Friday, June 30, 2017

लाहुल स्पीती यात्रा (1 )

काफी दिनों बाद कोई ब्लॉगपोस्ट लिख रही हूँ. शुरुआत करने से पहले एक बार फिर अपने ब्लॉग पाठकों का शुक्रिया अदा कर दूँ। लेखन की दूसरी पारी ,आप सब पाठकों के उत्सावर्द्धन से ही जारी रही...कहानियाँ लिखते,उपन्यास भी छप गया। कुछ यात्रा वृत्तांत काफी दिनों से लिखना चाह रही थी ,पर टलता जा रहा था। अब ब्लॉग वापसी हुई है तो सोचा, किस्तों में वही लिख डालूँ। पढ़ने वाले होते हैं तो लिखने का भी दिल करता है। तो भूमिका ज्यादा लंबा न खींचते हुए ,ले चलती हूँ आप  सबको 'लाहुल स्पीति' की सैर पर।

मुझे पहाड़ घूमने का मन था ,पर जानी सुनी , भीड़ भरी जगहों पर नहीं। मुझे एक मित्र ने 'लाहुल स्पीति ट्रिप' सुझाया। इसके पहले मैंने यहाँ का नाम भी नहीं सुना था। फिर तो इंटरनेट खंगाला गया ,काफी कुछ पढ़ा और ग्यारह दिनों की ट्रिप प्लान कर ली।  'लाहुल स्पीती' हिमाचल प्रदेश में स्थित दो जिलों का नाम है ,जिन्हें पहाड़ों का रेगिस्तान भी कहा जाता है..करीब  15000 फीट पर स्थित यह भारत की चौथी सबसे कम आबादी वाली जगह है. यहाँ सिर्फ ऊंचे पहाड़, नदियाँ, झरने मिलने वाले थे. हमारी यात्रा के पड़ाव थे ,चंडीगढ़- नारकंडा- सराहन- सांगला- चिट्कुल-काल्पा- टाबो- काज़ा - चंद्रताल - मनाली- चंडीगढ़। हमने सब जगह होटल की बुकिंग कर दी।

मुंबई से चंडीगढ़ की सुबह की फ्लाइट थी। मुंबई की ट्रैफिक से तो सभी वाकिफ हैं। सुबह ऑफिस जाने वालों का रश भी होता है. लिहाजा हम मार्जिन लेकर चले थे फिर भी हमारे 'ओला कैब' का ड्राइवर धीमा था या उस दिन ट्रैफिक ही ज्यादा थी पता नहीं. पर हम बहुत लेट हो गए. बोर्डिंग बंद हो चुकी थी। जेट एयरवेज के कर्मचारी किसी तरह भी नहीं मान रहे थे। जब हमने काफी रिक्वेस्ट की तो उस लड़की ने अपने किसी सीनियर से बात कर कहा कि 'आपलोग जा सकते हैं पर आपका सामान नहीं जा पायेगा।  कोई छोड़ने आया है तो उनके हाथ घर भिजवा दीजिये।' कितनी अजीब सी बात है, बिना सामान हम कैसे जाते। फिर थोड़ा मक्खन लगाया तो उसने कहा, 'अच्छा दोपहर की फ्लाइट से भेज देंगे।' किसी के कुछ कहने से पहले ही मैंने हामी भर दी। चंडीगढ़ से हमें तुरंत ही निकल जाना था और शिमला होते हुए 182  किलोमीटर की दूरी तय करते हुए 'नारकंडा' पहुंचना था। दोपहर को निकलते तो मुश्किल होती पर और कोई चारा ही  नहीं था। उस लड़की ने एक दूसरे कर्मचारी को बुलाया और हमें उसके सुपुर्द कर दिया। वो लड़का हमें दौड़ाते हुए बिना किसी क्यू में लगे,सिक्योरिटी चेक करवा बाहर तक ले गया। वहाँ उसने जेट एयरवेज़ के एक सूमो को इशारे से बुलाया और एयरक्राफ्ट तक ले जाने के लिए कहा. एक आदमी प्लेन के नीचे इंतज़ार में खड़ा था।  हमे देखते ही बोला ..."हरी अप ,वी वर वेटिंग फॉर यू " .एयरक्राफ्ट के अंदर गई तो पाया एयरहोस्टेस ,'सुरक्षा निर्देश ' देने की तैयारी कर रही थी और सबलोग हमें घूर रहे थे कि 'कौन हैं ये लेटलतीफ लोग ' . मन कृतञता  से भर गया था और मैंने सोचा था ,जेट एयरवेज़ के वेबसाइट पर जाकर एक धन्यवाद ज्ञापन लिखूंगी। पर लौटते वक्त उनके व्यवहार ने ऐसा मन खट्टा किया कि मैंने थैंक्यू नोट लिखना कैंसल कर दिया.
शिमला 

