादा जी को या गाँव के लोगो को कभी गाँव की बुराई करते नहीं सुना .क्यूंकि वो 'उनका गाँव' था .उस से अलग जीवन उन्होंने जिया नहीं था और ना ही जीने की इच्छा थी,इसीलिए उन्हें कोई शिकायत भी नहीं थी. 


हैप्पी बर्थडे 'काँच के शामियाने '

दो वर्ष पहले आज ही के दिन 'काँच के शामियाने ' की प्रतियाँ मेरे हाथों में आई थीं. अपनी पहली कृति के कवर का स्पर्श , उसके पन्नों क...