चंडीगढ़ एयरपोर्ट पर हम टकटकी लगाए देख रहे थे कि शायद हमारा सामान आ गया हो। और जब काफी देर बाद हमारा बड़ा सा बैग नज़रों की ज़द में आया तो सारी  मायूसी काफूर हो गई.  हमने एक इनोवा बुक की थी , जो हमें चंडीगढ़ एयरपोर्ट से रिसीव कर सारी जगहें घुमा फिर चंडीगढ़ छोड़ जाने वाली थी । बाहर ड्राइवर इंतज़ार में ही था। एक मेजदार बात हुई. मेरे साथ ही एक महिला अपनी ट्रॉली धकेलते हुए जा रही थी...जब हमारी नज़रें मिलीं तो अनजान होते हुए भी हम दोनों एक दूसरे को देख खुल कर मुस्करा दिए, 'हम दोनों ने बिलकुल एक जैसा टॉप पहना हुआ था :) .मुंबई के एक ही स्टोर से खरीदा होगा. 

पर हमारी परेशानी खत्म नहीं हुई थी। अभी हम थोड़ी ही दूर गए थे कि पुलिसवालों ने गाड़ी रोक पेपर दिखाने को कहा. शायद टैक्स नहीं भरा था और उन्होंने गाडी रोक दी। ड्राइवर ने ट्रैवल एजेंसी के मालिक को फोन किया।  अब जब तक वे आते हम सड़क के किनारे चहलकदमी कर तस्वीरें और सेल्फी खींचते रहे। पर भूखे प्यासों की तस्वीर इतनी बुरी आई कि सब डीलीट कर दिए. कार के मालिक के आने और पुलिस वालों से रिश्वत की हील हुज्जत में पूरे दो घंटे बर्बाद हो गए। हमारे शिकायत करने पर उनका कहना था ,'सिर्फ एक दिन लेट हुआ और बैडलक है कि पुलिसवालों ने पकड़ लिया ' (गोया ये उनका नहीं हमारे खराब ग्रह का दोष था ) आगे जाकर एक छोटे से रेस्त्रां में भरपेट तंदूरी रोटी और पनीर टिक्का मसाला खाय तो जान में जान आई.


शिमला में एंटर करते ही घुमावदार सड़कें, लाल, हरे  रंग  वाली टीन की छतें, ऊँचे चीड़ के वृक्ष और उनके पार पर्वतों की चोटियां मन मोह ले रही थीं।  शिमला पहुँचते अँधेरा घिर  आया. शिमला से हमें गर्म कपड़े खरीदने थे।  आगे 'रोहतांग पास' वगैरह में मौसम ठंढा होने वाला था और हम मुम्बईकर के पास गरम कपडे होते  नहीं. मेरा हॉलिडे का मूड, ठंढी हवा,  शिमला की पतली गालियां, छोटी दुकानें, लाल लाल गाल वाले प्यारे से बच्चे। सब कुछ इतना  खुशनुमा लग रहा था कि मन हो रहा था, खरामा खरामा चलती रहूं पर ड्राइवर बार बार फोन कर रहा था कि हमें नारकंडा पहुंचते बहुत रात हो जायेगी, पहाड़ी रास्ता है...और रास्ता भी खराब है. बिना ज्यादा घूमे, मोलभाव किये पहली  दूकान में जो मिला...हमने स्वेटर,जैकेट,मफलर सब खरीद लिया . ( सिर्फ चंद्रताल में जैकेट काम आये ,बाकी स्वेटर वगैरह अब तक वैसे ही नए पड़े हैं. जुलाई के महीने में बाकी सारी जगहों पर जरा भी ठंढ नहीं थी और मौसम बहुत खुशनुमा था। )
नारकंडा का रास्ता सचमुच बहुत ही भयावह था। पतली सी सड़क. कहीं,कहीं कच्ची भी, दोनों तरफ झाड़ियाँ और अँधेरे में सिर्फ हेडलाइट के सहारे बढ़ती हमारी गाड़ी।  बरसों से इतना अँधेरा रास्ता मैंने देखा ही नहीं था. मुंबई में तो सड़कों पर इतनी गाड़ियां और उनके हेडलाइट से इतना उजाला होता है कि दो बार ऐसा हुआ है, मैं तीन घंटे का सफर करके आ गई हूँ और हेडलाइट ऑन ही नहीं की। दोनों बार शाम  को चली थी, रास्ते में अन्धेरा तो हो गया था पर अहसास ही नहीं हुआ. एक बार तो बिल्डिंग के नीचे गाडी पार्क करने के बाद मैंने हेडलाइट ऑफ करने की सोची तो पाया ऑन ही नहीं किया था। दूसरी बार, घर के पास का एक स्ट्रीट लाइट खराब था ,मैंने सोचा इतना अँधेरा क्यों लग रहा तब ध्यान गया कि हेडलाइट ऑन ही नहीं है. ट्रैफिक पुलिस पकड़ लेती तो हेवी फाईन लगता पर उन्हें भी इतनी बत्तियों की चकाचौंध में पता ही नहीं चला होगा. 

अब तक हम थक कर चूर हो चुके थे ,निढाल से पड़े थे। जंगलों के बीच एक ढाबा नज़र आया, ड्राइवर से आग्रह किया गया, 'कुछ खाकर चाय पी जाए।' आँखों के सामने गर्मागर्म समोसे और पकौड़े की प्लेट नाच रही थी। पर ढाबा बिलकुल खाली था ,एक औरत कुछ रख,उठा रही थी. दो लडकियां टी वी देख रही थीं. पता चला, बिस्किट और चाय के सिवा कुछ नहीं मिलेगा. माँ आवाज़ लगाती रह गई, पर देश-विदेश, मैदान- पहाड़ कोई भी जगह हो, किशोरावस्था एक सी होती है. लडकियां टी वी के सामने से नहीं उठीं. माँ ने ही हाथ का काम छोड़ स्टोव जला, चाय बनाई ।  वे लोग जितना हो सके स्टोव या लकड़ियों पर खाना बनाती थीं. गैस बचा बचा कर खर्च करती थीं.

नारकंडा में हमारा होटल एक छोटी सी पहाड़ी पर था. दोनों तरफ ढलान और ढलान पर हल्की रौशनी में नहाते चीड़ के पेड़ एक तिलस्म सा रच रहे थे।  होटल की बगल में कुछ लोहे की कुर्सियां और गोल टेबल रखे थे। किनारे रेलिंग थी और रेलिंग के पार गहरी घाटी।  तभी हल्की सी बारिश शुरू हो गई. होटल के शेड में लगे बल्ब से छन कर आती रौशनी में नाचती बारिश की बूंदें कुछ इतनी भली लग रही थीं कि मन हुआ उस  फुहार में कुर्सी पर देर तक बैठी रह जाऊँ ,पर थके शरीर ने इज़ाज़त नहीं दी। कुछ देर बाद संगीत और शोर शराबे की आवाज़ आने लगी ।  खिड़की से देखा, कुछ युवा उसी फुहार में गाना लगा, पार्टी कर रहे थे। हमने सोचा ये तो शिमला से आये होंगे ,हम तो मुम्बई से करीब २००० किलोमीटर का सफर करके आये हैं। खाना भी हमने रूम में ही मंगवाया और उन सबकी एन्जॉयमेंट पर रश्क करते सो गए.
सुबह मैं सबसे पहले उठ कर बाहर को चल दी। नीचे से होटल तक आती लाल घुमावदार पतली सी सड़क के  दोनों तरफ जहां तक नज़र जाती ,कुहासे में लिपटे लम्बे लम्बे चीड़ के पेड़ नज़र आ रहे थे. . ऐसा दृश्य बस फिल्मों में ही देखा था। शायद किसी ब्लैक एन्ड व्हाईट फिल्म में नायिका जोर जोर से विरह के गीत गाती ,ऐसे ही पेड़ों के बीच भटकती रहती थी . पेड़ पर कुछ बंदर उछलकूद मचाते ,पकडापकड़ी खेल रहे थे। सोचा, मजे है इनके तो आँखें खुली और खेल शुरू , नहाने धोने, खाने-पीने की चिंता ही नहीं...:)

 बहुत शौक था की किसी अनजान शहर में सुबह सुबह मैं अकेली निरुद्देश्य  घुमा करूं. लिहाजा चलती चली गई. शहर बस अलसाया सा अधमुंदी आँखों से माहौल का जायजा ले रहा था. इक्का दुक्का लोग सड़कों पर थे. पर सड़क मरम्मत करने वाले इतनी सुबह से काम पर लगे थे।  सब अठारह-बीस वर्ष के लड़के लग रहे थे। पता नहीं वहीँ के थे या फिर दूसरे शहरों से मजदूरी करने आये थे। इतनी सुबह उन्हें फावड़ा चलाते देख,अपने इस तरह निफिक्र  घूमने पर कुछ गिल्ट भी हुआ.

चौराहे पर एक मंदिर था। लोहे का जालीदार दरवाजा बंद था।  भगवान जाग भी गए होंगे पर पुजारी पर निर्भर थे। वो जब उन्हें नहलाये-धुलाये, भोग लगाए। थोड़ी देर सड़कों पर भटकती रही, पीछे से बेटा भी आ गया। एक छोटी सी चाय की दूकान थी. हमने चाय की फरमाइश की तो दुकानवाले ने कहा, 'अभी बना देता हूँ  '. पूरे हिमाचल ट्रिप पर मैंने पाया ,वे लोग चाय ऑर्डर करने पर बनाते थे. बनी बनाई चाय नहीं होती थी. इस से हमारा फायदा ये  हो जाता कि हम फरमाईशी चाय बनवाते, 'चीनी जरा काम डालना, थोड़ी अदरक इलायची डाल  देना।' 
चाय पीकर हम होटल वापस आ गए।  अब तैयार हो, थोड़ा 'नारकंडा'  घूमते हुए 'सराहन' के लिए निकलना था। सामान पैक करते खिड़की के पार जो नज़र गई तो टूर ऑपरेटर की बात सही साबित होती लगी.उसने कहा  था ," यहाँ  हर दो मिनट  पर दृश्य बदल जाते हैं " अब तक सामने दिखती पहाड़ी बादलों में लिपटी पड़ी थी. अब मानो पहाड़ी ने बादलों की चादर परे  फेंक दी थी . सूरज की नरम रौशनी  में नहाये छोटे छोटे लाल हरे खिलौने से घर खूबसूरत लग रहे थे। मैंने तस्वीरें लेने की सोची पर फिर लगा, हाथ का काम पूरा कर लिया जाये. बैग की ज़िप बंद कर जैसे ही कैमरा ले खिड़की के पास गई....आलसन पहाड़ी ने फिर बादलों की चादर अपने ऊपर खींच ली थी.  कुछ भी नज़र नहीं आ रहा था.
 एक सीख भी मिली,.... जो दृश्य अच्छा लगे, झट कैमरे में कैद करो, वरना बदल जाएगा. 

 (क्रमशः )



इतनी सुबह सडक मरम्मत करते मजदूर